'सशक्त भारत के निर्माण में युवाओं को आना पड़ेगा आगे'

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 07-Oct-2017

नई दिल्ली। कहा जाता है कि किसी राष्ट्र को जानना हो तो सर्वप्रथम वहां के युवाओं के बारे में जानना चाहिए। पथभ्रष्ट और विचलित युवाओं का साम्राज्य खड़ा करके कभी कोई राष्ट्र अपना चिरकालिक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सका है। देश की युवा शक्ति ही समाज और देश को नई दिशा देने का सबसे बड़ा औजार है। वह अगर चाहे तो देश की सारी रूप-रेखा बदल सकती है। अपने हौसले और जज्बे से समाज में फैली विसंगतियों, असमानता, अशिक्षा, अपराध आदि बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंक सकती है, लेकिन किसी भी राष्ट्र की युवा शक्ति समाज को तभी सही दिशा में ले जा सकती है जब वह स्वयं सही दिशा में अग्रसर हो। दुर्भाग्य से आज भारत की युवा शक्ति कुछ उचित मार्गदर्शन और कुछ विकृत मूल्यों और संस्कृति के चलते अपनी राह से भटकी हुई प्रतीत होती है। इसलिए उभरते भारत में युवा शक्ति की आदर्श भूमिका क्या होना चाहिए? यह सवाल काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भावी भारत के युवा को सही मायनों में सुसंस्कृत और सुशिक्षित होना चाहिए। उसे अपने राष्ट्र और सभ्यता के विकास का वास्तविक अर्थ समझना चाहिए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मानते थे कि राष्ट्र का वास्तविक विकास सिर्फ उसके द्वारा किया जाने वाला औद्योगिक उत्पादन और बड़े पैमाने पर किया गया पूंजी निवेश मात्र नहीं है। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी राष्ट्र का संपूर्ण और समग्र विकास तब तक होता नहीं जब तक कि उस राष्ट्र का युवा सुशिक्षित और सुसंस्कृत नहीं हो जाता।

सुसंस्कृत से उनका आशय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक नहीं था, बल्कि वह ऐसी युवा शक्ति के निर्माण की बात करते थे जो राष्ट्र की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करता हो। उनके अनुसार यह तब तक संभव नहीं है जब तक युवा देश की संस्कृति और उसकी बहुलतावादी सोच में राष्ट्र की समग्रता का दर्शन न करता हो। अगर इसे हम भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र के संदर्भ में देखें तो ज्ञात होगा कि इसकी सांस्कृतिक बहुलता में भी एक समग्र संस्कृति का बोध है जो इसे अनेकता में भी एकता के सूत्र में पिरोये रखने की ताकत रखता है। यही वह धागा है, जिसने विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी राष्ट्र को कभी विखंडित नहीं होने दिया। पश्चिमी दार्शनिक मनुष्य के सिर्फ शारीरिक और मानसिक विकास की बात करते हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय दार्शनिक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक विकास के साथ ही धार्मिक विकास पर भी जोर देते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत के युवा वर्ग को अपने भीतर इस सोच को आत्मसात करना चाहिए। उसे भौतिकवादी सुविधाओं और उपभोक्तावाद से निरंतर दूरी बनानी चाहिए। अपने शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास पर भी जोर देना चाहिए। इसी से संबंधित दूसरी बात यह है कि देश के युवाओं को अपने राष्ट्रहित और परंपरा को सर्वोपरि रखना चाहिए। युवा पीढ़ी ही किसी राष्ट्र के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की नींव तैयार करती है। हालांकि आज के अधिकांश युवा अपनी संस्कृति के प्रतिमानों और उद्यमशीलता को भूलकर रातों-रात ग्लैमर की चकाचौंध में किसी भी तरह शीर्ष पर पहुंचना चाहते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बज सकती उसी प्रकार बिना उद्यम के कोई ठोस कार्य भी नहीं हो सकता। कभी देश की आजादी में युवाओं ने अहम भूमिका निभाई और जरूरत पड़ने पर नेतृत्व भी किया। कभी विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व ने युवा कर्मठता का ज्ञान दिया।  देश में ही युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा जिस तरह नशे की गिरफ्त में है, वह इसी की देन है। इसमें दो राय नहीं है कि नेता, शासक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार और कलाकार आदि के रूप में युवा किसी भी समाज और राष्ट्र के कर्णधार होते हैं। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवं ज्ञान की परंपराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का दायित्व होता है, पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परंपरागत विरासतों का वाहक बनने से इन्कार कर दे तो निश्चित उस राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। बहरहाल युवा शब्द अपने आप में ही ऊर्जा और आंदोलन का प्रतीक माना जाता है। आज भारत की कुल आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी करीब साठ प्रतिशत है। जाहिर है कि सबसे बड़ी चुनौती इसी युवा शक्ति का संपूर्ण दोहन सुनिश्चित करने की है।