चमकने के लिए सामाजिक सौहार्द को न बिगाड़े जातीय नेता

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 14-Nov-2017

भिण्ड/अनिल शर्मा। प्रत्येक समाज के कुछ ऐसे छुट भैया नेता जो समाज के ठेकेदार बनकर सस्ती लोकप्रियता के जरिए अपनी नेतागीरी चमकाने की फिराक में रहते हैं, ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है, सामाजिक जातीय संगठनों का काम एक दूसरे पर प्रहार करना नहीं, बल्कि समाज के समग्र विकास के सोच का होना चाहिए। पिछले दिनों किसी की निजी रंजिश से हुए झगड़े को जो जातीय संघर्ष को तूल देने के प्रयास की जितनी निंदा की जाए वह कम है।

भिण्ड जिले में इन दिनों पूरे नवंबर माह में श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के जबरदस्त आयोजन चल रहे हैं, राष्ट्रीय स्तर के विश्व विख्यात प्रकाण्ड विद्वानों की कथा श्रवण का मौका भी है, यदि किसी ने भी श्रीमद् भागवत कथा का एक भी दिन ठीक से श्रवण किया होगा, तो हम सब एक ही पारब्रह्म परमेश्वर की संतान हैं, वर्ण व्यवस्था सामाजिक ताना-बाना को बनाने के लिए मानव ने ही की है, फिर हम वर्ग संघर्ष की स्थिति क्यों निर्मित होने देते हैं। चाहे कोई भी समाज हो, उनमें सभी एक जैसे नहीं होते हैं, कुछ अच्छे हैं तो कुछ शरारती तत्व भी हैं। कई बार भले लोगों की चुप्पी का फायदा ये मुट्ठीभर शरारती तत्व उठाने में कामयाब हो जाते हैं, उसकी वजह सिर्फ एक है, भले लोग किसी चक्कर में न पड़कर शान्ति के पक्षधर हैं। वे शरारतीतत्वों द्वारा कोई गलत कार्य टिप्पणी करने पर टोकने की भी जहमत नहीं उठाते हैं। क्या उनका चुप्पी का यह निर्णय सही है। इस पर विचार करने की जरूरत है, उनकी चुप्पी शरारती तत्वों का मनोबल बढ़ाती है और प्रत्येक जाति समाज की शांति भंग को प्रोत्साहन मिलता है।

पिछले दिनों किसी जाति के व्यक्ति के साथ दूसरी जाति के लोगों द्वारा निजी रंजिशवश मारपीट की घटना घटित होती है, कुछ शरारती तत्व वीडियो बनाकर उसे जाति अत्याचार की संज्ञा देकर अपनी ही जाति को भ्रमित कर उसे संगठित करने की घिनौनी राजनीति कर नेता बनने का प्रयास करते हैं और अति उत्साह में एक व्यक्ति की गलती को पूरे समाज पर थोपकर अपमान जनक नारेबाजी कर जातीय विद्रोह उन्माद फैलाने का दुस्साहस करते हैं, इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जिस समाज पर अपमान जनक टिप्पणी होती है, उस समाज के लोग भी शब्दों के वाण से प्रहार करने से नहीं चूकते हैं, दोनों ही गलत है, यदि तुम्हारे घर के चौके से कोई चोर कुत्ता रोटी चुरा ले गया तो क्या तुम सारे कुत्तों को लाठियों से पीटोगे। यह एक मात्र उदाहरण है।

भारतीय संस्कृति व ग्रामीण समाज में आज भी भाईचारा है, इस बात में कोई दो राय नहीं है, हम सब जानते है कि ग्रामीण अंचल में आज भी लोगा वेशक विभिन्न जातियों के हों लेकिन वे भी ऊंच नीच का भेदभाव छोड़कर पारिवारिक रिश्ते की तरह एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं। यदि कोई अन्य जाति का व्यक्ति कृषि कार्य हेतु नौकरी करता था तो वह बेशक किसी भी समाज जिसे हम छोटा मानते हों उससे भी पारिवारिक रिश्ता होता था, वह उम्र में बड़ा है तो चाचा, ताऊ या दादा कहकर ही उच्च जाति के छोटे बच्चे पुकारते थे, यह व्यवस्था आज भी है। इस भाईचारे को बरकरार रहने दो, सामाजिक जाति उन्माद फैलाकर राष्ट्र को कमजोर करने का प्रयास मत करो।

जिलाधीश के अच्छे कदम कोई भी  समाज अपनी हार-जीत से न जोड़े

जातिय उन्माद फैलाकर वर्ग संघर्ष फैलने से रोकने की दिशा में जिलाधीश ने अच्छा कदम उठाया है। लेकिन इस निर्णय को किसी भी समाज को अपनी जीत या हार से नहीं जोड़ना चाहिए और न ही सोशल मीडिया पर कोई टीका टिप्पणी करने का अधिकार किसी को भी है। निश्चित रूप से जिलाधीश डॉ. इलैया राजा टी ने एक बार फिर अपनी भारतीय प्रशासनिक सेवा की उत्कृष्टता का परिचय दिया है, यहां यह उल्लेख करना बाजिब होगा कि पिछले दिनों गोरमी में हुए सांप्रदायिक उपद्रव को शांति व्यवस्था कायम करने में उनकी सराहनीय भूमिका रही थी। उन्होंने अपनी साहसिकता का परिचय देते हुए उपद्रव की सुलगती आग के बीच घर-घर जाकर मामले को शांत कराने में अहम भूमिका निर्वहन की थी, हालाकि गोरमी उपद्रव के लिए पूरी तरह पुलिस जिम्मेदार थी, उसके सटीक निर्णय व कार्रवाई न करने के फलस्वरूप ही एक व्यक्ति की जान चली गई और उपद्रव में राष्ट्रीय संपत्ति की क्षति हुई और खुशहाल रह रहे लोगों में वैमनुष्यता उपजी थी। वर्तमान में भी कहीं न कहीं वर्ग संघर्ष की स्थिति निर्मित हुई, उसमें भी पुलिस द्वारा अपनी भूमिका का ठीक से निर्वहन नहीं करना है। जिस दिन शहर में किसी जाति विशेष के खिलाफ अपमान जनक नारे के साथ रैली निकली, यदि तत्काल पुलिस कार्रवाई करती तो शायद बात इतनी आगे भी बढ़ती, पुलिस की मौजूदगी में इस तरह के नारेबाजी होती रही और वह चुपचाप सुनती रही। यदि उसने अपने कर्तव्य का पालन ठीक से तत्काल किया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती।