आध्यात्मिक माहौल से करें नए साल का स्वागत, भोजपुर है बेस्ट ऑप्शन

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 27-Dec-2017

भोपाल। अगर आप भी चाहते हैं कि नव वर्ष का स्वागत भगवान के आशीर्वाद से करें। या फिर अध्यात्म की दुनिया में कदम रखकर आध्यात्मिक माहौल में नए साल का पहला दिन बिताना चाहते हैं ताकि सालभर सकून भरा बना रहे, तो हम आपको बता रहे हैं भोपाल और उसके आसपास के कुछ ऐसे ही आध्यात्मिक स्पॉट जहां प्राकृतिक नजारों के बीच अध्यात्म का रंग गहरा चढ़ता है।

आज हम आपको लेकर चलते हैं, भोजपुर। भगवान शिव की इस नगरी का इतिहास जानकर, भगवान शिव के इस मंदिर की महिमा आपको इतना आकर्षित करेगी कि आप यहां जाने से खुद को रोक नहीं पाएंगे।

मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक स्थलों में से एक है भोजपुर स्थित ये प्राचीन शिव मंदिर। भोपाल से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर को मध्य भारत के सोमनाथ मंदिर की उपमा दी जाती है।
यही नहीं फिजाओं में घुला प्राकृतिक सकून आपकी इस छोटी सी यात्रा को खूबसूरत यादों में बदल देगा। यह एक ऐसा दर्शनीय स्थल है, जहां आपको अध्यात्म की अनुभूति तो होगी ही, इसकी भव्यता, इसका इतिहास भी आपको रोमांच से भर देगा।

यहां से एक किलोमीटर दूर स्थित जैन मंदिर आपकी सैर को एक पैकेज का रूप दे देता है। यहां की खूबसूरत लोकेशन आपको तन-मन से प्रसन्न कर देगी, तो आइए चलते हैं शिव मंदिर, भोजपुर...

पढ़ें क्यों जा सकते हैं यहां

* भोजपुर में बने इस भव्य मंदिर का पहला आकर्षण है यहां स्थापित किया गया विशाल शिवलिंग। जिसके दर्शन के लिए दुनिया भर से लोग यहां आते हैं।
* पुरातत्वविद जिनेंद्र जैन बताते हैं कि भोजपुर का ये शिवमंदिर 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी के बीच बनाया गया, जो आज भी अपनी वास्तुकला के कारण अद्भुत उदाहरण बना हुआ है।
* ये मंदिर 106 फीट लंबा, 77 फीट चौड़ा और 17 फीट ऊंचा है।
* यहां एक ही पत्थर से तैयार 22 फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित किया गया है।
* मंदिर के पीछे बनी रैंपनुमा पहाड़ी को देख आप ये अंदाजा शायद ही लगा पाएं कि आखिर इसे कैसे डिजाइन किया गया होगा।
* आपको जानकर हैरानी होगी इस मंदिर के निर्माण में लगे पत्थरों को इसी रैंप से पत्थर लगते जाते थे और कोण बदलता जाता था।
* एक पौराणिक मान्यता के मुताबिक पांडवों की मां कुंती शिवभक्त थीं इसलिए पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।
* वहीं इतिहास बताता है कि इस मंदिर को राजा भोज ने बनवाया था।
* यह मंदिर अपनी भव्यता ही नहीं बल्कि स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है।
* इसकी विशाल छत पर नजर आने वाली कारीगरी आपको हैरान कर देगी।
* कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहली गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं।
* इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।
* यह मंदिर ऊंचा है, इतने प्राचीन मंदिर के निर्माण के दौरान भारी पत्थरों को ऊपर ले जाने के लिए ढ़लाने बनाई गई थी। इसका प्रमाण भी यहां मिलता है। यही वह रैंप है, जिससे मंदिर निर्माण के लिए काटे गए पत्थरों को ऊपर ले जाया जाता था।
* पुरातत्वविद के मुताबिक पहाड़ी क्षेत्र में पत्थरों पर बने इस मंदिर के डिजाइन और पत्थरों को काटने का तरीका उस समय में इस्तेमाल की गई तकनीक के अवशेष आज भी यहां मौजूद हैं, जो बेस्ट इंजीनियरिंग वर्क को दर्शाते हैं।
* यहां पहाड़ पर कई पत्थरों में छोटे-छोटे गेप एक कतार में बने हैं, जिनसे पता चलता है कि पत्थरों को किस तरह एक निश्चित पैमाना तय कर काटा गया था।
* इसी इंजीनियरिंग वर्क के कारण पुरातत्वविदों को मानना पड़ा कि भोजपुर का यह मंदिर सैकड़ों साल पहले इंजीनियरिंग सबसे बड़ी वर्कशॉप हुआ करता था।
* पत्थरों की कटिंग के निशान आज भी मंदिर परिसर में मौजूद हैं। जिन्हें देखकर जानकार हैरान रह जाते हैं। हालांकि कई जगह इन पत्थरों के निशान वक्त की धुंध में हल्के होते गए और कई मिट गए हैं।
* यह ऐतिहासिक धरोहर अब आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया के संरक्षण में है।
* पुरातत्वविद मानते हैं कि इसका निर्माण 11वीं शताब्दी के बीच का है।
* यह मंदिर विशालकाय खंभों पर टिका है। जिन पर एक बड़ी सी गुम्बद है।
* धार्मिक स्थल होने के कारण इसका विकास भी अध्यात्म और धार्मिक पर्यटन के हिसाब से ही किया गया है।
* मंदिर के सामने बेतवा नदी बहती है, जो इसकी लोकेशन को खूबसूरत बनाती है। यहां रुककर आप बोटिंग का मजा तो ले सकते हैं। लेकिन यदि आप नहाने की सोच रहे हैं तो सतर्क रहकर आप किसी भी अनहोनी से बच सकते हैं।
* नदी के एक ओर पार्वती गुफा है। यह गुफा ऐतिहासिक नक्काशी का उदाहरण है।
* मंदिर के करीब स्थित बांध को राजा भोज ने बनवाया था। बांध के पास प्राचीन समय में बड़ी संख्या में शिवलिंग बनाए जाते थे। यह स्थान शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया की जानकारी देता है।
* आजकल पर्यटकों के लिए खासा आकर्षण यहां खोजी गई ऊं वैली भी है।
* वैज्ञानिकों की मानें तो यहां हजारों साल पुरानी एक ओमवैली है।
*मानसून के समय ये ओमवैली स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है।
* यहां पर मौजूद हरियाली के बढऩे और जलाशय भरने के बाद ओमवैली की तस्वीरें पूरी तरह से साफ नजर आती हैं।
* आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के आर्कियोलॉजिस्ट्स का मानना है कि ओम की संरचना और शिव मंदिर का रिश्ता बहुत पुराना है।
* देश में जहां कहीं भी शिव मंदिर बने हैं, उनके आसपास के ओम की संरचना जरूरी होती है।
* इसका सबसे नजदीकी उदाहरण है ओंकारेश्वर का शिव मंदिर।
* परमार राजा भोज के समय में ग्राउंड मैपिंग किस तरह से होती थी इसके अभी तक कोई लिखित साक्ष्य तो नहीं है, लेकिन यह रिसर्च का रोचक विषय जरूर है।
* सैटेलाइट इमेज से यह बहुत स्पष्ट है कि भोज ने जो शिव मंदिर बनवाया, वह इस ओम की आकृति के बीचोंबीच स्थापित है।
* परिषद की ताजा सैटेलाइट इमेज से 'ऊं' वैली के आसपास पुराने भोपाल की बसाहट और एकदम केंद्र में भोजपुर के मंदिर की स्थिति स्पष्ट हुई है।
* पुरातत्वविदों के पास राजा भोज की विद्वता के तर्क हैं। उनके मुताबिक लगभग 1000 साल पहले ही भोपाल को एक स्मार्ट सिटी बनाने के लिए इसे ज्यामितीय तरीके से बसाया गया था।
* इसे बसाने में राजा भोज की विद्वता से ही सारी चीजें संभव हो पाईं थीं।
ये हैरिटेज स्पॉट बना देगा नए साल का पैकेज टूर
भोजपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भीम बेटका। भोजपुर से सीधे औबेदुल्लागंज रूट से आप होकर भीम बेटका पहुंच सकते हें।
* आपको जानकर हैरानी होगी कि मध्यप्रदेश का यह पाषाण आश्रय स्थल एक आर्कियोलॉजिकल साईट और पाषाण काल और भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन जीवन दृष्टी को दर्शाने वाला स्थान है।
* माना जाता है कि यहीं से दक्षिणी एशियाई पाषाण काल की शुरुवात हुई थी।
* यह भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले में स्थित है और रातपानी वाइल्डलाइफ अभ्यारण्य के पास ही अब्दुलगंज शहर के समीप है।
* यहां स्थापित कुछ आश्रय होमो एरेक्टस द्वारा 1,00,000 साल पहले हुए बसाए हुए हैं।
* भीमबेटका में मिलने वाली कलाकृतियां यहां का आकर्षण हैं। यहां सबसे पुरानी कलाकृति करीब 30,000 साल पुरानी है।
* यहां की गुफाएं हमें प्राचीन नृत्य कला का उदाहरण देती हैं।
* आपको बता दें कि 2003 में इन गुफाओ को विश्व विरासत घोषित किया जा चुका है।

कब जाएं

वैसे तो हर मौसम में आप यहां जा सकते हैं। लेकिन अक्टूबर से मार्च तक आप यहां की सैर करेंगे तो मौसम आपकी सैर को यादगार बना देगा। इसीलिए 31 दिसंबर या फिर 1 जनवरी का सर्द मौसम आपकी इस यात्रा को दुगुना मजेदार बना देगा।
कैसे पहुंचे
अगर आप भोपाल से ही हैं, तो आप कई बार यहां होकर आए होंगे। लेकिन अगर आप भोपाल से नहीं हैं और कहीं बाहर से यहां आकर घूमना चाहते हैं तो पहले भोपाल पहुंचे और फिर बस या टैक्सी के माध्यम से इस स्थान पर पहुंच सकते हैं।

कहां रुकें और क्या खाएं

आपको बता दें यहां जा रहे हैं, तो आप भोपाल में ठहर सकते हैं। रही खाने की बात तो आप यहां 11 मील और बंगरसिया पर ढाबे का स्वादिष्ट खाने का मजा ले सकते हैं। या फिर जैन मंदिर में अपना मनपसंद खाना तैयार करवाकर खा सकते हैं। वैसे जैन मंदिर में स्थित इस रसोई के दाल, बांटी या बाफले आपको भारतीय खाने का सबसे स्वादिष्ट खाना लगेगा। इसके अलावा भोपाल में ऐसे कई रेस्टोरेंट हैं, जहां आप ठहर भी सकते हैं और इंडियन फूड के साथ ही फास्ट फूड, चायनीज फूड का मजा ले सकते हैं। चीपेस्ट से लेकर रॉयल टच होटल और रेस्टोरेंट यहां आपको फाइव स्टार जैसी सुविधाएं देते हैं। इसलिए नो टेंशन...फन ही फन।