मंदिर में विराजमान है भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 03-Jun-2017

मंदिर में विराजमान है भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा

 

प्रशांत शर्मा/ग्वालियर। स्वर्ण मंदिर का नाम जुबान पर आते ही अमृतसर शहर का नाम सामने आ जाता है। लेकिन शहर में भी एक ऐसा अद्भुत स्वर्ण मंदिर है जिसे देखने के लिए दूर दराज से दर्शनार्थी आते हैं। यह स्वर्ण मंदिर जैन समाज के द्वारा स्थपित किया था, इस भव्य स्वर्ण मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है। यह मंदिर जैन समाज के लोगो के लिए तीर्थ के समान है। अमृतसर का स्वर्ण का मंदिर जहां देश विदेश में जाना जाता है, वहीं शहर में स्थापित जैन समाज के इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक है। देश के विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु इस अदभुत जैन स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। ग्वालियर के डीडवाना ओली में स्थित लगभग 300 साल से भी अधिक पुराना जैन धर्म का स्वर्ण मंदिर सोने से मढ़ा हुआ है।भादौ सुदी 2 संवत 1761 (सन् 1761) में इसका निर्माण पूरा हुआ, यहां एक इंच से लेकर छह इंच तक की कुल 193 मूर्तियां हैं। इस मंदिर के बनने में करीब दस वर्ष और इसकी नक्काशी में पूरे 45 साल लगे। इस मंदिर का नवीनीकरण 10 किलो सोने से किया गया है। इसकी छत और दीवारों पर इससे पहले तक करीब 100 किलो सोने की पॉलिश हो चुकी है।

193 मूर्तियां हैं मंदिर में
जैन स्वर्ण मंदिर में कुल 193 मूर्तियां हैं जिनमें चांदी, मूंगा, स्फटिक, मणि, स्लेट, पाषाण, कसौटी, संगमरमर तथा श्याम-श्वेत पाषाण की एक इंच से लेकर छह इंच तक की मूर्तियां शामिल हैं।

दो मन सोने का उपयोग किया है इस मंदिर में
इस मंदिर में करीब 80 किलो सोने का उपयोग किया गया है, और कलर के लिए रत्नों का उपयोग किया गया है। जैन समाज का यह मंदिर देशभर में इकलौता है, इसे स्वर्ण मंदिर का नाम दिया गया है।

नक्काशी में लगे पूरे 45 साल
जैन स्वर्ण मंदिर को बनने में जितना समय नहीं लगा, उससे अधिक इसमें मौजूद नक्काशी में लगा। इस मंदिर में बनी पेंटिंग में सोने की पॉलिश के साथ ही मूर्तियां भी हैं। इस मंदिर की दीवारों पर भी सोने की पॉलिश के साथ आकर्षक नक्काशी की गई है।

मंदिर के बीचों बीच बना है विशाल चौक
जैन स्वर्ण मंदिर के बीचों बीच एक विशाल चौक है, चौक के दो ओर विशाल तिवारे हैं जिनमें स्वर्ण जड़ित एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके, दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्रों की एवं पौराणिक कथाओं एवं तीर्थकरों के जीवन से जुड़े पांचो कलयाणकों का चित्रण किया गया है।