भगवान से भी श्रेष्ठ हैं गुरु

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 10-Jul-2017

गुरू पूर्णिमा भारत वर्ष में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन गुरुओं और व्यास की पूजा की जाती है। व्यास पराशर ऋषि के पुत्र कृष्ण द्वैपायन का उपनाम है। कृष्ण द्वैपायन ने वेदों को पृथक-पृथक करके चार भागों में विभाजित किया था इसलिए इन्हें व्यास कहा जाने लगा।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि मुनियों में व्यास हूॅ इसलिए आषाढ़ -पूर्णिमा को व्यास के रूप में भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। बाद में व्यास रूप में उन गुरुओं की पूजा की जाती है जो गुरू-मन्त्र कान में देते हैं। गुरु शब्द के बहुत अर्थ होते हैं किन्तु गुरु के तीन अर्थ- बृहस्पति, पिता आदि गुरुजन और पढ़ाने वाला मुख्य है। इन तीनों की पूजा करने की बात तो स्वप्न हो गया है। गुरु शब्द का रुढ़ अर्थ करते हुए कहा गया है गुरू शब्द का ‘गु‘ शब्द अन्धकार को बताता है और ‘रु‘ शब्द उस अन्धकार को दूर करने वाला है। अर्थात् अन्धकार को दूर करने वाला गुरु कहलाता है। एक सूर्य अन्धकार को दूर करता है, दूसरे वे गुरु हैं जो स्वयं अन्धकार में रहते हुए शिष्यों के अन्धकार को दूर करते हैं। अन्धकार को दूर करने वाले गुरु स्वयं अपार सम्पत्ति के स्वामी हैं। उनका ज्ञान उनकी बढ़ती हुई सम्पत्ति से मूल्यांकित किया जाता है।

ऐसे गुरुओं की पूजा के दिन शासन को सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती है। नेता भी उनसे आशीर्वाद लेते हैं क्योंकि उनके शिष्य उनके वोटर बन सकते हैं। इन गुरुओं की सम्पत्तियों की जाॅच तक तक नहीं होती, जब तक ये किसी संगीन उपराध में फंस नहीं जाते। ऐसे गुरुओं और इनके शिष्यों की संख्या बढ़ती जाती है। अब तो योग-गुरुओं की संस्था बढ़ती जा रही है। कल इन योग-गुरुओं की गुरु पूर्णिमा के दिन पूजा होने लगेगी। इनके शिष्य अपने-अपने गुरुओं के चमत्कारों को ऐसा वर्णन करेंगे, मानो वे प्रकृति के नियमों को बदल देने में सक्षम हैं।


गुरु पूर्णिमा के दिन मालियों, फल और मिष्ठान बेचने वालों को प्रचुर लाभ होता है। ये गुरु भी उन फलोें और मिष्ठान को या तो पुनः अपने स्थान पर पहुंचवा देते हैं या अपने पट्ट शिष्यों को दिव्य अवसर पर प्रदान करते हैं। यदि इन फलों को अस्पताल में रोगियों को बंटवाया जाता तो रोगियों का कल्याण होता है और बांटने वाले को पुण्य।

आश्चर्य होता है लोगों के ज्ञान पर। माता और पिता ही किसी भी संतान का सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। ब्रह्मशक्ति के रूप में माता संतानों को अपनी कुक्षि में रखकर जन्म देती है, विष्णु शक्ति के रूप में उनका पालन करती है और शिवशक्ति के रूप में माता-पिता उनके विघ्नों का संहार करते हैं विषपायी बनकर। इसके पश्चात् अक्षर ज्ञान कराने वाला ही पूज्य गुरु है। गुरु क्रमशः प्रगति के भवन पर पहुंचने के लिए दिव्य सोपान है पर सीढ़ियों की भाॅति इन्हें पद से कुचला जाता है। इन्हीं गुरुओं की अनुकम्पा से ही व्यक्ति कुछ अर्थ प्राप्ति के योग्य होता है पर इन्हें पूछता है कौन ? वे उन गुरुओं के चरणों के रज को लेकर उन्हें द्रव्य-दान देते हैं जिन्हें स्वयं पता नहीं है आत्मा-परमात्मा के विषय में। उपनिषद्गण कहते रहें, उस परमात्मा को जाना नहीं जा सकता है। गोस्वामी तुलसी दास ने कहा- ‘इदमित्थं कहि जात न सोई‘ पर ये लोग अवश्य जान लेते है। पुस्तकों में लिखे कुछ उपदेशों को रटकर सस्वर सुनाकर शिष्यों को आकर्षित कर लेते हैं और उनका दोहन करते रहते हैं। सन्यासियों का स्थान तो तपोवन है लेकिन वहां नागर सुख-सम्पदा नहीं है।

यदि गुरु पूर्णिमा के दिन माता-पिता और अर्थकरी विद्या देने वालों की पूजा की जाती तो उन्हें सत् हृदय से आशीर्वाद मिलता और प्रत्येक स्थान पर रहने वाले फूल-फल बेचने वालों को लाभ मिलता, मुद्रा का विकेन्द्रीकरण होता। इसके अतिरिक्त छोटे बच्चों में अच्छे संस्कार होते। वे भी अपने माता-पिता को गुरु मानकर उनकी प्रत्येक वर्ष पूजा करते। बच्चों को यह कथा सुनाई तो जाती है कि गणेश जी अपने माता-पिता (पार्वती और शिव) की परिक्रमा करके ही पूजित हैं।

प्रश्न उठता है कि आषाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है। बारह पूर्णिमाओं में आषाढ़ पूर्णिमा महत्वपूर्ण है क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा तक प्रायः ग्रीष्म से परितप्त वसुन्धरा का आतप वर्षा से शान्त हो जाती है। आषाढ़ का अर्थ ही होता है जहां या जिस स्थान में सब कुछ सह्य हो। इस माह के अन्त तक ग्रीष्म का ताप सुखद सह्य होता है। गुरु पूर्णिमा के स्पर्श से या कृपा मात्र से संसार का ताप सुखद-सह्य हो जाना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है। श्रीमद्भगवदगीता में कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त पत्र, पुष्प और जल मुझे प्रीतिपूर्वक अर्पण करता है वह प्रिय होता है और ये लोकोत्तर गुरु उपर्युक्त वस्तुओं के अर्पण करने से प्रसन्न कभी नहीं हो सकते हैं क्योंकि ये गुरु भगवान से भी गुरु (श्रेष्ठ) हैं।

डाॅ. बैजनाथ पाण्डेय के मुताबिक, गुरू पूर्णिमा के दिन माता-पिता रूपी गुरु की पूजा करनी चाहिए और साथ-साथ उन लौकिक गुरुरूओं की-जिनकी छत्रछाया से-काक होहिं पिक वकहु मराला-हो जाते हैं-पूजा करनी चाहिए, क्योंकि ये सुलभ सुखद, शान्तिप्रद और प्रत्यक्षसिद्ध हैं।

लेखक - गिरिजा शंकर