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‘शाह’ ने बनाया अहमद को ‘पटेल’

‘शाह’ ने बनाया अहमद को ‘पटेल’
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देश में तेजी से अप्रासंगिक होती कांग्रेस एवं अपने राजनीतिक जीवन में सर्वाधिक संकट काल का सामना कर रहीं श्रीमती सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को देशभर से परिचित कराने का श्रेय आज अगर किसी को निर्विवाद रूप से दिया जाना चाहिए तो वह हैं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह। जी हां, अहमद पटेल आज अचानक रातों रात एक महानायक के तौर पर जबरन स्थापित हुए हैं। वे दिग्गज रणनीतिकार हैं, चाणक्य हैं, वे कांग्रेस को संजीवनी देंगे, वगैरह, वगैरह। कल तक ये ही अहमद पटेल थे, जिनकी राजनीतिक सांसें ऊपर-नीचे हो रही थी पर भाजपा के अति आत्मविश्वास ने, अनावश्यक विस्तारवादी चाह ने आज एक ऐसे नेता को एक राजनीतिक जीवनदान दे दिया है, जो अपनी धीमी राजनीतिक मौत की ओर स्वत: बढ़ रहा था और यही वांछनीय ही था, अपेक्षित भी था। क्योंकि अहमद पटेल राजनीति के मंच पर भले ही प्रगट रूप में दिखाई न दें लेकिन वे ऐसी क्रूर और समाज विरोधी राजनीति के प्रतीक के तौर पर उभरे हैं, जिसने देश को लक्षित हिंसा विधेयक के रूप में राष्ट्रघाती विचार भी दिया पर आज वे अमित शाह से भी बड़े एवं दिग्गज रणनीतिकार हैं यह बताया जा रहा है, जबकि वे न केवल स्वयं नैतिक रूप से पराजित हो चुके हैं, बल्कि आज अपनी पार्टी की दुर्दशा के लिए भी सर्वाधिक जिम्मेदार हैं।

प्रसंगवश आज का दिन अमित शाह के लिए बेहद खास है। आज ही वे देश के उच्च सदन के सदस्य बने हंै। आज ही के दिन एक सफल राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह तीन वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। अमित शाह को यकीनन एक ऐसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जाना जाएगा, जिनके नेतृत्व में पार्टी ने न केवल ऐतिहासिक सफलताओं का शिखर चूमा अपितु पार्टी को सही अर्थों में राष्ट्रीय स्वरूप भी दिया। पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी गतिशील करने में शाह का योगदान अभूतपूर्व है। आज श्री नरेन्द्र मोदी पार्टी का चेहरा हैं तो संगठनात्मक प्राणवायु अमित शाह हैं। वे अभी युवा हैं और कई और यश उनके खाते में आने का इंतजार कर रहे हैं। पर आज जब देश अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है तो उत्सव के इन क्षणों में शाह और उनकी टीम को थोड़ा ठिठक कर सोचना चाहिए। ऐसा इसलिए कि सन् 1942 में कांग्रेस ने नारा दिया था अंग्रेजो भारत छोड़ो। अंग्रेज तो 1947 में भारत से चले गए, पर अंग्रेजियत आज भी बरकरार है। अमित शाह का नारा कांग्रेस मुक्त भारत का है। एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष के नाते वे भाजपा को गांव-गांव तक देश भर में ले जाएं पर एक लोकतांत्रिक देश में विपक्ष से मुक्ति की सोचना क्या उपयुक्त है? बेशक कांग्रेस आज वह नहीं है, जो आजादी के पहले थी स्वयं महात्मा गांधी भी स्वाधीनता के पश्चात कांग्रेस का विसर्जन चाहते थे क्योंकि कांग्रेस एक सामूहिक जन चेतना का नाम था, एक आंदोलन का नाम था, जो देश को आजादी दिलाने के लिए प्रारंभ हुआ पर कांग्रेस के तत्कालीन कर्णधारों ने देश भर की सामूहिक तपस्या का लाभ स्वयं लेने का आपराधिक पाप किया और उसे पहले एक राजनीतिक दल का रूप दिया, जो कालांतर में इंदिरा कांग्रेस बनी और आज वह मां बेटे की कांग्रेस बन गई। इस अर्थ में कांग्रेस आज यूं भी धीरे-धीरे राजनीतिक नक्शे से गायब हो रही है और फिर जिस कांग्रेस के सलाहकार अहमद पटेल या दिग्विजय सिंह हों उसे तो डूबना ही है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व को चहिए कि वह स्वयं के विस्तार का प्रयत्न करे कांग्रेस को खत्म करने में परिश्रम न करे। अन्यथा कांग्रेस के कीटाणुओं से वह भी नहीं बच पाएंगे।

विगत निकट के इतिहास में तेजी से छाने की चाह में कई कदम क्षणिक लाभ देते दिखाई तो देते हैं, पर इसके दूरगामी परिणाम घातक नहीं होंगे, इसकी गारंटी नहीं। कई बार दूसरों के घर में तोड़फोड़ करते समय अपने घर में कहां दरारें हैं यह दिखाई नहीं देती। गुजरात राज्यसभा का चुनाव यह सीख देता है। भाजपा को देश की जनता कांग्रेस के विकल्प के रूप में ही नहीं, देश के समक्ष आसन्न चुनौतियों के समाधान के रूप में एक सकारात्मक नजरिये से देखती है। भाजपा का लक्ष्य सिर्फ सत्ता प्राप्ति और वह भी येनकेन प्रकारेण बना तो यह देश के लिए अच्छा होगा ही नहीं, भाजपा के लिए भी अच्छा नहीं होगा। राज्यसभा में अहमद पटेल को हराने के लिए जिस प्रकार भाजपा ने यत्न किए वह सुखद नहीं है। अहमद पटेल जीत कर भी कांग्रेस का कुछ भला नहीं कर सकते पर भाजपा की हार ने उनकी जीत को अनावश्यक एक बड़ा कद दे दिया है। अत: भविष्य में पार्टी नेतृत्व संभल कर आगे बढ़ेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

Updated : 10 Aug 2017 12:00 AM GMT
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