नर्मदा को जीवित इकाई का दर्जा देने से पीछे हटी सरकार

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 09-Aug-2017


भोपाल। नर्मदा नदी को जीवित इकाई का दर्जा देने के मामले में प्रदेश सरकार अब पीछे हटती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपनी नर्मदा यात्रा के दौरान आनन फानन ंमें जीएसटी को लेकर बुलाये गए विधानसभा सत्र में इसकी नर्मदा नदी को जीवित इकाई का दर्जा देने का अपना संकल्प तो दोहरा दिया लेकिन अब इसे लेकर कानून बनाने से पीछे हटती दिखाई दे रही है। उल्लेखनीय है कि 3 मई को बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में नर्मदा को जीवित इकाई का दर्जा देने का पर्यावरण मंत्री अंतर सिंह आर्य ने संकल्प पेश किया था, इसके पारित होने पर आर्य ने यह कहा था कि अगले सत्र में इसे कानूनी रूप देने के लिए विधेयक लाया जाएगा। इस कानून के बनने के बाद  नर्मदा नदी को एक जीवित व्यक्ति की तरह अधिकार दिए जाएंगे। नदी को प्रदूषित करने या उसे गंदा करने पर ठीक उसी तरह से मामला दर्ज किया जाएगा जिस तरह से एक जीवित व्यक्ति के द्वारा मामला दर्ज कराया जाता है। लेकिन मानसून सत्र बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार इस मामले में अब पीछे हटती नजर आ रही है। यही कारण है कि पर्यावरण विभाग ने इस मामले में कोई विधेयक पेश नहीं किया।  

इसलिए की थी घोषणा

दरअसल नैनीताल उच्चन्यायालय ने 20 अप्रैल को गंगा और यमुना नदी को जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी। कोर्ट के फैसले में दोनों नदियों को एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार देने की बात कही गई थी, इसके अनुसार नदियों को क्षति पहुंचाना किसी इंसान को नुकसान पहुंचाने वाले पर आईपीसी के तहत मुकदमा चलाने और व्यक्ति को जेल भेजने की बात कही गई थी। इस आदेश को ही आधार बनाते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा के विशेष सत्र में यह संकल्प पारित करवा दिया था।  

यह हैं कानूनी बिन्दु

* संविधान की धारा 7वीं अनूसुची के आयटम 56 में अनुच्छेद 246 के अनुसार अंतराज्यीय नदियों के मैनेजमेंट रूल्स बनाने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है। ऐसे में उत्तराखंड राज्य सरकार गंगा, यमुना को कैसे जीवित व्यक्ति का दर्जा दे सकती है। यही स्थिति नर्मदा की भी है, यह मप्र के साथ महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा से गुजरती है।
*   किसी अन्य राज्य में इन नदियों का कानूनी मुद?्दा उठता है तो क्या उत्तराखंड का चीफ सेक्रेटरी किसी अन्य राज्य या केन्द्र को निर्देश जारी कर सकता है। यही इश्यु मप्र के चीफ सेक्रेटरी के साथ भी आएगा।
*  नदियों को जीवित दर्जा देने से अगर इनमें बाढ़ आती है तो इससे होने वाले नुकसान पर संबंधित व्यक्ति चीफ सेक्रेटरी के खिलाफ नुकसान की भरपाई का मुकदमा दाखिल कर सकता है? क्या राज्य सरकार को ऐसा आर्थिक बोझ वहन करना चाहिए।

इसलिए बैकफुट पर सरकार

उत्तराखंड सरकार ने नैनीताल उच्चन्यायलय के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि हाईकोर्ट के फैसले से कई बड़े संवैधानिक सवाल खड़े हो गए हैं। गंगा और यमुना सिर्फ उत्तराखंड में नहीं बल्कि कई राज्यों में बहती हैं। ऐसे में दूसरे राज्यों में इन नदियों की जिम्मेदारी उत्तराखंड को नहीं दी जा सकती। कई राज्यों में बहने वाली नदियों को लेकर कदम उठाना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 7 जुलाई को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। इसकी जानकारी मिलते ही सरकार ने पर्यावरण विभाग व्दारा तैयार किए गए विधेयक के प्रस्ताव  को विधानसभा में आने से रोक दिया। दरअसल मप्र सरकार चाहती है कि उत्तराखंड सरकार ने जिन कानूनी बिन्दुओं को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है उनका निराकरण हो जाए। कारण यह कि यदि उत्तराखंड सरकार के इश्यु सही हैं तो नर्मदा को जीवित व्यक्ति को दर्जा देने के मामले में मप्र सरकार भी उलझ सकती है।