ग्वालियर में प्रारंभ हुई थी प्रदेश की पहली डायलिसिस सेवा

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 08-Mar-2018

- संकलन एवं प्रस्तुति - डॉ. सुखदेव माखीजा

विश्व वृक्क दिवस पर विशेष



बहुत कम लोग ही यह जानते होंगे कि प्रदेश में पहली हीमोडायलिसिस इकाई की स्थापना 1979 में गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय ग्वालियर के मोडिसिन विभाग में हुई। इसके लिए आवश्यक उपकरण दान स्वरूप स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया के निजी न्यास निधि के सौजन्य से एवं स्व. स्वामी महाराज श्री पीताम्बरा शक्ति पीठ दतिया की सेवा की प्रेरणा से प्राप्त हुए थे। उस समय इस पर अस्सी हजार रुपए का खर्चा आया था। डॉ. सुखदेव माखीजा वर्ष 1980 में मध्यप्रदेश की पहली डायलिसिस सेवा के प्रथम चिकित्सा अधिकारी रहे। उन्होंने 33 वर्षों तक लगातार इसकी सेवाएं लोगों को प्रदान की।

इंटरनेशनल सोसाइटी आॅफ नेफ्रोलॉजी तथा इंटरनेशनल फेडरेशन आॅफ किडनी फाउंडेशन के संयुक्त निर्देशन में विश्व वृक्क दिवस प्रतिवर्ष मार्च माह के दूसरे गुरूवार को आयोजित किया जाता है। इस वर्ष यह दिवस 08 मार्च 2018 को पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। इसका प्रथम आयोजन 2006 में 66 देशों में हुआ था अब विश्व के लगभग 200 देशों में, संबंधित नेफ्रोलॉजी सोसाइटी तथा स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से इस ंिदवस का आयोजन किया जाता है।

आयोजन के उद्देश्य

-मानव शरीर में स्वस्थ गुर्दों (किडनी) की भूमिका तथा इससे संबंधित रोगों की रोकथाम के प्रति जन सामान्य में जागरूकता का प्रचार प्रसार करना।
-शासकीय एवं निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य नीतियों के माध्यम से किडनी रोग उपचार की सुविधाओं का विस्तार कराना।
-किडनी रोगों के निदान एवं उपचार की आधुनिक नवीनतम तकनीक से चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कर्मियों को अवगत कराना एवं प्रशिक्षित करना।
 -विभिन्न चिकित्सीय  सर्वे अध्ययनों के अंनुसार वर्ष 2015 .16 में जनसंख्या के आधार पर किडनी रोगों का प्रतिशत विश्व में 10 प्रतिशत  विकसित देशों में19.50प्रतिशत  तथा एशिया में 17 प्रतिशत था।
-महिला मृत्यु के दस प्रमुख कारणों में इस रोग का स्थान आठवां हैं। इस  गम्भीर जटिल रोग के कारण विश्व में प्रति वर्ष लगभग छह लाख महिलाओं की मृत्यु होती है। एशिया, अफ्रीका
तथा लैटिन अमेरिका के अविकसित एवं विकासशील देशों में यह संख्या  अत्यधिक होती है । स्वयंसेवी संघठनों के माध्यम से महिलाओं को व्यक्तिगत स्वास्थ्य विशेषकर श्यूरिनरी हाईजीन श्के प्रति सचेत  करना।
-क्रोनिक किडनी रोग के प्रति महिलाओं में जागरूकता उत्पन करना।
-रोग की प्रारंभिक अवस्था में शीघ्र निदान एवं उचित उपचार की सुविधा उपलब्ध कराना।
-सामजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर  अशिक्षित महिलाओं  हेतु विशेष शिक्षा की व्यवस्था करना।

विशेष जानकारी

-भारत में लगभग 17 प्रतिशत व्यक्ति किडनी रोग से पीड़ित हैं, जिनमें छूट प्रतिशत स्टेज  की जटिल अवस्था में है तथा प्रति दस लाख जनसंख्या पर लगभग 230 किडनी रोगी असाध्य अन्तिम अवस्था में है।
-क्रोनिक किडनी फेल्युअर एक साइलेंट किलर के रूप में जाना जाता है। क्योंकि शरीर में जब तक इसके लक्षण प्रकट होते हैं तब तक दोनों किडनी की लगभग 50 प्रतिशत कार्य क्षमता नष्ट हो चुकी होती है।
-विश्व में 2010 तक डायलिसिस उपचारित रोगियों की संख्या लगभग २:6 मिलियन थी जो 2020 तक लगभग दुगनी हो जायेगी।
-वर्तमान में किडनी रोग से ग्रस्त प्रतिवर्ष लगभग 220000 .275000 रोगियों को  डायलिसिस अथवा गुर्दा प्रत्यारोपण हेतु रीनल रिप्लेसमेन्ट थिरेपी की आवश्यकता है।
-भारत में वर्तमान में लगभग 5000 रक्त शोधन केन्द्र (डायलिसिस सेन्टर) कार्यरत हैं।
लेन्सेट ग्लोबल हेल्थ के जनवरी  2017  के अंक में प्रकाशित आलेख में उल्लेखित ग्लोबल बरडन आॅफ डिसीज स्टडी 2015 के अनुसार विश्व में मृत्यु के प्रमुख कारणों में गुर्दा कार्य हीनता (किडनी फेल्युअयर) का सत्रहवां स्थान है, परन्तु भारत में इसकी मृत्यु कारक रेंक 8वीं हैं।

विश्व किडनी दिवस 2017 ओआरजी के अनुसार किडनी को स्वस्थ्य रखने हेतु निम्नलिखित आठ स्वर्णिम सूत्रों (गोल्डन रूल्स) का पालन आवश्यक है...

-रक्तचाप नियंत्रण।
-मधुमेह नियंत्रण
-शारीरिक भार नियंत्रण एवं संतुलित स्वस्थ आहार।
-शारीरिक सक्रियता एवं नियमित व्यायाम
-पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।
-अनावश्यक, विशेषकर दर्द निवारक औषधियों का उपयोग न करें।
-धूम्रपान एवं तम्बाकू सेवन न करें।
-यदि परिवार के किसी सदस्य को उच्च रक्त चाप, मधुमेह अथवा किडनी रोग है तो अन्य युवा सदस्यों को समय समय पर किडनी फंक्शन टेस्ट कराने चाहिये। मूत्र विसर्जन संबंधी कोई समस्या एवं शरीर में सूजन के प्रारम्भिक लक्षण प्रकट होते ही तुरन्त चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

वृक्क कार्यहीनता के मुख्य कारण

-उच्च रक्तचाप।
-मधुमेह
-किडनी स्टोन
-गर्भावास्थाजन्य उच्च रक्तचाप
-दर्द निवारक औषधियां
-उपचार के विकल्प
-रोकथाम ही उत्तम उपचार है।


-प्रथम डायलिसिस इकाई टीम सदस्य प्रो. डॉ. अजयशंकर (विभागाध्यक्ष), डॉ. मनोज पाराशर (विशेषज्ञ), डॉ. सुखदेव माखीजा (सह चिकित्सक) थे।

1990: प्रदेश के 6 चिकित्सा महाविद्यालयों में डायलिसिस संयंत्रों की स्थापना हुई।
 2006: प्रदेश के 6 चिकित्सा महाविद्यालयों में डायलिसिस तकनीशियन प्रशिक्षण प्रारंभ हुये।
2016 : प्रदेश के 51 जिला अस्पतालों में डायलिसिस केन्द्रों की स्थापना का विस्तार हुआ।  
2016: चिकित्सा महाविद्यालय, ग्वालियर, जबलपुर एवं रीवा में प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के अधिन सुपरस्पेशलिटी नेफ्रोलॉजी केन्द्र की स्थापना कार्य प्रांरभ।
विश्व की प्रथम डायलेसिस मशीन (1943) के साथ अविष्कारक डॉ. विलेम जे कॉल्फ (नीदरलैंड) 1979  में मध्यप्रदेश की प्रथम डायलेसिस इकाई, गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालयग्वालियर में स्थापित प्रथम डायलेसिस यंत्र