भिण्ड ने दिया सामाजिक सद्भाव का अनूठा परिचय

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 11-Apr-2018


भिण्ड, ब्यूरो। अदृश्य बेनाम सूचना के माध्यम से दस अप्रैल को भारत बंद के आव्हान से प्रत्येक के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, न जाने अब क्या होगा, चिंताएं बाजिव भी थीं, दो अप्रैल को अदृश्य भारत बंद आव्हान ने पुलिस चूक की वजह से कई स्थानों पर जो तांडव हुआ, उस क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ भी हो सकता है। मप्र में भिण्ड जिला प्रदेश में सबसे टॉप पर था, पूरी निगाहें यहां टिकी थीं। पर धन्य है यहां की बड़े दिल वाली जनता, जिसने सामाजिक सद्भाव का जो अनूठा परिचय दिया है। उसे किसी की नजर न लग जाए, यूं ही यहां मीठा आपसी प्रेम सद्भाव बरकरार बना रहे।

समग्र हिन्दू समाज बहुत बड़ी संगठित शक्ति है, जिसको खंडित करने का खतरा तमाम उन राष्ट्रद्रोही अराजक तत्वों से है, जिनकी गंदी राजनीति हिन्दू समाज की दरार पर ही निर्भर है, भारतीय संस्कृति सनातन धर्म का सामाजिक ढांचा वोट के सौदागरों के लिए आंखों की किरकिरी बना हुआ है, इसलिए वे समय-समय पर षडयंत्र रचने के साथ भ्रम फैलाकर भाई को भाई से लड़ाने का कोई मौका नहीं चूकते हैं, दो अप्रैल को भिण्ड में हुई हिंसा उसी का नतीजा था।

भिण्ड जिले के किसान व व्यापारी वर्ग ने सामाजिक सद्भाव व शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्वेच्छा से बंद रखने का निर्णय लिया था, जिसके फलस्वरूप जिला मुख्यालय एवं नगरीय व ग्रामीण अंचल में सामाजिक सद्भाव बरकरार रहा, जिस तरह दस अप्रैल को बंद के दौरान अप्रत्याशित घटनाओं को लेकर पुलिस प्रशासन की चिंताएं बढ़ी हुई थीं, एतिहायत बतौर समूचे जिले में सुरक्षा के कड़े प्रबंध भी किए गए थे। चंबल संभाग के महानिरीक्षक संतोष कुमार सिंह के अधीन दो उप महानिरीक्षक तैनात किए गए थे।

जिला मुख्यालय के अलावा तहसील स्तर पर भ्रमण किया, हर जगह अमन शांति दिखी, जगह-जगह ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी भी सुस्ताते हुए दिखे, कहीं भी ऐसा दृश्य नहीं दिखाई दिया, जहां पुसिल कर्मी व आमजन के बीच आवागमन को लेकर विवाद हो रहा हो, जिस तरह की शांति समिति की बैठक में बंद को लेकर आम सहमति बनी थी, वह हर जगह परिलक्षित हुई, यह भिण्ड के सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने की अच्छी पहल है। 

सामाजिक समरसता के बढ़ते प्रभाव से राजनीति के उन ठेकेदारों में घबराहट होना स्वभाविक है जो स्वतंत्रता के बाद से ही एक उपेक्षित वर्ग को अपना वोट बैंक मान बैठा था, लेकिन वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद उनके जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किए, नतीजतन उपेक्षित शोषित इस वर्ग ने जातीयता के आधार पर गठित एक राजनैतिक दल का दामन थाम लिया। इस दल ने भी उनके जीवन स्तर को सुधारने के बजाए इस वर्ग का सिर्फ आर्थिक व शारीरिक शोषण किया, इन गरीब मजदूरों की खून-पसीने की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा पार्टी फण्ड के नाम लिया गया, नतीजतन कमजोर वर्ग की राजनीति के ठेकेदार अरबपति होने के साथ सोने के महलों के वाशिंदे हो गए और उस गरीब को जीवन में न तो सम्मान मिला और न उनके बच्चों को पढ़ने का मौका मिला, इस उपेक्षित वर्ग के ही दस प्रतिशत लोग प्रशासनिक पदों व राजनीति में बड़े ओहदे पर पहुंचने के बावजूद भी आरक्षण का लाभ लेने के लिए पात्र बने रहे और मजदूर का बेटा मजदूर।