पशुओं पर ही क्यों होते हैं हानिकारक प्रयोग ?

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 12-Apr-2018



जब आप किसी जर्मन कार को खरीदते हैं तो आप उनके द्वारा अपंग बनाए गए तथा मारे गए सभी बंदरों और मानवों के प्रति अपनी सहमति दर्शाते हैं। अब यह पाया गया है कि जर्मन वाहन निर्माताओं ने मानव तथा बंदरों के डीजल के धुएं सुंघाने वाले अध्ययनों का वित्त-पोषण किया था। वोक्सवेगन, बीएमडब्ल्यू और डैमलर की मिलीभगत का खुलासा न्यूयार्क टाइम्स और विभिन्न जर्मन समाचार पत्रों में प्रकाशित कार उद्योग के स्वामित्व वाले एक समूह परिवहन क्षेत्र में पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी यूरोपियाई अनुसंधान समूह (ईयूजीटी) द्वारा वर्ष 2014 के एक अध्ययन में हुआ है और इस समूह का उद्देश्य डीजल के उपयोग का बचाव करना है जिसे 2012 में कैंसर करने वाले के रूप में वर्गीकृत किया गया था। पशु प्रयोगों को न्यू मैक्सिकों में लवलेस रेस्पीरेट्री रिसर्च इन्स्टीट्यूट (एलआरआरआई) में और मानवों पर प्रयोग आचेन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में किए गए थे जहां स्वस्थ लोगों द्वारा सांस के साथ अल्पावधि में विषैली नाइट्रोजन डाइआॅक्साइड लिए जाने का अध्ययन किया गया था। नाइट्रोजन डाइआॅक्साइड डीजल के धुएं में पाई जाने वाली एक गैस है। यूनिवसिर्टी हॉस्पिटल ने यह कहते हुए खेद व्यक्त किया कि प्रयोगों को ट्रक चालकों, मैकेनिक तथा वेल्डरों की सुरक्षा को अधिकतम करने के उद्देश्य से किया गया था।  बंदरों को हवा बंद चैंबरों में डाला गया था और उन्हें कई घंटों तक कार से निकलने वाले धुएं में तब तक सांस लेनी पड़ी थी जब तक कि उनकी मौत नहीं हो गई। जर्मन की पर्यावरण मंत्री बारबरा हैन्डरिक्स ने बाद में कहा कि वह इस समाचार से भयभीत थी। वोक्सवैगन ने इस गड़बड़ी की जांच करवाने का वायदा किया है और इस खराब व्यवहार तथा गलत निर्णय के लिए माफी मांगी है।ह्ल बीएमडब्ल्यू और मर्सीडीज के स्वामी डेमलर ने यह स्वीकार किया कि अध्ययन उन्होंने प्रारंभ किए थे, और दावा किया कि उन्हें पशुओं का उपयोग किए जाने के बारे में नहीं पता था। डेमलर ने यह कहा कि वे उन अध्ययनों की भयावहता और किए जाने के तरीकों को देख कर सदमे में थे। ऐसा कोई प्रयोग घिनौना और बेतुका था। हम संतुष्ट है कि उस समय चुनी गई वैज्ञानिक पद्धतियां गलत थी। जर्मनी की ग्रीन पार्टी ने इस मामले को चांसलर एजीला मार्केल के प्रशासन के साथ उठाने का वायदा किया था। जब पशुओं तथा लोगों पर परीक्षणों ने इच्छा के विपरीत परिणाम दर्शाने प्रारंभ किए हैं, तो इन कार उद्योगों ने अपने उत्सर्जनों के बारे में प्रदूषण गलत बताने के लिए एक साफ्टवेयर उपकरण लगाया।
डच संभवत: एकमात्र ऐसे लोग हैं जिन्होंने शोर-शराबा नहीं मचाया। डच अनुसंधानकर्ता डीजल के धुएं के मानवों तथा पशुओं पर प्रभावों का अध्ययन करने के लिए कई वर्षों से परीक्षण कर रहे हैं। डच नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक हैल्थ (आरआईवीएम) ऐसे अनुसंधानों में रत है जिसमें वालंटियर घंटों तक किसी डीजल इंजन से निकलने वाले कम किए गए उत्सर्जनों के संपर्क में आते है और इसमें बीमार तथा हृदय रोग से ग्रसित लोग शामिल हैं। डच अनुसंधानकर्ता निकोल जेनसन ने डच दैनिक एनआरसी को बताया कि वर्ष 2010 से 2015 के मध्य वायु प्रदूषण पर एक बड़ी अनुसंधान परियोजना को लिया गया था। टॉक्सीकोलॉजी के प्रोफेसर पॉल बोर्म कहते हंै कि मैंने आरवीआईएम हेतु परीक्षण किए है। चुहिया, चूहों तथा कभी-कभी लोगों पर भी परीक्षण किए गए थे।

व्यवहारिक तौर पर प्रत्येक उद्योग ने पशुओं के साथ प्रयोग किए है - यहां तक कि जहां यह अनावश्यक हो। चीनी उद्योग ने 1960 के दशक में शुगर रिसर्च फाउन्डेशन नामक एक व्यापार समूह का उपयोग करके पशुओं के संबंध में एक अनुसंधान परियोजना का वित्त-पोषण किया था जिसमें इस आरोप का नकारा जाना था कि चीनी और दिल के स्वास्थ्य के मध्य संबंध था। हजारों पशुओं को चीनी खिलाई गई और फिर उनके दिलों पर प्रभाव को देखने के लिए उन्हें काटा गया था। परंतु जब अनुसंधान ने यह दर्शाया कि चीनी न केवल हृदय रोग को बल्कि ब्लैडर कैंसर को भी बढ़ावा देती है, तो उद्योग समूह ने अध्ययन को बंद कर दिया और उसने कभी परिणामों को प्रकाशित ही नहीं किया। अत: पशुओं को अनावश्यक रूप से पीड़ा सहनी पड़ी और मरना पड़ा। इसी चीनी उद्योग ने यह सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिकों को नियोजित किया था कि कृत्रिम स्वीटनर कैंसरकारक होते हैं तथा इन्हें आधारहीन साक्ष्यों के आधार पर प्रतिबंधित किया गया था। फिर से हजारों पशुओं की हत्या की गई। तंबाकू उद्योग ने भी ऐसा ही किया, और हजारों पशुओं को सिगरेटें पिलाई गई या सिगरेट के धुएं में रखा गया ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है।

ऐसे उद्योग जो लोगों को उनके लिए अनावश्यक या उनके स्वास्थ्य के लिए खराब होने वाली चीजों को खरीदने के लिए मूर्ख बनाते हैं, वे विज्ञान को अपने हिसाब से ढालने के लिए पशु पीड़ा का उपयोग करते हैं। पशुओं का सबसे अधिक उपयोग करने वाली वस्तुओं में सौन्दर्य प्रसाधन/सौन्दर्य उद्योग है। और पशुओं पर सबसे बड़े प्रयोगकर्ताओं में लौरियल, एस्टे लॉडर, प्रोक्टर एण्ड गैम्बल, क्लोरोक्स, जॉनसन एण्ड जॉनसन, एस.सी.जॉनसन, कोलगेट-पामोलिव, रेकेट बेनसकिसर, चर्च एण्ड ड्वाइट, यूनीलीवर, और डायल/हैन्केल शामिल है। यह और भी भयावह है कि पशुओं पर प्रयोग करने वाली ये कंपनियां पशुओं पर प्रयोग न करने वाली छोटी कंपनियों को खरीदती हैं और फिर उनका उपयोग अपनी बदनीयती को छिपाने के लिए करती हंै। उदाहरण के लिए द बॉडी शॉप में अक्सर ऐसे ग्राहक आते हैं जो पशु परीक्षण रोधी वक्तव्य मांगते हैं। परंतु द बॉडी शॉप का स्वामित्व लौरियल के पास है जिसके पशु परीक्षण के मामले में नैतिक मूल्य सबसे खराब है और इसकी नीतियों में परिवर्तन हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया है। बर्टस बीस (क्लोरेक्स के स्वामित्व वाली) और टॉम्स आॅफ मेने (स्वामी: कोलगेट-पामोलिव) जैसे छोटे ब्रांडों को क्रूरता मुक्त माना जाता है।

कोई सोचता होगा कि रेजर और हेयर रीमूवर कंपनियों को पशुओं पर प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होती होगी परंतु ये कंपनियां अभी भी पशुओं को अपने रेजर के पर्याप्त रूप से तेज धार वाले होने को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें काटती-पीटती है जिनमें कुछेक है - बिक कारपोरेशन, ब्रॉन, जिलेट कंपनी, नायर, शीक, वीट। ये ब्रॉण्ड भी ऐसा करते हैं: बैण्ड-एड, पैम्पर्स, सेवलॉन, वैसलीन, विक्स। और सैनेटरी नैप्किन कंपनियां भी ऐसा करती है। यह देखने के लिए कि कौन सा वाला सबसे अधिक रक्त सोखता है। किसी पशु को काटना और फिर रक्त को देखने वाले परीक्षण जिसमें आॅल्वेस, केयरफ्री, फैमफ्रेश, स्टेफ्री शामिल है।

ये तो कुछेक हैं। इनमें से किसी को पशुओं पर परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि कोई भी पशु परीक्षण विश्वसनीय नहीं है। वस्तुत: आंकड़े दशार्ते है कि सभी पशु परीक्षणों में से 90 प्रतिशत को तो अस्वीकार कर दिया जाता है। तो ये कंपनिया पशुओं पर परीक्षण क्यों करती हैं? मैं आपको फिर कभी बताऊंगी। पर पहले-पहल तो आप पशुओं पर परीक्षण किए गए उत्पादों को खरीदते ही क्यों हैं? इस सूची में शामिल होने वालों का उपयोग बंद कर दीजिए - जिसमें आपकी अपनी अगली विदेशी लग्जरी कार शामिल है।

(लेखिका केन्द्रीय मंत्री व पर्यावरण विद् हैं)