...किस झूठ से हुआ हिंसा का तांडव ?

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 12-Apr-2018


एक ओर झूठ पर झूठ है दूसरी ओर जीत पर जीत है। इन शब्दों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के स्थापना दिवस पर अपने संबोधन और कार्यकर्ताओं के सवाल पर यह बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि हमें संयम और मर्यादा में रहकर सच्चाई पर अडिग रहकर अपना काम करना चाहिए। अपने मर्यादित शब्दों के साथ राहुल गांधी के झूठे आरोपों का यह उत्तर था। दो अप्रैल 2018 का दिन कांग्रेस नेतृत्व की एक झूठ से पैदा हुई हिंसा ने 14 लोगों को मौत के हवाले कर दिया और करोड़ों की सम्पत्ति हिंसा की आग में स्वाहा हो गई। दलितों के नाम पर और एस.सी./एस.टी में बदलाव को लेकर यह हिंसक आंदोलन हुआ। मध्यप्रदेश के ग्वालियर, भिण्ड में तीन-तीन और मुरैना में एक की हत्या हुई। मौत की अधिकृत संख्या के अनुसार म.प्र. में सात लोग मारे गए। पूरे देश में चौदह लोग मारे गए। जगह-जगह रेल की पटरियां उखाड़ी गई, एम्बुलेंस को रोका गया जिससे एक नवजात और एक वृद्ध की मृत्यु हो गई। दो अप्रैल सोमवार का दिन उपद्रवियों के हवाले रहा, चारों ओर हिंसा का तांडव दिखाई दे रहा था। पुलिस की लाठी गोली खुलकर इसलिए नहीं चली कि दलितों के नाम पर आंदोलन था, दलित राजनीति का शिकार होने का डर पुलिस को भी था। एस.सी./एस.टी. एक्ट को समझे बिना ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट के द्वारा हिंसक आंदोलन करने वालों को धन्यवाद देकर इसका समर्थन किया। इसके बाद राहुल गांधी ने कहा कि एस.सी./एस.टी. एक्ट को खत्म करने के विरोध में यह आंदोलन है। राहुल गांधी को लगा कि इस झूठ से दलितों के सारे वोट कांग्रेस की झोली में आ जाएंगे। जबकि सच्चाई यह है कि इस एक्ट में सर्वोच्च न्यायालय ने कोई छेड़छाड़ नहीं की। केवल यह कहा कि इस एक्ट के तहत होने वाली गिरफ्तारी के पहले जांच होना चाहिए। किसी निर्दोष की गिरफ्तारी नहीं हो, इसके लिए केवल शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हो। हालांकि कोर्ट के इस कथन पर भारत सरकार ने पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) दायर कर दी। जो इस आंदोलन को उग्र कर रहे थे, उन्हें यह भी नहीं पता था कि यह एक्ट क्या है और सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्या है। एक सर्वे के अनुसार इस आंदोलन में शामिल 90 प्रतिशत लोगों को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं थी।

राहुल गांधी के झूठ से लोगों को लगा कि यह हिंसक आंदोलन

एस.सी./एस.टी. एक्ट को खत्म करने के खिलाफ है। तीन अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हमने इस एक्ट में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है, लेकिन न्यायालय ने अपने निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि वे निर्दोष को बिना आधार के गिरफ्तारी के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए अपने निर्णय पर अडिग हैं। हिंसक आंदोलन का मूल कारण इस एक्ट को खत्म करने की झूठ है, इस आंदोलन को लेकर संसद में भी हंगामा हुआ और मोदी सरकार पर दलित विरोधी होने के आरोप लगाए। कांग्रेस की झूठ से वर्ग संघर्ष जैसी स्थिति पैदा हो गई। समाज को बांटकर वोट प्राप्त करने का चरित्र कांग्रेस का रहा है। समाज को जाति, संप्रदाय में भेद पैदा कर अपने राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति गत 70 वर्षों से कांग्रेस ने की है। अपनी उसी कपटी नीति को दो अप्रैल को भी कांग्रेस ने अपना हथियार बनाया। यही हथकंडा कांग्रेस द्वारा कर्नाटक चुनाव में भी अपनाया जा रहा है। वहां लिंगायत समुदाय के वोट करीब 18 प्रतिशत हैं, लिंगायतों को हिंदू समाज से अलग कर उन्हें अलग धर्म का दर्जा देने का विधेयक कर्नाटक सिद्धारमैया सरकार ने पारित कर केंद्र को भेज दिया। जबकि लिंगायत सम्प्रदाय हिंदू समाज का अटूट अंग है, हिंदू को बांटकर गुलामी को स्थिर करने की साजिश अंग्रेजों ने की और अब हिंदुओं में भेदभाव पैदा करने की राजनीति कांग्रेस दलीय स्वार्थ के लिए कर रही है। इसी प्रकार की एक झूठ का सहारा 1984 में राजीव गांधी ने लिया। इस संदर्भ में उस घटनाक्रम का उल्लेख करना होगा कि 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिराजी के दो अंग रक्षक सतवंतसिंह और बेअंतसिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इंदिराजी के बेटे राजीव गांधी, जो पायलट थे उनको प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाकर देश की बागडोर सौंप दी। पूरे देश में कांग्रेस द्वारा सिख विरोधी हिंसा का तांडव प्रारंभ हो गया। दिल्ली में हुए हत्याकांड को राजीव गांधी ने सही बताते वोट क्लब पर आयोजित रैली में कहा कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो उसके नीचे धरती हिलती ही है। स्पष्ट है कि उन्होंने इस कथन  के द्वारा कांग्रेसियों की सिख विरोधी हिंसा का समर्थन कर आग में घी डालने का काम किया। पूरे देश में कांग्रेसियों की अगुवाई में सिख विरोधी दंगे भड़के। केवल दिल्ली में ही तीन हजार सिखों की हत्या की गई और अरबों की सम्पत्ति नष्ट हो गई। इंदौर में भी सिखों की सम्पत्ति और राजबाड़ा को भी आग के हवाले कर दिया गया। गुरुद्वारा के एक निहंग को जिंदा आग में झोंक दिया गया। राजीव गांधी के एक कथन से पूरा देश सिख विरोधी दंगों की आग में जलने लगा। यही नहीं इंदिराजी का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था कि 31 अक्टूबर की शाम को ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने राजीव गांधी को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई। कांग्रेस के रणनीतिकार इंदिरा की हत्या से उपजी सहानुभूति का राजनीतिक लाभ लेने से भी नहीं चूके। लोकसभा भंग कर दी गई और पैतालीस दिनों के अंदर ही चुनाव कराने की घोषणा हो गई। कांग्रेसियों ने स्थान-स्थान पर इंदिराजी के अस्थि कलश की यात्राएं निकाली। सहानुभूति लहर पैदा हुई और इसका पूरा लाभ कांग्रेस को मिला।

542 लोकसभा सीटों में कांग्रेस को रिकार्ड 402 सीटें मिली। किसी प्रमुख व्यक्ति की मृत्यु से उपजी सहानुभूति का लाभ लेने की कोशिश आज भी होती है। वही कपटी राजनीति, वही तरीका और वही झूठ पर आधारित राजनीति का चरित्र कांग्रेस का रहा है। जो अपनी नेता इंदिरा की हत्या से उपजी सहानुभूति को भुनाने में भी कांग्रेस पीछे नहीं रही तो फिर सत्ता सुख के लिए कांग्रेस कितने ही नीचे गिर सकती है। कांग्रेस ने न अपने पूर्वजों का अनुसरण किया और न कभी राजनैतिक मूल्यों की परवाह की। परिवार की पार्टी होने से नेहरुजी के समय उनका कथन ही उसका नीति पथ रहा। उनके बाद इंदिराजी, राजीव जी और अब सोनिया-राहुल की बातें ही कांग्रेस की नीति हो गई। राजीव गांधी चाहे राजनीति के लिए नौसिखिये हों, लेकिन उन्होंने अध्ययन के साथ अपनी बात प्रस्तुत की। उनकी उस बात को आज भी दोहराया जाता है कि भोजन के लिए जो एक रुपया केंद्र भेजता है उसका 15 पैसा ही योजना में लगता है और 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। भारतीय राजनीति की विडंबना और कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि उन्हें राहुल गांधी ऐसे अध्यक्ष मिले हैं जिनकी झूठ की पोल खुल जाती है।

जब एस.सी./एस.टी. एक्ट को समाप्त करने की झूठ से देश में हिंसा का तांडव हुआ, दूसरे दिन ही इस झूठ को सामने रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हमने इस एक्ट में कोई छेड़छाड़ नहीं की। कांग्रेस की झूठ बार-बार पराजित हो रही है और भाजपा बार-बार विजयी परचम फहरा रही है। 20 राज्यों में भाजपा की एनडीए सरकारें हैं। भाजपा के 11 करोड़ सदस्य है, इतने सदस्य  दुनिया की किसी पार्टी के नहीं हैं। मतदान केंद्र तक भाजपा कार्यकर्ता मुकाबले के लिए तैनात हैं। इस संगठन शक्ति के सामने संगठन स्तर पर मुकाबले की स्थिति किसी दल में नहीं है। नरेंद्र मोदी की हिमालयीन लोकप्रियता का सामना करने के लिए गैर भाजपाई गठबंधन या मोर्चा बनाने की पहल हो रही है। इस प्रकार का भानुमती का कुनबा राजनीति को कितना प्रभावित कर सकेगा। इसकी समीक्षा और बहस चल रही है। जंगल के सियार, भेड़िए, सांप, नेवले, सूअर आदि मिलकर भी सिंह का मुकाबला नहीं कर सकते, केवल कोशिश कर सकते हैं। इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार यह भी सामने आया कि दो अप्रैल को हुई हिंसा सुनियोजित थी, इसके लिए ट्रेनिंग दी गई थी। हिंसा भड़काने वाले संगठनों को चिन्हित कर कार्यवाही की जा रही है। देश को हिंसा की आग में जलाने के दोषी कौन हंै, इसकी सच्चाई सामने आना चाहिए। चाहे भीमा कोरेगांव की घटना हो या दो अप्रैल की हिंसा हो। दलितों के नाम पर की गई सुनियोजित हिंसा की सच्चाई को देश जानना चाहता है।

(लेखक- वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक हैं)