बदले राजनीतिक समीकरणों में युवराज के दर पहुँचे महाराज

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 17-May-2018

राजनीतिक गपशप

 राजनीति जो न कराए सो थोड़ा है। यहां भूत, भविष्य सब बेकार की बातें होती हैं और सिर्फ वर्तमान के लाभ-हानि का गणित ही हल किया जाता है। यह बात एक बार फिर पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराने के महाराज और कांग्रेस सांसद के साथ ताजा-ताजा कांग्रेस की चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष बने ज्योतिरादित्य सिंधिया के आज राघौगढ़ किले के चश्मो चिराग एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सुपुत्र विधायक जयवर्धन सिंह के दर यानि किले में आमद दर्ज कराने से प्रमाणित हो गई  है।  इस दौरान श्री सिंधिया की राजसी ठाठ-बाट से आगवानी की गई, वहीं श्री सिंधिया ने दिग्गी परिवार के साथ भोजन भी किया। इतना ही नहीं, श्री सिंधिया ने बदले राजनीतिक समीकरणों में अपने उद्बोधन के दौरान दिग्गी पुत्र जयवर्धन सिंह को देश का भविष्य भी बताया है। पूर्ववर्ती राजघरानों से जुड़े लोगों की मानें तो पिछले करीब 5 दशकों में ऐसा दृश्य पहली बार देखने को मिला है, जब पूववर्ती ग्वालियर राजघराने का कोई सदस्य राघौगढ़ किले के जीने चढ़ा हो। पूर्व केन्द्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया जीवित थे तब भी और अब जब उनके पुत्र सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराने के मुखिया की जिम्मेदारी निभा रहे हैं तब भी वह अब तक राघौगढ़ किले पर नहीं पहुँचे है। इसके तीन कारण रहे हैं, पहला राजघरानों के प्रोटोकॉल के लिहाज से देंखे तो राघौगढ़ किला रहा है और ग्वालियर महल।

इसके मद्देनजर किले के मुखिया राजा कहलाते हैं और महल के मुखिया को महाराज का संबोधन मिलता है, इसक मद्देनजर किला, महज का अधीनस्थ माना जाता है। दूसरे कारण में किले के मुखिया दिग्विजय सिंह भले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हों, किन्तु राजनीति में पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. माधवराव सिंधिया का कद अपने पूरे जीवनकाल में श्री सिंह से काफी ऊँचा रहा है, इसके बाद उनके पुत्र संासद ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक में पदार्पण और शिवपुरी-गुना संसदीय क्षेत्र से संासद चुने जाने के बाद दिग्गी राजा का परोक्ष रुप से प्रदेश की राजनीति में दखल कम होता चला गया और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया तेजी से कांग्रेसियों की उम्मीद बनकर उभरे। दोनों कारणों से किले पर महल भारी रहा। तीसरे कारण में किले और महल की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को गिना जाता है।  गौरतलब है कि राघौगढ़ किले के मुखिया एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराने से उस समय से बनी हुई है, जब पूर्व केन्द्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया जीवित थे। यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा श्री सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीति में पदार्पण और उनके सांसद चुने जाने के बाद भी कम होने के बजाए स्वाभाविक रुप से और बढ़ गई। माधवराव के जीवित रहते श्री सिंह ने उन्हें अपनी कार्यशैली के जरिए प्रदेश की राजनीतिक में उन्हे पीछे धकेलने का काम किया।  एक कार्यक्रम में तो श्री सिंह ने केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद माधवराव सिंधिया को ग्वालियर जिले के सम्मानित नेता के रुप में संबोधित किया था। यह माधवराव का अपना स्वभाव था कि उन्होंने दिग्गी की इस राजनीतिक चतुराई को कभी गंभीरता से लेकर तवज्जो नहीं दी और प्रदेश में राजनीतिक लिहाज से चित्त होते चले गए। जिसका खामियाजा उन्हें कम उनके समर्थकों को अधिक भोगना पड़ा। इसके विपरीत उनके पुत्र सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का स्वभाव आक्रामक है। यहीं कारण रहा कि प्रदेश कुछ सालों में ऐसे कई मौके सामने आए जब कांग्रेसी राजनीतिक के यह विपरीत धु्रव राजनीतिक लिहाज से सीधे तौर पर पर आमने-सामने हुए। यहां तक की एक-दूसरे के गढ़ में किसान रैलियों के नाम पर शक्ति प्रदर्शन तक किया गया। इस गुत्थमगुत्था को रोकने के लिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा था। बहरहाल अब ऐसा क्या हुआ है जो  रेल की यह दो पटरियां मिलने की कोशिश कर रहीं है। इस सवाल का कीड़ा श्री सिंधिया के किले के जीने चढऩे के बाद से राजनीति में रुचि रखने वाले हरेक के दिमाग में कुलबुला रहा है। दरअसल प्रदेश में बदले राजनीतिक समीकरणों में आज दोनों ही नेता यह समझ चुके है कि अब अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग से काम नहीं चलेगा। अंगद के पांव की तरह जमे बैठे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उखाड़ फेंकने के लिए उन्हे एक होना ही होगा। अन्यथा चौथी बार प्रदेश में भाजपा का परचम लहराने से शायद ही रुक पाए।

पहली जरुरत श्री सिंधिया की है, वह फिर बार कांग्रेस की चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष बन चुके है, इसके मद्देनजर प्रदेश में कांग्रेस को जिताने की एक बड़़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के परोक्ष विरोध के चलते ही उनका कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री का उम्मीद्वार बनने का सपना टूट चुका है। अब वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में श्री सिंह की तरफ से और कोई अड़ंगा नहीं चाहते हैं, कारण दिग्गी के मुकाबले अभी उनका राजनीतिक भविष्य काफी लंबा है, वहीं दिग्विजय सिंह भी यह समझ रहे हैं कि वह भले ही कुछ कहे किन्तु कम से कम प्रदेश की राजनीति में अब उनके पुराने दिन लौटने वाले नहीं हैं और उनके पुत्र राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह फिलहाल पूरी तरह परिपक्व नहीं है। इसलिए वह श्री सिंधिया के जरिए अपने पुत्र को स्थापित करने के इच्छुक है। ज्योतिरादित्य और जयवर्धन की आयु में भी दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य के मुकाबले अधिक अंतर नहीं है, दोनों को युवा माना जा सकता है, जबकि दिग्विजय सिंह बुजुर्ग हो चुके हैं। इस लिहाज से दोनों एक-दूसरे की जरुरत है। चूंकि बड़ी और पहली जरुरत श्री सिंधिया की है, जैसा कि ऊपर बता चुके हैं, इसलिए वह अपने महल से निकलकर किले के जीने चढऩे मजबूर हुए। हालांकि सिंधियाई कांग्रेसी यह प्रचारित कर सुकून पा रहे हैं कि न्यौता किले की तरफ से आया था, जिसे उनके महाराज ने स्वीकार किया है। बहरहाल  अब जो भी हो, किन्तु किले और महल की इस जुगलबंदी  का असर प्रदेश की राजनीति पर पडऩे से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैसे ऐसी कोशिशें दोनों तरफ से पहले भी हो चुकीं है, किन्तु तब उसने ईमानदारी बहुत कम और राजनीतिक स्वार्थ बहुत अधिक था। इस बार क्या है? यह तो ज्योतिरादित्य और जयवर्धन ही बता सकते हैं। अगर वह नहीं भी बताते हैं तो समय आने पर सब सामने आ ही जाएगा।