भक्ति से संस्कार निर्माण और संस्कार से राष्ट्र निर्माण होगा : सुरेश जैन

भक्ति से संस्कार निर्माण और संस्कार से राष्ट्र निर्माण होगा : सुरेश जैन
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भारतीयों को अपने इतिहास से जुड़ना आवश्यक है क्योंकि उसी में भविष्य की उज्ज्वल संभावना निहित है

नईदिल्ली। केशव महाविद्यालय में "मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति", दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्त्वावधान में "भारतीय भक्ति-परंपरा में मानव मूल्य" विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में अध्यक्ष रूप में प्रोफेसर निरंजन कुमार (अध्यक्ष मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति , डीन,प्लानिंग ,दिल्ली विश्वविद्यालय) मुख्य अतिथि के रूप में सुरेश जैन राष्ट्रीय संगठन मंत्री, भारत विकास परिषद्, विशिष्ट अतिथि प्रो किरण हज़ारिका, इग्नू , कॉलेज की प्राचार्या प्रो० मधु प्रुथी और कॉलेज के हिन्दी विभाग की प्रभारी डॉ रोली बंसल, आन्तरिक गुणवत्ता प्रकोष्ट की संयोजिका प्रो जगनीत कौर आनंद तथा हिंदी राजभाषा कार्यान्वयन समिति संयोजिका प्रो अर्पणा शर्मा विराजमान थे। कार्यशाला का संचालन डॉ० रिचा शर्मा ने किया।

कार्यशाला का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन और कुलगीत से हुआ। प्रोफेसर निरंजन कुमार ने कार्यशाला के विषय "भारतीय भक्ति-परंपरा और मानव मूल्य" विषय का परिचय प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमें अपने इतिहास को जानना चाहिए और जो इतिहास को नहीं जानता है वह अपने भविष्य को नहीं समझ सकता। भक्ति ने सामान्य उन जन को जीवन में लोकतांत्रिक अधिकार और भागीदारी दी, जो उन्हें आधुनिक काल में संविधान ने दिया। भक्ति वह साधना है, एक चिंतन है, वह व्यवहार है जिसमें लोकतांत्रिक, समानता और मानवता के मूल्यों का प्रकाशन हुआ। यही नहीं भक्ति राष्ट्रीय एकता की भी सूत्रधार रही है। तत्पश्चात प्रोफेसर किरण हज़ारिका ने अपने वक्तव्य में नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों को रेखांकित किया। उनके अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय का यह मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम आज की शिक्षा-पद्धति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय ज्ञान को पाठ्यक्रम से जोड़ना परम आवश्यक बताते हुए उन्होंने चाणक्य और आर्य भट्ट आदि को विद्यार्थियों से परिचित और उनके योगदान से अवगत करवाना आवश्यक बताया ।

मुख्य अतिथि सुरेश जैन ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत के विविध प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीयों को अपने इतिहास से जुड़ना आवश्यक है क्योंकि उसी में भविष्य की उज्ज्वल संभावना निहित है। उन्होंने शिक्षक को राष्ट्र निर्माता का रूप बताया जो समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति-मात्र का संवेदनशील होना समाज और राष्ट्र के लिए हितकारी है। संस्कार हमारे जीवन मूल्यों और साथ ही शिक्षा का केंद्र होने चाहिए। यह भी कि भक्ति परंपरा इस देश के गुरुओं के आस-पास केन्द्रित है। भक्ति से संस्कार निर्माण और संस्कार से राष्ट्र निर्माण संपन्न हो सकेगा। सत्र का समापन प्रो जगनीत द्वारा धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। इस कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में में रिसोर्स पर्सन के रूप में प्रो संध्या गर्ग और डॉ सत्यप्रिय पांडेय और प्रतिभागियों में विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापक और प्राध्यापिकाओं तथा भारी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

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