मेवात में दहशत, हिन्दू पलायन को मजबूर

मेवात में दहशत, हिन्दू पलायन को मजबूर
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मेवात से लौटकर अनिता चौधरी

नईदिल्ली। मेवात हिंसा में नूह के भाड़स गाँव के मारे गए शति सैनी के परिवार को दोनों बेटियों की सुरक्षा का डर सता रहा है। शति सैनी को 31 जुलाई को नूह में हुई हिंसा में कट्टरपंथियों ने बड़ी बेरहमी से मार डाला था। लोगों से पूछते हुए ‘स्वदेश’ की टीम जब शति सिंह के घर पहुंची तो हालात रोंगटे खड़े करने वाले थे। एक छोटे से घर में उनकी पत्नी बेसुध पड़ी थीं। उनका रो-रोकर बुरा हाल था। पड़ोस की महिलाएं उन्हें ढांढस देने का प्रयास कर रहीं थीं लेकिन आंखों से अश्रुओं की धार रुक नहीं रही थी। एक कोने में खड़ी शति सैनी की दो बेटियां कुछ कहने की स्थिति में नहीं थीं। पथराई आंखों में बस परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता साफ झलक रही थी कि पापा के बाद अब या होगा? मुसलमानी बस्ती में मां और हम बच्चियों का कौन सुरक्षा देगा?


हालांकि शक्ति सैनी के दो बेटे भी हैं लेकिन उनके कंधे अभी इतने मजबूत नहीं हुए हैं कि परिवार का भार ढो सकें। ऐसे में बेबश मां के सामने बस एक ही सवाल है, जो बार-बार कुरेद रहा है कि जवान बेटियों को बुरी नजरों से कैसे बचाया जाए? शति सैनी 31 जुलाई को घर से यह कह कर निकले थे कि गुरुकुल दोस्त से मिलने जा रहे हैं। गुरुकुल में छोटे-छोटे विधार्थी वेद और सनातन शास्त्र की शिक्षा लेते हैं। उनके दोस्त वहीं शिक्षक थे। उन्हें नहीं पता था कि नल्लहड़ में हिंसा भडक़ चुकी है और उसकी आग भाड़स गाँव और बडक़ली बाजार तक भी पहुँच चुकी है। गुरुकुल पर करीब 400 से 500 मुसलमान हाथों में कट्टे और खतरनाक हथियार लेकर भाड़स के महर्षि दयानंद गुरुकुल पर हल्ला बोले हुए थे।

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हिन्दुओं पर हमले के लिहाज से कट्टरपंथियों के लिए गुरुकुल सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य था। हथियारों से लैस भीड़ शक्ति सैनी को देखते ही उन्हें मौत के घाट उतार दिया। अगले दिन उनका मृत शरीर सडक़ पर पड़ा हुआ मिला जिस पर असंख्य चाकुओं के निशान थे। शक्ति सैनी के भाई हरकिशन सिंह सैनी ने ‘स्वदेश’ से बात करते हुए कहा कि अब चिंता इस बात की है कि दोनों लड़कियों को कैसे सुरक्षित रखा जाए ? भाई ने तो गुरुकुल के बच्चों को बचा लिया लेकिन उनकी बच्चियों की रक्षा इस मुस्लिम बाहुल्य नूह और मेवात में कैसे की जाए ? हरकिशन सिंह ने कहा कि जिस मेवात में वो रहते हैं वह ‘मिनी पाकिस्तान’ बन चुका है। यहाँ हालात इतने बुरे हैं कि सुरक्षा के लिहाज से लड़कियों की शादी भी दिन में की जाती है वरना शुभ मुहूर्त पर डीजे बजाने पर बरातियों के साथ मार-पीट की जाती है और कीमती सामान लूट लिया जाता है। उपद्रवी घर में घुसकर महिलाओं के साथ बदतमीजी करते हैं।

हरकिशन सिंह आपबाती सुनाते-सुनाते भावुक हो जाते हैं। कहते हैं इस क्षेत्र में आए दिन हिन्दू लड़कियां ‘लव जिहाद’ का शिकार होती हैं । इसीलिए अब उन्हें भाई के मौत का दर्द कम और बेटियों की सुरक्षा की चिंता ज्यादा सता रही है । रोते हुए उन्होंने कहा कि नूंह के भाईचारे में हिन्दू बस ‘चारा’ बन कर रह गए हैं । परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हम पलायन को मजबूर हैं। पलायन से पहले अपनी जमीन-जायदाद औने-पौने दामों में स्थानीय मुसलमानों को बेच कर जा रहे हैं ताकि आगे का गुजर हो सके। अरावली पर्वत से घिरे इस तराई क्षेत्र की जमीनों पर अब मुसलमानों का कब्जा है। मेवात हिंसा के करीब 9-10 दिन बाद भी दिल्ली से करीब 90-95 किलोमीटर दूर आसपास के क्षेत्र में चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। सुरक्षा चाक चौबंद हैं। कड़ी पहरेदारी के बीच आम जन जीवन को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है लेकिन डर का आलम ऐसा है कि लोग सहमे हुए हैं और घरों में महिलाओं और बेटियों की रखवाली कर रहे हैं। नलहड़ से लेकर भाड़स गाँव और पुन्हाना शृंगार तक एक ही बात सुनाई दे रही है कि नूह के हिंसा की आग भले बुझ जाए लेकिन यहाँ के हिंदुओं की रोजमर्रा की जिंदगी अब राख बन चुकी है। मेवात अब ‘मिनी पाकिस्तान’ बन चुका है।

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