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बाबू यानी काले मुँह वाला विदेशी बंदर
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विजय कुमार गुप्ता
मथुरा। हममें से शायद ही किसी को इस बात का पता होगा कि बाबू या बाबूजी का मतलब काले मुँह वाला विदेशी बंदर होता है। इसको अंग्रेजी में बबून कहते हैं। यह प्रजाति बंदर की है जो लंगूरों से मेल खाती है।
इसका इतिहास बड़ा रोचक है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब भारत में पैर पसारे तब अंग्रेज लोग सबसे पहले कलकत्ता पहुंचे और व्यापार की शुरुआत भी उन्होंने कलकत्ता से ही की। वहां के लोगों का चेहरा-मोहरा व रंग-रूप देखकर अंग्रेज बंगालियों को बबून कहकर चिढ़ाने लगे। चूंकि हमारे देश में उस समय अंग्रेजी का ज्ञान लोगों को नहीं था। सीधे साधे बंगाली लोग यह तो समझ नहीं पाये कि ये हमको लंगूर कहकर चिढ़ा रहे हैं। वे बबून को कोई सम्मानजनक शब्द समझ कर खुश होने लगे।
इसके पश्चात् तो वहां खासकर बंगाल और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में बबून का अपभ्रंश होकर बाबुन हुआ और फिर बाबुन का अपभ्रंश होकर बाबू हो गया। सभी लोग एक दूसरे को बाबू-बाबू कहने लगे। इसके बाद बंगाल से लगे बिहार आदि भारत के पूर्वी क्षेत्रों में बबुआ भी कहा जाने लगा। बाबू शब्द से बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। उसके बाद बिहार व उड़ीसा का नंबर और फिर धीरे-धीरे पूरे भारत में बाबू, बाबूजी, बाबू साहब और बबुआ का प्रकोप फैल गया।
मुझे कलकत्ता में रहने का काफी अवसर मिला है। वहां मैंने देखा कि बड़ों को बाबू कहकर सम्मान दिया जाता है। वहां के नौकर अपने मालिकों को बाबू या बाबू साहिब कहते हैं। चारों ओर बाबू ही बाबू का बोल बाला रहता है। उसके बाद तो जब भी कोई मुझे विजय बाबू या बाबूजी कहता है तो लंगूर का स्मरण हो आता है।