आदिगुरू शंकराचार्य के अद्वैत संसार को अपना रहे कई देश

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 25-Dec-2017

हमारी भारतीय संस्कृति के मूल में सभी तत्व मौजूद है, जिससे मानव शरीर और व्यवहार बना है। अमेरिका के नासा ने तो अब औंकार स्वर की गहराई में जाने के प्रयास शुरू किए हैं। हमारी संस्कृति कोई ढकोसला नहीं है। आदिगुरू शंकराचार्य ने सदियों पहले जो अद्वैत संसार को दिया है उसे आज कई देशों में अपनाया और समझा जा रहा है। आज संसार को भाव जगत को ठीक करना होगा। आज जो भावनाएं चलित मानव शरीर में अवरोध उत्पन्न कर रही है उन्हें संकल्प शक्ति और तत्व शक्ति से दूर करना होगा। ग्लैक्सि और सूर्य में अद्वैत दर्शन मौजूद है। यहां ऊर्जा है और धर्म भी है। मानव शरीर में सूर्य समान उर्जा के सहारे धर्म को ठीक करना होगा। भाषा में धर्म जगाना होगा, तभी संसार संस्कृति हममे मौजूद रहेंगे, जिससे परिवार में संस्कारों का निर्माण होगा। 

हमारी संस्कृति का मूल आनंद है और इस आनंद में पंच तत्व है। क्या हमारी संस्कृति में कोई हिरणकश्यप तो कार्य नहीं कर रहा है। समाज को इससे देखकर, समझकर इससे दूर करना होगा। हमारे कर्म ज्ञान और सन्यास के विषय को पुन: गढऩा होगा। 

कन्या भ्रूण हत्या न हो, तब तो मानव में आत्मा है

संत संविद सोमगिरी महाराज ने समाज के सामने आने वाली नस्ल और देश के भविष्य पर विचार रखते हुए कहा कि आज समाज के मानव में आत्मा का लोप होता जा रहा है। यह आत्मा दुराचार और कन्या भ्रूण हत्या जैसे कार्यों की ओर बढ़ रही है। समाज में यह नहीं होगा, तभी मानव में पुन: आत्मा का प्रवेश होगा। आहार, निंद्रा, भय और मिथुन लय हो, तो विकास में सहयोगी है। आज मानव मूल्य की अवधारणाओं को भी ठीक करना होगा। समाज में पौरूष को जागृत करना होगा, जिससे मानवता के प्रति जीवन में कर्म उपयोगी सिद्ध हो सकेंगे। हमारे अहंकार पर लगाम डालकर लक्ष्य और दृष्टि ठीक करनी होगी। समाज वहीं कहलाता है, जहां सब कुछ लक्ष्य में एक समझ के साथ हो।

जिससे समस्याओं का समाधान निकल सकता है। यह एक सोच और परिपक्व समझ की यात्रा है। वेदांत दर्शन में आज की सामाजिक, मानसिक और व्यवहारिक समस्याओं का समाधान है। हर वर्ग का अपना एक धर्म है। चाहे वह किसान हो, व्यापारी हो। इनमें सब में दर्शन है, शक्ति है, उर्जा है और इन सब की समझ ओर साक्ष्य को जगाना जरूरी है। यह एकात्म यात्रा इतिहास बनाएगी।