शिव तांडव की अनोखी शिव प्रतिमा कहाँ स्थापित है, जानिए

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 31-Jul-2017


महोबा।
महोबा के विख्यात शिव तांडव मंदिर में उत्तर भारत की अनोखी शिव प्रतिमा स्थापित है। एक हजार साल से अधिक प्राचीन भगवान शंकर की तांडव नृत्य करती इतनी विशाल व सिद्ध मूर्ति उत्तर भारत में कहीं और नहीं पाई जाती। सावन के महीने में जब शिव पूजन व दर्शन के लिए लोग दूर-दूर तक जाते हैं तब इस अनोखी प्रतिमा का दर्शन उनके लिए सब प्रकार से कल्याणकारी साबित होता है।

यूं तो हर रोज यहां सैकड़ो लोग दर्शन करने आते हैं पर सावन के सोमवार में तो यहां भारी जन सैलाब उमड़ता है। आश्चर्यजनक है कि 16 फीट ऊंची तांडव नृत्य करती भगवान शंकर की एक हजार साल पुरानी इस प्रतिमा के बारे में बुंदेलखंड के बाहर के लोगों को यथेष्ठ जानकारी ही नहीं है। वैसे यह सिद्ध मंदिर न केवल एतिहासिक विरासतों में गिना जाता है अपितु पुरातत्व संरक्षित भी है।

बात वर्ष 1183 की है, जब दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया। यहां के चंदेल राजा परिमाल देव ने उरई के राजा माहिल की बातों में आकर अपने वीर सेनापति आल्हा व ऊदल को राज्य से निर्वासित कर दिया था और वह कन्नौज के राजा जयचंद के यहां शरण लिये थे। इसके चलते दिल्ली नरेश को महोबा फतह करने का यही सबसे उपयुक्त समय लगा। सावन का महीना था। यहां सावन में पूर्णिमा के दिन कजली विसर्जन की सदियों पुरानी परंपरा है। इसके चंद दिन पूर्व दिल्ली की सेना ने महोबा को चारों ओर से घेर चंदेल राजा से संधि के लिए राजकुमारी चंद्रवल का डोला, नौलखा हार, हाथी व खजुराहो की बैठक मांगी।

राजकुमार ब्रह्मा रानी मल्हना ने इससे इनकार कर दिया तो युद्ध की नौबत आ गई। कजली का दिन आया तो सभी ने राज कुमारी चंद्रवल को समझाया कि वह कजली विसर्जन कीरत सागर की बजाय घर के कुंड में ही कर लें परन्तु राजकुमारी इसके लिए तैयार नहीं हुईं और अपनी सैकड़ों सहेलियों के साथ छुरी कटारी ले जौहर को निकल पड़ीं। राजकुमार ब्रह्मा उनके पुत्र इंदल व उरई के राजा माहिल के बेटे रंजित ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से लोहा लिया। खबर मिलने पर आल्हा ऊदल भी अपने मित्र कन्नौज के राजकुमार लाखन व उनकी सेना ले समय से आ गए। भीषण युद्ध में कीरत सागर की कई वर्ग किमी. जमीन खून से लाल हो गई जो अब तक लाल ही है। इस तरह चंदेली सेना ने दिल्ली नरेश के छक्के छुड़ा अपने स्वाभिमान की रक्षा की। इसी विजय के बाद भगवान शंकर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने को महारानी मल्हना ने कीरत सागर के दक्षिण में स्थित गोरख गिरि पर्वत पर भगवान शिव की 16 फीट ऊंची तांडव नृत्य करती विशाल प्रतिमा का निर्माण करा वैदिक अनुष्ठान के साथ उनकी प्राण प्रतिष्ठा कराई।

उस दौरान तंत्र साधना के सूत्रधार महान संत गुरु गोरखनाथ भी इसी पर्वत पर साधना कर रहे थे। इस कारण सिद्ध स्थल होने के नाते प्रतिमा स्थापना के लिए यही पर्वत चुना गया। शंकर भगवान की यह आकर्षक मूर्ति पर्वत की शिला पर ही उत्कीर्ण की गई है। बाद में मुगल शासन के दौरान इस अनोखी प्रतिमा को क्षति पहुंचाने की तमाम कोशिशें हुई । ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व में साथ ही भक्तों का हर प्रकार का कष्ट निवारण करने वाली इस प्रतिमा का अपना आध्यात्मिक महत्व भी है। देश भर के शिवभक्तों के लिए यह प्रतिमा आकर्षण का केंद्र हो सकती है पर दुर्भाग्य यह है कि पुरातत्व संरक्षित स्मारक होने के बाद भी प्रचार प्रसार के अभाव में बुंदेलखंड से बाहर लोग इसके बारे में जानते ही नहीं।