सिद्धि समाप्त हो सकती है पर श्रद्धा नहीं

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 27-Sep-2017

मीरजापुर। राष्ट्रीय संत मोरारी बापू मंगलवार को शारदीय नवरात्रि के छठवें दिन राम चरित मानस प्रसंगों की ब्याख्या करते हुए मानस श्रीदेवी माँ जगत जननी कात्यायनी के सौम्य रूप की चर्चा ब्यासपीठ को प्रणाम करते हुए की।

बापू ने श्रीकृष्ण एवं राधा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तत्व चिंतन, सार्थक चिंतन और गरीब चिंतन ही सार्थक चिंतन है। प्रेमियों और साधको के लिये हरि चिंतन सार्थक है। हमें सत्कर्म करना चाहिये क्योंकि अच्छे कर्मो से ही हम स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ती कर सकते हैं। स्वर्ग या मोक्ष के लिये वीजा या टीकट की आवश्यकता नहीं होती। रोने का कोई समय नहीं होता, उसी प्रकार मां की गोद या शरण में जाने का कोई समय नहीं होता है। जो तत्व चिंतन है वही प्रभु चिंतन हैै। बापू ने कहा कि जो सरिता सिंधू में पहुंच गये हैं, अर्थात् जो अह्म त्याग दिया, वह अपना परिचय नहीं देते। जिसमे किसी का अहित ना हो वह चिंतन करे, वह चिंतन ही सार्थक चिंतन होता है।

दस महविद्या में त्रिपुल सुन्दरी में अच्छे शब्दों का समावेश किया गया है और बताया गया है कि यदि आपके लिये कोई अच्छे शब्द बोल रहा है या आप की कला की तारीफ कर रहा है या आपको महान बता रहा हो तो सबसे पहले देखें कि यह शब्द कहने वाला कौन है, वह जो शब्द बोल रहा है, उसके योग्य हैं या नहीं। क्योंकि जो अयोग्य होगा वह आपकी तारीफ अथवा आपके कला का बखान नहीं बल्कि हंसी उडाता है। बापू ने कहा कि मजाक जिन्दगी में हो लेकिन किसी के जिन्दगी से ना हो। सुनैना का अर्थ है सुन्दर नैन। सुन्दर नैन उसी के होते हैं जिसके दृष्टि सुन्दर होते है और दृष्टि का अर्थ दर्शन है।

बापू ने कहा कि मानस में दो गुप्त पात्र है एक तापस और दूसरा तापसी। जितने भी शक्ति है साधक है उनके लिए दस महाविद्या का त्रिपुल सुन्दरी का बहुत ऊॅचा स्थान है। श्री शब्द का प्रयोग परम पुरूष वाचक भी है और स्त्री वाचक भी है। यहां पर श्रीदेवी व पराम्बा माँ विन्ध्यवासिनी है, जिसके अन्दर सभी गुण और कला तथा शक्ति विद्यमान हो उसे ही श्रीदेवी कहा जाता है। बापू ने इसी कड़ी में कहा कि दुनिया में किसी भी प्रीति और प्रति के बारे में अपने अनुभव या तर्क से नहीं आंक सकते हैं क्योंकि हम कितने भी अनुभवी हो जाये और कितने भी महान जाये लेकिन राम और भरत के प्रति प्रेम को नहीं आंक सकते हैं।