मकर संक्रांति पर्व की पौराणिक मान्यताएं नहीं जानते होंगे आप, जानें ये रोचक फैक्ट

स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 11-Jan-2018

मकर संक्रांति 2018 में दो दिन मनाया जाएगा। कोई 14 जनवरी तो कोई 15 जनवरी को पूजा-अर्चना कर दान पुण्य करेगा। पर क्या आप जानते हैं कि मकर संक्रांति पर्व सूर्य संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। अगर नहीं तो आइए हम बताते हैं मकर संक्रांति पर्व के कुछ ऐसे ही रोचक मगर अनजाने फैक्ट...

* पंडित अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि संत-महर्षियों ने माना है कि मकर संक्रांति ऐसा पर्व है जिसका असर शरीर ही नहीं बल्कि आत्मा पर भी नजर आता है। इस पर्व का तेज इतना होता है, आत्मा की शुद्धि हो जाती है। 
* इसका प्रभाव व्यक्ति कीसंकल्प शक्ति बढ़ाता है।
* मनुष्य में ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। 
* इसीलिए मकर संक्रांति ऐसा पर्व है, जो व्यक्ति की संपूर्ण चेतना को विकसित करने वाला पर्व माना गया है। 
* संपूर्ण भारत मे इस त्योहार को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है।
* विष्णु धर्मसूत्र में स्पष्ट किया गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवद्र्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छ: प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं। इनमें तिल के जल से स्नान करना, तिल का दान करना, तिल से बना भोजन ग्रहण करना, जल में तिल का अर्पण करना, तिल से आहुति देना तथा तिल का उबटन लगाने जैसी क्रियाएं शामिल हैं।
* पुराणों में लिखा है कि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। 
* इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल माना जाता है। 
* इसे साधना का सिद्धिकाल भी माना गया है। 
* मान्यता है कि इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। * मकर संक्रांति के एक दिन पहले से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य पात्रों को दान दिया जाता है।
* रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 
* राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है।
* राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था।
* राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। 
* माना जाता है कि तभी से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है और इसने परंपरा का रूप ले लिया है।
* कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मातु गंगे का पदार्पण हुआ था, वह मकर संक्रांति का दिन था। 
* पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। 
* कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था कि 'मातु गंगे त्रिकाल तक जन-जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढिय़ों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। 
* सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली मानी गई है।
* सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। 
* यही वह भौगोलिक स्थिति है जिसके कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अद्र्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
* गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।'
* महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। 
* उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में किया गया था। 
* यही कारण है कि आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अघ्र्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति पर्व का चलन बन गई।