Bangladesh polls: Only 4 minority MPs win

बांग्लादेश चुनाव में हिंदू प्रतिनिधित्व सिमटा: 79 में से सिर्फ 4 जीते, 20 साल का ट्रेंड टूटा

बांग्लादेश चुनाव में 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में से सिर्फ चार जीत सके। पिछले 20 साल में 14-20 सीटों का ट्रेंड इस बार टूटा, विशेषज्ञों ने जताई चिंता।

By : हितेंद्र शर्मा
बांग्लादेश चुनाव में हिंदू प्रतिनिधित्व सिमटा: 79 में से सिर्फ 4 जीते, 20 साल का ट्रेंड टूटा

भोपाल। बांग्लादेश के हालिया संसदीय चुनाव के नतीजों ने एक नई बहस छेड़ दी है। 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन जीतकर संसद पहुंच सके सिर्फ चार। इनमें तीन हिंदू और एक आदिवासी उम्मीदवार शामिल हैं यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगभग 8% मानी जाती है, और पिछले दो दशकों में संसद में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व आम तौर पर 14 से 20 सीटों के बीच रहा है। इस बार तस्वीर अलग है और काफी कम भी।

79 में से चार, कैसे बदला समीकरण?

चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार थे। इनमें से चार उम्मीदवार Bangladesh Nationalist Party (BNP) के टिकट पर जीत दर्ज करने में सफल रहे. इसके उलट Jamaat-e-Islami Bangladesh का एकमात्र हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी अपनी सीट नहीं बचा पाए। उन्होंने खुलना-1 से चुनाव लड़ा और 70 हजार से ज्यादा वोट पाने के बावजूद हार का सामना किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजा सिर्फ हार-जीत का सवाल नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी है।

किन चार नामों ने बनाई संसद में जगह?

गायेश्वर चंद्र रॉय– ढाका-3 

बीएनपी के वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका-3 सीट से लगभग 99 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। हाल के महीनों में हिंदू समुदाय को लेकर जो घटनाएं चर्चा में रहीं, उनके बीच यह जीत अहम मानी जा रही है।

निताई रॉय चौधरी– मगुरा-2

बीएनपी की उपाध्यक्ष निताई रॉय चौधरी ने मगुरा-2 सीट से 1,47,896 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार को पीछे छोड़ा। पार्टी में उन्हें अल्पसंख्यक चेहरा माना जाता है।

दीपेन दीवान– रंगामती

एडवोकेट दीपेन दीवान ने रंगामती सीट से 31,222 वोट लेकर जीत हासिल की। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी स्वतंत्र उम्मीदवार पाहेल चकमा थे।

सचिन प्रू– बंदरबन

सचिन प्रू ने बंदरबन सीट से 1,41,455 वोट पाकर संसद में जगह बनाई। वे आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

चिंता की बात क्यों?

करीब 60 पंजीकृत राजनीतिक दलों में से 22 दलों ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे थे। 10 महिला उम्मीदवार भी मैदान में थीं। बावजूद इसके संसद में प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि अल्पसंख्यकों की सक्रिय भागीदारी तो दिखी, लेकिन जीत में तब्दील न हो पाना इस बात की ओर इशारा करता है कि राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अब 13वें संसदीय चुनाव के इन नतीजों के बाद अंतरिम सरकार और आगे की रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज होंगी। देश की सत्ता संरचना में क्या बदलाव होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा , लेकिन फिलहाल आंकड़े एक नई चिंता जरूर सामने रख रहे हैं।

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