अनुराग तागड़े, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते प्रतिबंधों के बीच ईरान ने भारतीय जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की विशेष अनुमति देने की घोषणा की है। इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान ने भारत से दवाइयों के आयात की आवश्यकता को इस छूट का प्रमुख कारण बताया है। भारत के अलावा चीन, इराक और कतर के जहाजों को भी विशेष सुविधा देने की बात कही गई है। हालांकि, भारतीय और चीनी जहाजों को इस मार्ग से गुजरने के लिए शुल्क देना होगा, जबकि कतर के जहाजों को शुल्क से छूट दी गई है।
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति समिति के उपाध्यक्ष अमीर हयात-मोकद्दम ने इस संबंध में जानकारी दी। उनके बयान के अनुसार, ईरान कुछ चुनिंदा देशों के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए समुद्री आवागमन में विशेष रियायत दे रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही क्षेत्रीय संघर्ष और सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों के कारण प्रभावित हो रही है।
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। अपने सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई लगभग 39 किलोमीटर है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसका महत्व असाधारण है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इसके अतिरिक्त कतर की प्राकृतिक गैस का निर्यात भी इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है।अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2025 में प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरे। यह वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। ऐसे में यहां होने वाला कोई भी सैन्य तनाव या समुद्री प्रतिबंध पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए यह मार्ग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते भारत पहुंचता है। इसके अलावा भारत की एलपीजी आपूर्ति भी इस मार्ग पर काफी निर्भर है। इसलिए भारतीय जहाजों को मिलने वाली विशेष छूट को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
दवाइयों के लिए भारत पर ईरान की निर्भरता
ईरान के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत का औषधि उद्योग है। भारत आज विश्व के प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में शामिल है। यहां निर्मित दवाइयां अपनी गुणवत्ता और अपेक्षाकृत कम कीमत के कारण दुनिया के अनेक देशों में पहुंचती हैं। एंटीबायोटिक्स, जीवनरक्षक औषधियां, टीके और सामान्य उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाइयों के उत्पादन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है।ईरान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों, विदेशी मुद्रा की कमी और बैंकिंग संबंधी कठिनाइयों का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों में दवाइयों तथा आवश्यक चिकित्सा उत्पादों की नियमित आपूर्ति उसके लिए महत्वपूर्ण हो गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में मानवीय और औषधीय जरूरतों के लिए कुछ छूट होने के बावजूद बैंकिंग, बीमा और समुद्री परिवहन संबंधी बाधाएं व्यापार को प्रभावित करती हैं।भारत और ईरान के बीच औषधियों तथा खाद्यान्न का व्यापार पहले से जारी है। मार्च 2026 में भारत सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि पश्चिम एशिया की परिस्थितियों के कारण ईरान के लिए भेजा जाने वाला चावल, चाय और औषधियों सहित 41,638 मीट्रिक टन माल बंदरगाहों पर अटका हुआ था। इस माल का घोषित मूल्य लगभग 346.39 करोड़ रुपये था। यह आंकड़ा दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों की वास्तविकता को दर्शाता है।
भारतीय औषधि उद्योग: दुनिया की स्वास्थ्य सुरक्षा का मजबूत आधार
भारत का औषधि उद्योग आज केवल घरेलू स्वास्थ्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। भारत को दुनिया की ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ कहा जाता है। इसका प्रमुख कारण यहां बड़े पैमाने पर सस्ती, गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी जेनेरिक दवाइयों का उत्पादन है। भारत वैश्विक जेनेरिक दवा आपूर्ति में मात्रा के आधार पर लगभग 20 प्रतिशत योगदान देता है और दुनिया के सबसे बड़े औषधि उत्पादक देशों में शामिल है।भारत से अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के अनेक देशों को दवाइयों का निर्यात किया जाता है। विशेष रूप से एचआईवी, टीबी, मलेरिया, कैंसर और हृदय रोगों के उपचार में उपयोग होने वाली औषधियों की वैश्विक उपलब्धता में भारतीय कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के कार्यक्रमों में भी भारतीय निर्मित जेनेरिक दवाइयों का व्यापक उपयोग होता है।भारत की विशेषता केवल तैयार दवाइयों के उत्पादन तक सीमित नहीं है। टीकों, सक्रिय औषधीय घटकों (एपीआई), बायोसिमिलर और जटिल औषधियों के निर्माण में भी भारत अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। भारतीय वैक्सीन उद्योग विश्व के टीकाकरण कार्यक्रमों की आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अनेक देशों को टीके और आवश्यक चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई थी। इससे वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में भारत की भूमिका और अधिक मजबूत हुई।इस उद्योग की वैश्विक उपयोगिता का एक बड़ा कारण इसकी प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत है। विकसित देशों की तुलना में भारत में अनेक दवाइयों का उत्पादन कम लागत पर संभव है। इससे विकासशील और निम्न आय वाले देशों को अपेक्षाकृत सस्ती चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है। भारतीय औषधि कंपनियां अमेरिका और यूरोप जैसे कड़े नियामक मानकों वाले बाजारों में भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं।
ईरान के संदर्भ में भारतीय औषधि उद्योग की यह क्षमता विशेष महत्व रखती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी कठिनाइयों के कारण ईरान को आवश्यक दवाइयों की नियमित आपूर्ति में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण और प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ता बन सकता है। इसलिए होर्मुज जलडमरूमध्य से भारतीय जहाजों को विशेष छूट देने के पीछे दवाइयों की आवश्यकता का उल्लेख केवल व्यापारिक विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न भी है।
चीन, इराक और कतर को भी विशेष सुविधा
ईरान द्वारा चार देशों को दी गई छूट के पीछे अलग-अलग आर्थिक और कूटनीतिक कारण हैं। चीन ईरान का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। ईरानी पक्ष के अनुसार, चीनी जहाजों को विशेष सुविधा देने के पीछे बीजिंग से राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने की अपेक्षा भी है।इराक के लिए होर्मुज का रास्ता उसकी अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार की जीवनरेखा है। वहीं कतर दुनिया के प्रमुख प्राकृतिक गैस निर्यातक देशों में शामिल है। उसके लिए इस मार्ग का निर्बाध संचालन अत्यंत आवश्यक है। ईरान ने कतर के जहाजों को बिना पारगमन शुल्क के गुजरने की सुविधा देने की बात कही है।इस प्रकार ईरान का निर्णय केवल समुद्री आवागमन का मामला नहीं, बल्कि आर्थिक हितों और क्षेत्रीय कूटनीति का भी हिस्सा है।
भारत की संतुलित विदेश नीति की परीक्षा
भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का एक प्रमुख माध्यम है। ऐसे में ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखना भारत की क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।भारत की विदेश नीति की विशेषता रही है कि वह अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में किसी एक पक्ष के दबाव में आने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। वर्तमान घटनाक्रम में भी भारत को इसी संतुलन को बनाए रखना होगा। ईरान के साथ औषधि और खाद्यान्न व्यापार को आगे बढ़ाने के साथ अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रखना होगा।
समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून की चुनौती
हालांकि ईरान की घोषणा से भारतीय जहाजों को राहत मिलने की संभावना है, लेकिन इससे उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं मिलती। समुद्री क्षेत्र में मिसाइल, ड्रोन, बारूदी सुरंगों और सैन्य टकराव का खतरा बना हुआ है। भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी गंभीर चिंता का विषय है। भारत सरकार के पोत परिवहन महानिदेशालय ने पहले ही होर्मुज क्षेत्र में भारतीय नाविकों की तैनाती को लेकर सुरक्षा संबंधी सतर्कता बरतने की सलाह दी है।दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग होने वाले जलडमरूमध्यों में जहाजों को निर्बाध पारगमन का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में ईरान द्वारा भारतीय और चीनी जहाजों से पारगमन शुल्क लेने की घोषणा कानूनी बहस का विषय बन सकती है। किसी देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर एकतरफा शुल्क लगाने का अधिकार स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।
भारत के लिए अवसर और सावधानी दोनों
ईरान का यह फैसला भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर है। इससे भारतीय औषधि उद्योग की वैश्विक स्वीकार्यता और संकट के समय आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की क्षमता सामने आती है। लेकिन भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विशेष छूट का लाभ वास्तविक व्यापारिक गतिविधियों तक पहुंचे और भारतीय जहाजों तथा नाविकों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।होर्मुज की मौजूदा परिस्थिति यह बताती है कि आधुनिक विश्व में किसी देश की शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता या ऊर्जा संसाधनों से निर्धारित नहीं होती। उसकी औद्योगिक दक्षता, तकनीकी सामर्थ्य और दूसरे देशों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता भी उसकी कूटनीतिक ताकत बनती है।भारत के लिए यह घटनाक्रम इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिस देश की दवाइयां दूसरे देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं, उसकी आर्थिक और कूटनीतिक उपयोगिता भी संकट के समय बढ़ जाती है। होर्मुज में भारतीय जहाजों को मिली यह विशेष सुविधा भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत है। भारत अब केवल ऊर्जा और वस्तुओं का बड़ा उपभोक्ता नहीं, बल्कि दुनिया की स्वास्थ्य सुरक्षा में योगदान देने वाला एक अनिवार्य औद्योगिक साझेदार भी है।