केरल बना ‘केरलम’, कैबिनेट की मंजूरी

सेवा तीर्थ में मोदी कैबिनेट मीटिंग में बड़ा फैसला: केरल का नाम बदलकर हुआ ‘केरलम’

केंद्रीय कैबिनेट ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। मलयालम पहचान से जुड़े इस फैसले के बाद संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू होगी।

By : संजय चतुर्वेदी
सेवा तीर्थ में मोदी कैबिनेट मीटिंग में बड़ा फैसला: केरल का नाम बदलकर हुआ ‘केरलम’

PM Modi Cabinet Meeting

नई दिल्लीः  देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित नए बने पीएमओ 'सेवा तीर्थ' में मोदी कैबिनेट की मीटिंग हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केरल को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया। बैठक में राज्य का आधिकारिक नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। अब ‘केरल’ को औपचारिक रूप से ‘केरलम’ कहा जाएगा।

‘केरल’ से ‘केरलम’ तक का सफर

कैबिनेट ने राज्य का नाम बदलकर केरल से ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी है। राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन लंबे समय से यह मांग उठाते रहे हैं कि मलयालम भाषा में राज्य का सही नाम ‘केरलम’ है, इसलिए आधिकारिक रूप से भी यही नाम होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर से ही मलयालम भाषी समुदायों के लिए एकीकृत ‘केरलम’ की अवधारणा सामने आती रही है। हालांकि, संविधान की पहली अनुसूची में अब तक राज्य का नाम ‘केरल’ दर्ज था।

दूसरी कोशिश में मिली सफलता

यह प्रस्ताव पहली बार अगस्त 2023 में केरल विधानसभा से सर्वसम्मति से पारित होकर केंद्र को भेजा गया था। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कुछ तकनीकी संशोधनों का सुझाव दिया। उन बदलावों को शामिल करते हुए जून 2024 में विधानसभा ने दोबारा प्रस्ताव पारित किया। मंगलवार को ‘सेवा तीर्थ’ में हुई कैबिनेट बैठक में इस संशोधित प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगा दी गई।

संविधान में भी होगा बदलाव

मुख्यमंत्री विजयन ने आग्रह किया था कि केवल सरकारी दस्तावेजों में ही नहीं, बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में भी राज्य का नाम ‘केरलम’ किया जाए। इस फैसले को राज्य की भाषाई पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है। नाम परिवर्तन के साथ अब संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, जिसके तहत संबंधित अनुसूचियों में संशोधन किया जाएगा।

‘सेवा तीर्थ’ में पहली बड़ी घोषणा

यह निर्णय नई पीएमओ बिल्डिंग ‘सेवा तीर्थ’ में हुई पहली कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिससे इसे और अधिक प्रतीकात्मक महत्व मिल गया। सरकार का मानना है कि यह कदम क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान और संघीय ढांचे की भावना को मजबूत करेगा।

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