सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि माता-पिता की नौकरी से मिलने वाली नियमित सैलरी को क्रीमी लेयर की आय में शामिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी अभ्यर्थी को ओबीसी आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता कि उसके माता-पिता सरकारी सेवा, सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों या निजी क्षेत्र में नौकरी करते हैं और उन्हें वेतन मिलता है।न्यायालय के इस निर्णय से देशभर में ऐसे हजारों छात्रों और अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर में मानकर आरक्षण के लाभ से वंचित किया जा रहा था।
स्पष्टीकरण पत्र को अदालत ने माना अवैध
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा की पीठ ने केंद्र सरकार के 14 अक्टूबर 2004 के उस स्पष्टीकरण पत्र को अवैध ठहरा दिया, जिसमें सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन को क्रीमी लेयर की आय में जोड़ने का निर्देश दिया गया था।
वेतन नहीं, वास्तविक आर्थिक स्थिति होगी आधार
पीठ ने कहा कि 1993 के मूल सरकारी आदेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था और केवल एक स्पष्टीकरण पत्र के माध्यम से मूल नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि सरकारी कर्मचारियों और अन्य नौकरीपेशा वर्गों के बीच इस प्रकार का अंतर करना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।अदालत ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल वेतन के आधार पर नहीं, बल्कि परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति और अन्य स्रोतों से होने वाली आय को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।