Iran Regime Change After Khamenei

खामेनेई के बाद भी ईरान में ‘रिजीम चेंज’ दूर की कौड़ी? अमेरिका को नहीं दिख रहे साफ संकेत

सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के बाद भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना कमजोर मानी जा रही है। अमेरिकी रिपोर्टों के अनुसार IRGC की वफादारी और बिखरा विपक्ष बड़ी बाधा है।<br/>

By : Admin
खामेनेई के बाद भी ईरान में ‘रिजीम चेंज’ दूर की कौड़ी? अमेरिका को नहीं दिख रहे साफ संकेत

Israel-America attack on Iran

ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की अमेरिकी-इजराइल हमले में मौत हो गई। इसके बाद ईरान की सत्ता में बड़ा खालीपन आने के बाद दुनिया की निगाहें तेहरान पर टिकी हैं। सवाल सीधा है कि क्या अब ईरान में शासन परिवर्तन होगा? लेकिन अमेरिकी हलकों से जो संकेत मिल रहे हैं, वे इस उम्मीद पर पानी फेरते दिख रहे हैं।

अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद भले ही चर्चाएं तेज हो गई हों, मगर वॉशिंगटन के रणनीतिकारों को फिलहाल ईरान में ‘रिजीम चेंज’ की ठोस संभावना नजर नहीं आ रही है। जानिए इसकी क्या वजह है।

अमेरिकी आकलन: व्यवस्था हिल सकती है, गिरेगी नहीं

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद जो सत्ता संरचना बनी, वह सिर्फ एक व्यक्ति पर टिकी नहीं है। यह एक वैचारिक और संस्थागत ढांचा है। सूत्रों का कहना है कि अमेरिका का मौजूदा सैन्य दबाव मुख्य रूप से ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करने पर केंद्रित है। लेकिन यह भी सच है कि वॉशिंगटन में कुछ धड़े लंबे समय से तेहरान की मौजूदा सरकार को हटाने की इच्छा रखते रहे हैं। फिर भी जमीनी हकीकत यह है कि विपक्ष बिखरा हुआ है और सत्ता प्रतिष्ठान अभी भी संगठित है।

IRGC की भूमिका: असली ताकत किसके पास?

ईरान की राजनीति को समझना हो तो Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) को समझना जरूरी है। यही वह ताकत है जो देश की सुरक्षा, खुफिया ढांचे और आर्थिक नेटवर्क के बड़े हिस्से पर पकड़ रखती है। अमेरिकी आकलन के मुताबिक, अगर खामेनेई की जगह कोई नया सर्वोच्च नेता आता भी है तो संभवना है कि वह IRGC से जुड़ा कोई सख्त रुख वाला चेहरा हो सकता है। इसके अलावा कोई कट्टर मौलवी हो सकता है। ऐसे में सत्ता की दिशा बदलेगी पर ढांचा जस का तस रह सकता है।

हालातों को देखा जाए तो फिलहाल देश की जो स्थिति है यह व्यवस्था IRGC के लिए फायदे का सौदा है। ऐसे में उनके हथियार डाल देने की उम्मीद करना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं बन पाए क्रांति?

जनवरी में ईरान के कई शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। सड़कों पर युवाओं की भीड़ दिखी, नारे लगे, सोशल मीडिया पर अभियान चले। लेकिन किसी भी सफल क्रांति की बुनियादी शर्त होती है सुरक्षा बलों का साथ छोड़ना। ईरान में ऐसा नहीं हुआ है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों में बड़ी बगावत का कोई संकेत नहीं मिला है। यही वजह है कि अमेरिकी विश्लेषक मानते हैं कि सिर्फ जनाक्रोश से सत्ता परिवर्तन संभव नहीं होगा, जब तक अंदर से दरार न पड़े।

ट्रंप के बदले सुर

रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक वीडियो जारी किया था। उन्होंने ईरानी नागरिकों से 'अपने देश को वापस लेने' की अपील की। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उसी समय उन्होंने बातचीत की संभावना भी खुली रखी है। यह दोहरी रणनीति बताती है कि वॉशिंगटन भी स्थिति को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।

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