नेपाल की राजनीति में इस बार का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ है। युवाओं के बीच उभरे नए नेतृत्व और Gen-Z विद्रोह ने पारंपरिक पार्टियों की जमीन हिला दी। कांग्रेस और कम्युनिस्ट दलों के कई बड़े चेहरे चुनाव हार गए। लेकिन इस राजनीतिक आंधी के बीच भी एक नेता अपना किला बचाने में कामयाब रहे। वो हैं नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड।
बालेन शाह की आंधी में गिरे बड़े-बड़े नाम
नेपाल के इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा बालेन शाह की राजनीतिक लहर की रही। इस लहर ने कई दिग्गज नेताओं को चुनावी मैदान में हरा दिया। चुनाव परिणामों में दिग्गज नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सीनियर नेता माधव कुमार नेपाल जैसे बड़े नाम अपनी-अपनी सीटें हार गए। इतना ही नहीं, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा भी सरलाही-4 सीट से चुनाव हार गए। नेपाल की राजनीति में यह पहली बार हुआ है जब कांग्रेस का मौजूदा अध्यक्ष ही चुनाव हार गया।
फिर भी कायम रहा प्रचंड का दबदबा
इन बड़े उलटफेरों के बीच पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने अपनी सीट बचाकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित कर दी। प्रचंड पूर्वी रुकुम-1 सीट से चुनाव लड़ रहे थे, जो उनका मजबूत गढ़ माना जाता है यह सीट लुम्बिनी प्रांत में आती है और यहां लंबे समय से प्रचंड की राजनीतिक पकड़ रही है। इसके साथ ही उनकी पार्टी के 7 सांसद भी प्रतिनिधि सभा तक पहुंचने में सफल रहे। यह सीट लुम्बिनी प्रांत में आती है और यहां लंबे समय से प्रचंड की राजनीतिक पकड़ रही है।
सीट बदलना पड़ा रणनीतिक दांव
चुनाव से ठीक पहले प्रचंड ने अपनी सीट बदल ली थी। वे भरतपुर से हटकर सीधे पूर्वी रुकुम चले गए। यह इलाका माओवादी आंदोलन के दौरान से ही उनका मजबूत क्षेत्र माना जाता है। प्रचार के दौरान प्रचंड लगातार घर-घर जाकर लोगों से मिलते रहे और अपने भाषणों में नेपाल में लोकतंत्र लाने की लड़ाई का जिक्र करते रहे। दरअसल 2006 में नेपाल में जब राजशाही खत्म हुई और लोकतंत्र की घोषणा हुई, उस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में प्रचंड भी शामिल थे।
प्रचंड के सामने भी कड़ी टक्कर
पूर्वी रुकुम सीट पर दूसरे नंबर पर केपी ओली की पार्टी के उम्मीदवार लीलामणि गौतम रहे। वहीं, बालेन शाह के समर्थन वाली पार्टी यहां चौथे नंबर पर रही। हालांकि लुम्बिनी क्षेत्र की कई सीटों पर प्रचंड के समर्थकों को जीत मिली, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव बरकरार दिखा।
कांग्रेस और ओली का गढ़ भी ढहा
इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। अध्यक्ष गगन थापा से लेकर पूर्व उपप्रधानमंत्री बिमलेंद्र नीधि तक चुनाव हार गए। कोइराला परिवार के सीनियर नेता शेखर कोइराला भी इस बार चुनाव नहीं जीत पाए।
कौन हैं प्रचंड?
71 साल के पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ नेपाल के सबसे प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेताओं में गिने जाते हैं। 1990 के दशक में उन्होंने नेपाल में राजशाही के खिलाफ कम्युनिस्ट आंदोलन का नेतृत्व किया। उस दौरान उन्होंने एक गुरिल्ला ब्रिगेड भी बनाई थी, जो सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रही थी। 2008 में जब नेपाल में नया संविधान लागू हुआ, तब प्रचंड पहली बार प्रधानमंत्री बने। इसके बाद वे तीन बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
भारत के लिए क्या मायने रखते हैं ये नतीजे-
1. स्थिर सरकार भारत के लिए फायदेमंद
2008 के बाद पहली बार नेपाल में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की संभावना बनी है। नेपाल में राजनीतिक स्थिरता भारत के लिए अहम है, क्योंकि दोनों देशों के बीच करीब 1751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।
2. चीन के BRI प्रोजेक्ट पर नया रुख
बालेन शाह के समर्थन से सत्ता में आ रही राजनीतिक धारा के प्रमुख नेता Rabi Lamichhane पहले भी चीन के Belt and Road Initiative (BRI) प्रोजेक्ट की आलोचना कर चुके हैं।
3. संतुलित कूटनीति की बात
नई राजनीतिक ताकतें भारत और चीन के बीच संतुलित विदेश नीति की बात कर रही हैं। इससे भारत-नेपाल संबंधों में नए समीकरण बन सकते हैं।