रामनगरी बन रही बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह की नई शरणस्थली

रामनगरी बन रही बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह की नई शरणस्थली

By : Swadesh Bhopal
रामनगरी बन रही बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह की नई शरणस्थली

कैसरगंज से अयोध्या तक की यात्रा, मजबूरी या मास्टर प्लान की तैयारी

अयोध्या की राजनीति में इन दिनों आस्था, सत्ता और रणनीति का ऐसा संगम दिख रहा है, जहां पुराने चेहरे नए पते तलाशते नजर आ रहे हैं। रामनगरी में बृजभूषण शरण सिंह की अचानक तेज हुई सक्रियता महज भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती सियासी जमीन का संकेत है। सवाल यह नहीं है कि बृजभूषण अयोध्या क्यों आ रहे हैं, सवाल यह है कि अयोध्या उन्हें क्यों स्वीकार करने को तैयार दिख रही है।

छह बार लोकसभा सांसद रह चुके बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक जीवन बाहुबल, बेबाकी और विवादों का पर्याय रहा है। कैसरगंज उनकी सुरक्षित सियासी जमीन थी, लेकिन यौन उत्पीड़न के आरोपों ने भाजपा के भीतर उनकी स्वीकार्यता को झटका दिया। टिकट कटा, विरासत बेटे करनभूषण को सौंप दी गई। सत्ता घर में रही, लेकिन राजनीतिक पुनर्वास की जरूरत पैदा हो गई। यहीं से फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र यानी अयोध्या एक संभावित ‘राजनीतिक सेफ हाउस’ के रूप में उभरती है।

रामलला प्राण प्रतिष्ठा के वर्ष में फैजाबाद सीट का भाजपा के हाथ से निकलना संगठन के लिए गहरा झटका था। लल्लू सिंह जैसी मजबूत पहचान के बावजूद हार ने यह साफ कर दिया कि अयोध्या अब सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं रही, बल्कि सियासी प्रयोगशाला बन चुकी है। यही वह दरार है, जिसमें बृजभूषण और विनय कटियार जैसे पुराने योद्धा अपनी दावेदारी ठूंसने की कोशिश कर रहे हैं।

बृजभूषण की अयोध्या में मौजूदगी साधारण नहीं है। सैकड़ों महंतों से निजी रिश्ते, धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी, सरयू आरती जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रम ये सब एक सुविचारित राजनीतिक भाषा है। यह भाषा सीधे टिकट की मांग नहीं करती, बल्कि यह संदेश देती है कि मैं यहां का हूं, स्वीकार्य हूं। होर्डिंग्स, जन्मदिन और बढ़ती दृश्यता इस ओर इशारा करती है कि अयोध्या को भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक केंद्र बनाया जा रहा है।

भाजपा की दुविधा

भाजपा के लिए यह दांव आसान नहीं है। एक ओर संगठन की छवि है, दूसरी ओर पुराने कैडर नेताओं का दबाव। बृजभूषण जैसा नेता जनाधार और संसाधन दोनों साथ लाता है, लेकिन विवाद भी। फैजाबाद सीट पर टिकट देना केवल उम्मीदवार तय करना नहीं होगा, बल्कि यह तय करना होगा कि पार्टी स्थिरता चाहती है या आक्रामकता।

सांसद करनभूषण सिंह का यह कहना कि अगला लोकसभा चुनाव वह पिता के साथ लड़ना चाहते हैं, संकेत देता है कि परिवार की राजनीति अब दो मोर्चों पर फैल सकती है। कैसरगंज विरासत बना रहेगा, जबकि फैजाबाद वापसी का द्वार। बृजभूषण भले ही खुले तौर पर सीट का नाम न लें, लेकिन अयोध्या में उनकी मौजूदगी ही उत्तर बनती जा रही है।

सरयू के इस पार उठती यह हलचल साफ कहती है 2029 की लड़ाई की पटकथा अभी से लिखी जा रही है, और अयोध्या उसका केंद्र है।