संतोष कुमार यादव, सुल्तानपुर: विभिन्न जिलों में जब सपा ने अपने कई जिलाध्यक्ष हटाए, पड़ोसी जिले अयोध्या सहित कई जिलों की कमेटिया भंग हुई तो संगठन में बदलाव की बाट जोह रहे यहां के सपाइयों को भी जिले के संगठन में फेरबदल की उम्मीद बढ़ी थी, लेकिन लाख विरोधों के बावजूद अभी तक स्थिति यथावत है।
यहां सदर, कादीपुर, लंभुआ, सुल्तानपुर, इसौली सहित पांच विधानसभाएं हैं। जिलाध्यक्ष की कार्यशैली को लेकर कार्यकर्ताओं में असंतोष तो पांचों विधानसभाओं में है, जो समय–समय पर मुखर भी होती रही, लेकिन लंभुआ में मंच से टिकट के दावेदार बाजीगर वर्मा द्वारा पूर्व जिलाध्यक्ष पृथ्वीपाल यादव की मौजूदगी में परिवर्तन की जो मांग उठी वह मामला लखनऊ तक पहुंचा, जवाब में जिलाध्यक्ष रघुवीर यादव भी मुक़ाबिल हुए, जिसमें उनका एक डायलॉग मशहूर हुआ ’हाऊ आर यू’ खूब चर्चा में भी रहा।
जिला अध्यक्ष हैं रघुवीर यादव
रघुवीर यादव अभी जिलाध्यक्ष हैं। इससे पहले भी वे कई बार जिलाध्यक्ष रह चुके हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी को चुनावी सफलता भी मिली। यही वजह है कि संगठन के भीतर असंतोष की आवाजें उठने के बावजूद शीर्ष नेतृत्व अब तक उन पर भरोसा बनाए हुए है। सामाजिक जीवन में लोग किसी शुभ शुरुआत को 'शगुन' मानते हैं, वैसे ही सपा भी पुराने सफल प्रयोगों को चुनावी शगुन के रूप में देख रही है। जिला संगठन की कार्यशैली को लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी एवं चर्चाओं के बीच यही सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी जिलाध्यक्ष पर इसलिए भरोसा बनाए रखा है क्योंकि वह उन्हें 2027 की जीत के लिए 'शुभ शगुन' मान रही है?
पुराना नेतृत्व 'शगुन' साबित होगा?
पार्टी के अंदर यहां लंबे समय से बदलाव की चर्चाएं होती रही है। कार्यकर्ताओं का एक वर्ग चाहता है कि विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में नई ऊर्जा और नई कार्यशैली वाला नेतृत्व सामने आए। दूसरी ओर, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व शायद चुनावी इतिहास के उस 'शगुन' को छोड़ने के पक्ष में नहीं दिख रहा, जिसमें रघुवीर यादव के जिलाध्यक्ष रहते अपवाद छोडकर पार्टी को बेहतर चुनावी परिणाम मिले। कार्यकर्ताओं की माने तो रघुवीर यह बात जिले के दो पूर्व विधायकों के जरिए शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने में कामयाब रहे। लेकिन हर चुनाव नई परिस्थितियों में लड़ा जाता है। पुराने शगुन हमेशा नए परिणाम की गारंटी नहीं होते। चुनाव अंततः संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के उत्साह, जनता के बीच मौजूदगी और मुद्दों पर संघर्ष से तय होते हैं। अब सवाल यही है कि क्या सपा के लिए पुराना नेतृत्व वास्तव में 2027 का 'शगुन' साबित होगा, या फिर बदलते राजनीतिक माहौल में संगठन में फेरबदल की जरूरत महसूस होगी।
क्या कहते हैं कार्यकर्ता?
कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो गांव-गांव तक पहुंचे, कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में शामिल हो, लगातार बैठकों का आयोजन करे, आंदोलनों की अगुवाई करे और मीडिया के माध्यम से जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाए। बिजली, पानी, कानून-व्यवस्था, किसानों, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर भी कार्यकर्ताओं को लगता है कि संगठन की मौजूदगी और अधिक प्रभावी हो सकती थी। कई कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है कि, जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी केवल संगठन चलाना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना भी होता है। कार्यकर्ताओं के घर पहुंचना, उसके सुख-दुख में शामिल होना, किसी भी स्थिति में साथ खड़ा होना, नए कार्यकर्ताओं को अवसर देना भी संगठन को जीवंत बनाती हैं।
किसी से छिपा नही सपा का युद्ध
एक ओर जहां भाजपा 2027 की तैयारी में बूथ स्तर तक अपने संगठन को सक्रिय करने में जुटी है, वहीं सपा नेताओं बीच चल रहे शीत युद्ध, गुरिल्ला युद्ध किसी से छिपा नही है। जबकि जनता को मुख्य विपक्षी दल होने के नाते सपा कार्यकर्ताओं से अधिक आक्रामक और सक्रिय भूमिका की उम्मीद है। फिलहाल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अनुभव पर भरोसा जताया है। अब यह भरोसा 2027 के विधानसभा चुनाव में चुनावी सफलता में बदलता है या संगठन में नई ऊर्जा की मांग और तेज होती है यह तो समय बताएगा।