रामदूत हनुमान की आत्मीय परिचय

बड़ा मंगलवार: ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा

मायापति मिश्र

By : स्वदेश डेस्क
बड़ा मंगलवार: ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा

गतांक से आगे  

 ये हनु‌मान श्रीराम के ऐसे दूत हैं जिनकी रक्षा स्वयं अग्निदेव करते हैं और इनको शरण प्रदान करते हैं। अग्नि द्वारा संरक्षित हनुमान का यह परिचय भगवान शंकर माता पार्वती को देते हैं। अग्नि देव को माता सीता का पिता माना जाता है, इसलिए जब सीता जी अग्नि परीक्षा देने अग्नि की गोद में बैठीं तो अग्नि की धधकती ज्वाला उन्हें छू भी नहीं पायी। जब अशोक वाटिका में हनुमान जी ने माता सीता को अपना प्रथम परिचय दिया था तो अपने को पवनपुत, केसरी नन्दन, शंकर सुवन, अंजनीनन्दन जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया। प्रचलित पहचान वाले परिचय को त्याग कर हनुमान जी ने सीता जी को अपना जो आत्मिय परिचय दिया वह सीता जी से जुड़ा हुआ था। वह परिचय सीता जी के हृदय में सदासदा के लिए घर कर गया

 राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुणा निधान की।। 

             रा.च.मा. सु.का. 12,1718 

यहाँ रामदूत कहने मे हनुमान का अपनापन झलकता है और इस शब्द में अजेयता के साथसाथ विश्वास की भीनी भीनी महक आती है। अपने इसी विश्वास में सराबोर हनुमान जी सीता जी को अपना परिचय रामदूत के रूप में देते हुए गारंटी स्वरूप अपने स्वामी राम की सौगंध भी खाते हैं। हनुमान के इतने आत्मीय परिचय ने दृढ़ता से उन्हें माता सीता का अपना बना दिया। जब हनुमान की पूँछ में रावण ने आग लगवाया तो माता सीता ने अपने मानस पिता अग्नि से प्रार्थना किया था कि हे अग्नि देव ! आप मेरे पुत्रवत हनुमान की रक्षा करना और उन्हें अपनी शरण प्रदान करना। लंका दहन के समय यही बात भगवान शंकर पार्वती जी को बताते हैं कि "रामदूत मैं" कहने वाले उस दूत को अग्नि नहीं जला सकती और शरण प्रदान करती है 

 ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा
             रा.च. मा. सु. का 25,11

लंकादहन के समय हनुमान की पूंछ न जल पाने का एक कारण यह भी था कि उनकी पूँछ रुद्रतत्व से परिपूर्ण थी और उसमें रुद्र की आत्म शक्ति पार्वती का वास रहता था। एक प्राचीन कथा के अनुसार  जब पार्वती के लिए शिव द्वारा बनाये गये स्वर्णमहल को रावण ने दक्षिणा में मांग लिया तो पार्वती जी बहुत दुखी हुईं। रावण के इस कृत्य का दण्ड देने के लिए पार्वती जी ने श्राप दिया था कि त्रेता युग में शिव के रुद्ररूप में हनुमान अपनी पूँछ को आग से इस स्वर्णमहल सहित पूरी लंका जला कर राख कर देंगे और पूँछ की आग से उनका बाल भी बाँका नहीं होगा। हनुमान के अवतरण के साथ ही पार्वती जी उनकी पूंछ में वास करते हुए लंकादहन की प्रतीक्षा करने लगीं। जब हनु‌मान की पूंछ में आग लगायी गयी तो आग की विकरालता देख कर रुद्र रूपी हनुमान के लिए पार्वती जी कुछ विचलित होने लगीं। परेशान होती पार्वती को पुरानी बातें स्मृति में ले आने के लिए ही ढाढ़स बंधाते हुए शंकर जी ने कहा

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ।।
                रा.च.मा. सु.का25, 1112

हनुमान को राम के दूत के रूप में देखने की सब की अपनीअपनी दृष्टि है। माता सीता को हनुमान ने अपने को करुणा के सागर श्रीराम का दूत बताया तो रावण को उस परम शक्तिमान परमात्मा का दूत बताया जिसकी शक्ति पाकर रावण सब कुछ अपने अधीन कर रखा था और जिनकी प्रिय पत्नी को हर लाया 

 "जाके बल लवलेस तें, जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहुं प्रिय नारि है II 

हनुमान द्वारा ऐसे शक्तिशाली राम का दूत होने का परिचय पाकर लंकावासी भय के कारण सशंकित होकर आपस में चर्चा करते हैं 

 जासु दूत बल बरनि न जाई। 
 तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥ 
                      रा.च.मा.सु.का. 35,56

जिनके दूत के बल का वर्णन करना मुश्किल है यदि दूत के स्वामी वे राम स्वयं आ जायेंगें तो लंका नगरी की कौन भलाई होगी ? रावण की पत्नि मंदोदरी ने राम दूत हनुमान के विषय में अपनी दूतियों से सुना 

 दुतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी 
          रा. च. मा. सु. का 35,8

 और फिर रावण को दूत के विषय में अवगत कराया 

 समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्रवहिं गर्भ रजनीचरधरनी।I 
              रा.च.मा सु.का. 35, 1314

जिनके दूत के कृत्यों को सुन कर लंका की राक्षसियों के गर्भ गिर जाते हैं। लंका वासियों की दृष्टि में रामदूत हनुमान का जो रूप समाया था वह बड़ा डरावना था।

     भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी के लिए रामदूत होने का मायने पार्वती, सीता एवं मंदोदरी द्वारा समझे गये रामदूत से अलग हट कर कुछ इस प्रकार है 

 राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत 
                      हनुमान बाहुक 22,3

राम के सेवकों के लिए सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाला कल्पतरू है। रामदूत हनु‌मान निराश्रितों के एक समर्थ सहायक हैं

 दूत रामराय को सपूत पूत बाय को 
 समत्थ हाथ पाय को सहाय असहाय को 
                  हनुमान बाहुक 31, 12

वे रामदूत हैं, पवन के पुत्र हैं। हाथपाँव से समर्थवान हैं और निराश्रितों के सहायक हैं। लोक में प्रचलित हनु‌मान का रामदूत रूप अपनी एक अलग छवि बनाये हुए है जिसकी स्वयं की एक अस्मिता है 

 रामदूत अतुलित बल धामा,अंजनी पुत्र पवनसुत नामा।। 


लेखक मायापति मिश्र, इतिहास संकलन समिति मध्यभारत के बौद्धिक प्रमुख हैं

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