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बांग्लादेश में नया दौरः हिंदुओं के लिए उम्मीद या खतरा?

बांग्लादेश में बीएनपी की जीत के बाद हिंदुओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल। इतिहास, हालिया घटनाएं और आगे की चुनौतियों का विश्लेषण

By : स्वदेश डेस्क
बांग्लादेश में नया दौरः हिंदुओं के लिए उम्मीद या खतरा?

विवेक शुक्ला

बांग्लादेश में हाल ही में हुए आम चुनावों ने सबको चौंका दिया है। 12 फरवरी 2026 को हुए इन चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भारी बहुमत हासिल कर लिया। तारिक रहमान अब नए प्रधानमंत्री बनने वाले हैं, और उनकी पार्टी ने 209 से ज्यादा सीटें जीतीं, जो दो-तिहाई बहुमत है। जमायते-ए- इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टी दूसरे नंबर पर आई है, लेकिन बीएनपी की जीत से लगता है कि लोग बदलाव चाहते हैं। 2024 के छात्र विद्रोह के बाद शेख हसीना की अवामी लीग को बैन कर दिया गया था, और ये पहला चुनाव था जहां लोग आजादी से वोट डाल सके। लेकिन अब सवाल ये है कि क्या इस नई सरकार में हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मिलेगी, या उनकी हालत पहले जैसी ही खराब रहेगी? ये सिर्फ एक देश की नहीं, बल्कि इंसानियत की बात है।

सबसे पहले तो बांग्लादेश के इतिहास को समझना जरूरी है। 1971 में जब बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हुआ, तो वो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में बना था। लेकिन उसके बाद से अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं की हालत लगातार खराब होती गई। उस समय हिंदू आबादी 30 फीसद के करीब थी, लेकिन अब घटकर 8-9 फीसद रह गई है। क्यों? क्योंकि बार-बार हमले, लूटपाट, बलात्कार और जमीन हड़पने की घटनाएं हुई। पाकिस्तान के समय में तो हिंदुओं को दुश्मन संपत्ति एक्ट के तहत उनकी जमीनें छीन ली गई, और ये सिलसिला आज तक चल रहा है। अवामी लीग के समय में भी हमले होते थे, लेकिन बीएनपी और जमात के साथ मिलकर सरकार बनने पर ये और बढ़ जाते थे। 

याद कीजिए 2001 का चुनाव। बीएनपी ने जीत हासिल की थी, और उसके बाद पूरे देश में हिंदुओं पर संगठित हमले हुए। हजारों घर जलाए गए, महिलाओं के साथ जुल्म हुए, और कई लोग मारे गए।

मानवाधिकार संगठनों ने रिपोर्ट की कि ये हमले बीएनपी के समर्थकों और जमायते- ए- इस्तामी के लोगों ने किए थे, क्योंकि हिंदुओं को अवामी लीग का समर्थक माना जाता था। पुलिस ने कुछ नहीं किया, और सरकार ने इनकार कर दिया। इसी तरह 1990 और 1992 में भी हिंदू मंदिरों पर हमले हुए थे। बीएनपी की सरकार (2001-2006) में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का कोई सिस्टम नहीं था। जमात जैसी पार्टियां, जो इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देती हैं, उनके साथ गठबंधन से हालात और बिगड़े। 1971 की मुक्ति संग्राम में जमान ने पाकिस्तान का साथ दिया था, और हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार किए थे।

तो बीएनपी की जीत से पुरानी यादें ताजा हो रही हैं। अब बात करें हाल की। 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार आई। लेकिन उसके बाद से अल्पसंख्यकों पर हमलों की बाढ़ आ गई। भारत सरकार के मुताबिक, 2900 से ज्यादा घटनाएं हुई, जिसमें हिंदू घरों को जलाया गया, मंदिर तोड़े गए, और लोग मारे गए। कई हिंदू भारत भाग आए.

चुनाव से पहले ये हमले और बढ़ गए। राजशाही में एक हिंदू टीचर कहते हैं कि वो राजनीति पर भरोसा करने के आखिरी कगार पर हैं। Human Rights Support Society की रिपोर्ट कहती है कि 17 महीनों में 56 हमले हुए, जिसमें एक मौत और 27 घायल। ये हमले सिर्फ हिंदुओं पर नहीं, बल्कि बौद्ध, ईसाई और आदिवासी समुदायों पर भी हुए।

कई लोग कहते हैं कि ये हमले धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हैं। क्योंकि हिंदुओं को अवामी लीग का समर्थक माना जाता है, तो बदला लिया जा रहा है। चांग्लादेश सरकार कहती है कि ज्यादातर घटनाएं सांप्रदायिक नहीं, बल्कि साधारण अपराध हैं। लेकिन मानवाधिकार संगठन और हिंदू नेता कहते हैं कि ये सिस्टेमैटिक है, और चुनाव के समय में बढ़ रहा है। चीएनपी ने चुनाव में हिंदू उम्मीदवार दिए हैं, और जमात ने भी एक हिंदू को टिकट दिया। तारिक रहमान ने कहा है कि उनकी सरकार सबको सुरक्षा देगी। लेकिन इतिहास देखकर डर लगता है। अगर जमात के साथ गठबंधन हुआ, तो इस्लामी कानूनों की मांग बढ़ सकती है, जो अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किल होगी।

अब सवाल ये है कि क्या हालत सुधरेगी? बीएनपी की जीत से कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं। चुनाव में वोटर टर्नआउट 59 फीसद था, और लोग लोकतंत्र चाहते हैं। बीएनपी ने अर्थव्यवस्था सुधारने और लोकतंत्र बहाल करने का वादा किया है। लेकिन अल्पसंख्यकों के लिए ये टेस्ट होगा। अगर सरकार ने सख्त कदम नहीं उठाए, तो हमले जारी रहेंगे।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर भारत, को दबाव बनाना चाहिए। भारत ने पहले ही कहा है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जरूरी है। ङ्ग पर भी लोग बात कर रहे हैं, जैसे एक यूजर ने कहा कि बीएनपी की जीत से हिंदुओं की सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए, लेकिन निगरानी जरूरी है। ये कोई राजनीतिक खेल नहीं है। ये लाखों लोगों की जिंदगी का सवाल है। बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध, ईसाई सबको बराबर हक मिलना चाहिए।

 अगरबीएनपी सरकार ने पुरानी गलतियां नहीं दोहराई, और जमात जैसे कट्टरपंथियों को काबू में रखा, तो शायद हालत सुधरे। लेकिन अगर नहीं, तो स्थिति और खराब हो सकती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि नई सरकार सबको साथ लेकर चले, क्योंकि एक देश तभी तरक्की करता है जब सब सुरक्षित महसूस करें। भारत जैसे पड़ोसी देशों को मदद करनी चाहिए, लेकिन बिना दखल दिए। आखिर में, इंसानियत से ऊपर कुछ नहीं।

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