भारत में त्रिभाषा नीति

सीबीएसई विद्यार्थियों के लिए त्रिभाषा अध्ययन: एक स्वर्णिम अवसर

ए. विनोद

By : स्वदेश डेस्क
सीबीएसई विद्यार्थियों के लिए त्रिभाषा अध्ययन: एक स्वर्णिम अवसर

भारत को भाषाओं का देश कहा जाता है, और यह विशेषण अत्यंत सार्थक है। विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का सहअस्तित्व इस देश की सबसे बड़ी शक्ति है। ऐसे में, विद्यालयी शिक्षा में एक से अधिक भाषाओं को सीखने का अवसर विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास, सामाजिक संवाद और रोजगार संभावनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में त्रिभाषा योजना को महत्व दिया गया है।

1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तुत त्रिभाषा योजना का उद्देश्य मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी के माध्यम से विद्यार्थियों में भाषाई विविधता को सुनिश्चित करना था। हालांकि, यह योजना पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं हो पाई। विशेष रूप से केंद्रीय बोर्ड सीबीएसई में कक्षा 9-10 की बोर्ड परीक्षा में केवल दो भाषाओं को ही महत्व दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, कक्षा 8 तक तीसरी भाषा पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उनके अध्ययन की औपचारिक मान्यता नहीं मिल पाती थी।

 

केरल जैसे राज्यों में यह समस्या और भी जटिल रही। राज्य बोर्ड के विद्यार्थियों को तीन ही नहीं, बल्कि कभी-कभी चार भाषाएं सीखने का अवसर मिलता है, जबकि सीबीएसई के विद्यार्थियों को केवल दो भाषाओं तक सीमित रहना पड़ता था। यह शिक्षा में समानता के संदर्भ में एक बड़ा प्रश्न बन गया। सरकारी नौकरियों के लिए मलयालम भाषा का ज्ञान अनिवार्य होने की स्थिति में, सीबीएसई विद्यार्थियों के लिए भाषा विकल्प और भी सीमित हो जाते थे।

इन असंतुलनों को दूर करने का प्रयास 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किया गया है। इस नई नीति में भाषा चयन का अधिकार विद्यार्थियों को दिया गया है। हिंदी और अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त करते हुए, यह प्रावधान किया गया है कि तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। इसके अलावा कोई अन्य बाध्यता नहीं है। यह एक विद्यार्थी-केंद्रित और समावेशी दृष्टिकोण है।

 

इसी पृष्ठभूमि में, सीबीएसई ने आगामी शैक्षणिक वर्ष से कक्षा 9-10 में भी तीसरी भाषा के अध्ययन का अवसर देने का निर्णय लिया है। इसके तहत विद्यार्थी त्रिभाषा योजना के अंतर्गत तीन भाषाएं पढ़ सकेंगे, और आवश्यकता होने पर चौथी भाषा को वैकल्पिक विषय के रूप में चुन सकते हैं। इस योजना को स्कूल स्तर पर पढ़ाकर, उसके अंकों को बोर्ड परीक्षा से जोड़ने के तरीके से लागू किया जाएगा।

इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि भाषा का अध्ययन केवल एक विषय नहीं, बल्कि यह व्यक्ति की सोचने की क्षमता, रचनात्मकता और सामाजिक समझ को विकसित करने का एक सशक्त माध्यम है। साथ ही, उच्च शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी भाषाई विविधता एक बड़ा लाभ प्रदान करती है।

 

नीति के अनुसार, तीन भाषाओं में से दो भारतीय भाषाएं होना आवश्यक है। इसका कारण यह है कि देश के विभिन्न भागों में विद्यार्थी घर में एक भाषा, आसपास दूसरी, स्कूल में तीसरी और बाज़ार में अलग भाषा का उपयोग करते हैं। भविष्य में कार्यस्थल पर और भी भाषाओं की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए विद्यार्थियों में बहुभाषी संवाद क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

अधिक भारतीय भाषाएं सीखना इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि लोग शिक्षा और रोजगार के लिए देश के विभिन्न भाषा-क्षेत्रों में जाते हैं। एक भारतीय भाषा जानने वाला व्यक्ति दूसरी भारतीय भाषा को अपेक्षाकृत आसानी से सीख सकता है, क्योंकि भारतीय भाषाओं में ध्वनि, व्याकरण, शब्दावली और सांस्कृतिक संदर्भों में कई समानताएं होती हैं।

विद्यालयी विद्यार्थियों में एक साथ कई भाषाएं सीखने की स्वाभाविक क्षमता होती है, इसलिए इसे बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के अधिकांश गांवों और शहरों में बहुभाषी वातावरण पाया जाता है, जो भाषा सीखने के लिए अनुकूल परिस्थिति प्रदान करता है।

हालांकि, कुछ वर्गों से इस निर्णय के प्रति विरोध भी सामने आया है। मुख्य चिंता यह है कि इससे विद्यार्थियों पर अध्ययन का भार बढ़ेगा। लेकिन जब यह देखा जाए कि विद्यार्थी पहले से ही कक्षा 6 से 8 तक तीन भाषाएं पढ़ रहे हैं, तो यह तर्क बहुत मजबूत नहीं लगता।

समग्र रूप से, सीबीएसई विद्यार्थियों के लिए त्रिभाषा अध्ययन सुनिश्चित करने का यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भारत की बहुभाषी परंपरा को सशक्त बनाएगा और नई पीढ़ी को अधिक सक्षम बनाएगा। इस स्वर्णिम अवसर का विद्यार्थियों और अभिभावकों को पूर्ण रूप से लाभ उठाना चाहिए।


लेखक ए. विनोद, राष्ट्रीय संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली हैं।

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