भारतीय राजनीति को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने के प्रयास और दावे तो लगभग सभी दल करते हैं.. लेकिन दलों की भी अपनी-अपनी और अपने स्तर की मजबूरियां हैं. लेकिन उनकी आड़ में राजनीति को दागिल बनाने का अवसर भी नहीं दिया जाना चाहिए... इसकी रोकथाम की सबसे बड़ी जवाबदेही चुनाव आयोग की है... भारतीय लोकतंत्र की चुनाव प्रक्रिया विश्व के अनेक देशों में आज भी विश्वसनीय और सर्वमान्य रूप से अंगीकार की जा रही है. तभी तो इसके लिए प्रशिक्षण लेने हेतु प्रतिनिधि मंडल आते रहते हैं लेकिन क्या चुनाव आयोग भी भारतीय राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के राज नेताओं की रोकथाम में विफल हो रहा है., क्योंकि हर बार चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की संख्या बढ़ रही है... यह निराशाजनक है कि राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों को दरकिनार कर आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को उन संवैधानिक संस्थाओं की विधायी प्रक्रिया का हिस्सा बना देते हैं., जहां न केवल देश के अहम फैसले होते हैं.. बल्कि कानून भी बनाए जाते हैं...
सवाल है कि अपराध और राजनीति के बीच यह स्याह गठजोड़ क्यों और कैसे फल-फूल रहा है... यह सही है कि दागी नेताओं के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष त्वरित अदालतें बनाई गई हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में फैसला वर्षों बाद आता है और ये नेता अपने पदों पर काबिज रहते हैं... भारतीय राजनीति में सभी दल साफ-सुथरी राजनीति के पक्षधर तो है.. लेकिन विचित्र बात है कि चुनावों के दौरान उन्हें आपराधिक पृष्ठभूमि के किसी नेता पर भरोसा करने में कोई हिचक नहीं होती..नतीजा यह होता है कि दागी नेता विधानसभाओं से लेकर संसद तक पहुंच जाते हैं... बीते कई दशकों में राजनीति का जिस तरह अपराधीकरण हुआ है, उससे लोकतंत्र के उद्देश्यों और लक्ष्यों को गहरी क्षति पहुंची है... चुनाव सुधारों से संबंधित गैर-सरकारी संगठन एडीआर की नई रपट ने एक बार फिर इस चिंता को रेखांकित किया है... इसके अनुसार राज्यसभा के बतीस फीसदी मौजूदा सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है... दूसरी ओर केरल में हलफनामों की समीक्षा के बाद पाया गया कि बानवे विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित है...
लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है कि प्रत्येक दल अपनी एक निर्धारित सीमा रेखा तय करें. क्योंकि चुनाव आयोग के हर बार के सख्त नियमों, कोर्ट की लगातार फटकार के बावजूद आपराधिक एवं दागिल नेताओं का राजनीति विशेष रूप से चुनाव में भागीदार बनना कहीं न कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा है.. क्योंकि आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं... हर साल एडीआर की रपट आती है और सभी तरफ इस पर चिंता भी जताई जाती है. मगर ऐसा लगता है कि न तो इसे राजनीतिक दल कभी इसे गंभीरता से लेते हैं और ही चुनाव आयोग कोई ठोस पहल करता है... नतीजा यह कि हर बार दागी पृष्ठभूमि के लोगों को टिकट दे दिया जाता है और उनके नामांकन पर आयोग की मुहर भी लग जाती है... कई बार तो पुलिस और प्रशासन की सांठगांठ की वजह से समय पर जांच पूरी नहीं हो पाती... वहीं राजनीतिक दल उम्मीदवारों का आपराधिक ब्योरा सार्वजनिक नहीं करते...
कायदे से आपराधिक मामला दर्ज होने पर दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से ही रोक दिया जाए.. तो स्वच्छ राजनीति के लिए जमीन तैयार करने की दिशा में यह बड़ा कदम होगा... जब तक चुनाव आयोग अपनी सख्त भूमिका का आभास जनप्रतिनिधियों को नहीं करवाएगा... तब तक स्थिति में सुधार की गुंजाइश नहीं है... सबसे बड़ी बात तो यही कि चुनाव आयोग सख्ती दिखाने लगता तो नेता-दल कोर्ट का रुख करते हैं... इसलिए कोर्ट को भी आयोग को उसके पूर्ण अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मार्ग प्रशस्त करना होगा....