दिल्ली दंगे, साजिशें और न्याय मंदिर…

दिल्ली दंगे, साजिशें और न्याय मंदिर…

By : स्वदेश डेस्क
दिल्ली दंगे, साजिशें और न्याय मंदिर…

उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य सह-आरोपियों की तुलना में अलग और अधिक गंभीर प्रतीत होती है। अदालत के अनुसार, मुकदमे में देरी कोई ‘तुरुप का इक्का’ नहीं है, जो वैधानिक सुरक्षा उपायों को स्वतः ही दरकिनार कर दे।

‘दोष के मामले में सभी याचिकाकर्ता समान पायदान पर नहीं हैं। अभियोजन पक्ष के मामले से उभरे सहभागिता के स्तर के क्रम के मद्देनज़र न्यायालय को प्रत्येक याचिका की अलग-अलग समीक्षा करने की आवश्यकता है।’

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया शामिल थे, ने सोमवार को सुनवाई करते हुए की।

इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय राजधानी में फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली क्षेत्र में साजिश के तहत दंगे भड़काए गए थे, जिनमें आधिकारिक रूप से 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह एक जघन्य हत्याकांड था, जिसमें निर्दोष हिंदुओं को घरों से निकालकर लहूलुहान करते हुए तालिबानी बर्बरता के साथ मारा गया।

ऐसे में यदि आतंकवादी साजिश को आगे बढ़ाने वाले और उसके मुख्य सूत्रधार उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे राष्ट्रघाती लोग हैं, तो उन्हें आतंकवादियों की श्रेणी में रखकर ही उचित सज़ा मिलनी चाहिए। यही दंगा पीड़ितों के साथ न्याय है।

इसी क्रम में दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने माना कि दोनों आरोपियों पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और अन्य आरोपियों से अलग प्रकृति के हैं।

कोर्ट ने यह भी पाया कि जमानत के लिए दायर आवेदनों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि सभी आवेदक दोषसिद्धि के मामले में समान स्तर पर नहीं हैं। यानी शरजील इमाम और उमर खालिद का अपराध देश की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ खुला खिलवाड़ माना गया है।

शुरुआत से ही दंगों की जांच-पड़ताल में स्पष्ट रूप से तथ्यों और प्रमाणों के साथ यह सामने आया है कि शरजील और उमर ने न केवल पेशेवर तरीके से, बल्कि देश की एकता और अखंडता को खंडित करने के उद्देश्य से दंगों की इस आग में सबसे बड़े उत्प्रेरक की भूमिका निभाई। वे दंगे की साजिश में शामिल होकर संपूर्ण दंगों को अंजाम देने, उसके लिए लामबंदी करने और असला-बारूद जुटाने जैसे कृत्यों के भी दोषी पाए गए हैं।

ऐसे में आतंकियों के पनाहगारों और उनके मंसूबों को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रघाती कृत्यों में शामिल दोषियों के ऐसे कृत्य, जब समाज के जीवन के लिए आवश्यक आपूर्ति या सेवाओं में बाधा उत्पन्न करते हैं और देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालते हैं, तब देश की सर्वोच्च नीति-निर्धारक पंचायत अर्थात संसद भी यह मानती है कि आतंकियों से किसी भी तरह का संपर्क, उन्हें सहयोग करना अथवा उनकी साजिशों को बढ़ावा देकर हिंसा की योजना बनाना भारतीय संप्रभुता और सुरक्षा के लिए घोषित रूप से खतरा पैदा करने वाला राष्ट्रघाती अपराध है।

इन्हीं सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने दिल्ली दंगों की पीड़ा, उससे जुड़ी साजिशों और उनके सूत्रधारों को जमानत देने से स्पष्ट रूप से इंकार किया है। यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित स्वतंत्रता का मूलभूत महत्व है और कोई भी संवैधानिक न्यायालय दोष सिद्ध होने से पहले स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की गंभीरता को अनदेखा नहीं कर सकता, लेकिन संविधान केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि समुदाय की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता को भी अनिवार्य मानता है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी व्यक्ति के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए। लेकिन जब कोई राष्ट्र की कीमत पर आतंकी साजिशों को अंजाम देता है, तो उसे संवैधानिक दायरे में जमानत या रियायत का लाभ देना भी देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ होगा। न्यायालय ने शरजील इमाम और उमर खालिद के कृत्यों को ध्यान में रखते हुए ही यह फैसला दिया है।

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