एकात्म मानववाद : मानवीय संमस्याओं के समाधान का मार्ग

अरविन्द कुमार मिश्रा

By : हितेंद्र शर्मा
एकात्म मानववाद : मानवीय संमस्याओं के समाधान का मार्ग

11 फरवरी को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि मनाई गई। उनके सिद्धांतों और दर्शनों को याद किया गया, जो आज के उपभोक्तावाद, बाजारवाद, जलवायु संकट, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और विघटित परिवार संकट के दौर में विश्व के सामर्थ्य को समर्थन करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तावित एकात्म मानववाद का दर्शन, वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिन: के संस्कृत मंत्रों की व्याख्या करता है, जिसे कई बार राजनीतिक दर्शन के रूप में भी देखा जाता है। भारत में विदेशी प्रभाव के बढ़ते प्रभाव के बीच, पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के विकास के लिए स्वदेशी मॉडल की बात की। उन्होंने लिखा, "हमारे आर्थिक विकास का मार्ग पश्चिम से भिन्न होना चाहिए।"

आज, भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और 'मेक इन इंडिया' जैसी योजनाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। इसे और गति देने की आवश्यकता है, जो केवल सरकार और प्रशासन के प्रयासों से ही संभव नहीं है, बल्कि समाज को अपने आचरण में देश की आर्थिक प्राथमिकताओं को शामिल करना होगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा है, "यदि भारत की आत्मा को समझना है, तो आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखना होगा।" 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के समर्थक थे और उन्होंने उत्पादन, वितरण और विनिमय प्रणाली में स्वदेशी उपक्रमों पर जोर दिया। उन्होंने लिखा, "एकात्म मानववाद कहता है कि प्रत्येक मनुष्य में कुछ न कुछ विशिष्टता है, उसकी विविधताओं का विचार आवश्यक है।" वे मानते थे कि यह समावेशी विकास है और उपभोक्तावाद की परिभाषा प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और सहकार पर आधारित है।

लेखक: अरविन्द कुमार मिश्रा

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