Iran Hijab Protests and Women’s Rights Debate

विश्व महिला दिवस और ईरान में मुस्लिम विमर्श

महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में हिजाब विरोध आंदोलन ने दुनिया भर में महिला अधिकारों और इस्लामिक कानूनों पर नई बहस छेड़ दी।

By : स्वदेश डेस्क
विश्व महिला दिवस और ईरान में मुस्लिम विमर्श

प्रवीण दाताराम गुगनानी

मुस्लिम महिला विमर्श से ईरान के संबंध की समूची चर्चा करेंगे तो एक दीर्घ इतिहास लिखना पड़ेगा। उस दुखद इतिहास को स्मरण करते हुए एक प्रतिनिधि घटना की चर्चा और इस घटना के बहाने कुछ संदर्भों को हम यहाँ इस आलेख में समझेंगे।

वर्ष दो हजार बाईस के विदा होते-होते जब माह नवंबर-दिसंबर में भारत में तीव्र शीत लहर चल रही थी, उस समय ईरान के हिजाब विद्रोह से जुड़े समाचारों को पढ़-पढ़कर भारतीय मुस्लिम महिला समुदाय स्वयं में ऊर्जा और ऊष्मा का आभास कर रहा था। हिजाब पर विवाद ने एक नई दिशा पकड़ ली थी। हुआ यह था कि एक बाईस वर्षीय ईरानी लड़की महसा अमीनी को मॉरैलिटी पुलिस ने केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया था कि उसने हिजाब पहना तो है, किंतु ठीक से नहीं पहना है। महसा अमीनी की मॉरैलिटी पुलिस कस्टडी में मृत्यु हो गई थी। मृत्यु के कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो पाए हैं, संभवतः कभी होंगे भी नहीं।

अमीनी की मौत के प्रकरण के पश्चात ईरान के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर विरोध का वातावरण खड़ा हो गया था। वैश्विक स्तर पर पिछली सदी के औरत-विरोधी इस्लामिक क़ानूनों या शरीयत को लेकर विश्व अब कितना सावधान हो गया है, इस बात को यूएन काउंसिल में हुए हिजाब पर मतदान के विभाजन से समझा जा सकता है। यूएन की इस निर्णय प्रक्रिया में 54 देशों वाली काउंसिल ने मतदान किया था, जिसमें 29 देशों ने इसका समर्थन किया, जबकि रूस समेत 8 देशों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। वहीं भारत समेत 16 देश अनुपस्थित रहे।

ईरान में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बड़े स्तर पर और बड़े ही शक्तिशाली प्रदर्शन वर्ष दो हजार बाईस में किए गए थे। ये प्रदर्शन इतने प्रभावी और विमर्शपूर्ण थे कि समूचे विश्व के महिला विमर्श की दृष्टि ईरान पर टिकी हुई थी। मुस्लिम महिलाओं के इन प्रदर्शनों में लगभग पाँच सौ लोग अपने प्राण गंवा चुके थे। ईरानी शासन ने इन महिला प्रदर्शनों के विरुद्ध न केवल अमानवीय, अपितु पाशविक प्रकार के अत्याचार भी किए और हिजाब का विरोध कर रहे दो लोगों को फांसी पर लटकाकर प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सख्त संदेश देने का प्रयास भी किया था।

ईरानी शासन ने इन प्रदर्शनों के विरुद्ध अपनी समूची शक्ति लगा दी थी, किंतु महिलाएं थीं कि रुकती ही नहीं थीं। बेबस किंतु अत्याचारी ईरानी शासन ने इंटरनेट बंद करा दिया था, ताकि प्रदर्शनकारियों के मध्य संवाद न हो पाए, किंतु इसके बाद भी बड़े-बड़े सफल विरोध प्रदर्शन ईरान में हुए थे। एक मानवाधिकार समूह ने दावा किया कि ईरान के 111 शहरों में एक माह से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन जारी रहे थे और इनमें आठ हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार करने तथा 240 से अधिक प्रदर्शनकारियों के प्राण लेने तक का बर्बरतापूर्ण कृत्य किया गया था।

इस संघर्ष का एक पक्ष यह भी रहा कि गिरफ्तार लोगों में अधिकांश मुस्लिम महिलाएँ ही थीं, इनमें भी छात्राएं अधिक थीं और मृतकों में मुस्लिम युवा लड़कियों की संख्या बहुत अधिक थी। मृतकों में सर्वाधिक छात्राएं थीं। उधर जेलों के अंदर भी परस्पर कैदियों के संघर्ष के नाम पर इन हिजाब विरोधियों को मार डाला गया था। ईरान में चल रहे इन हिजाब विरोधी आंदोलनों और प्रदर्शनों में ईरानी पुरुष वर्ग भी बड़ी संख्या में सम्मिलित हो रहा था।

इस ईरानी युवती महसा अमीनी को एंघेलाब स्ट्रीट (रिवॉल्यूशन स्ट्रीट) की लड़की के प्रतीकात्मक नाम से भी पुकारा जाने लगा था। इसी स्ट्रीट में हुए प्रदर्शनों के प्रारंभ में एक ईरानी युवती ने अपने हिजाब को एक छड़ी पर टांगकर उसे हवा में लहराते हुए फेंक दिया था और यह वीडियो ईरान में बड़ा चर्चित और वायरल हुआ था। बाद में यह ईरानी युवती गायब हो गई थी और इसका बड़ा विरोध हुआ था। इस कांड ने ईरान में विद्रोह की आग में घी डालने का काम किया था।

इस विरोध प्रदर्शन का न्यायालय में बचाव कर रहे ईरानी अधिवक्ता नसरीन सोतीदेह के अनुसार, एंघेलाब स्ट्रीट की दूसरी लड़की के रूप में जानी जाने वाली लड़की 32 वर्षीय नर्गेस होसेनी थी। नसरीन ने बताया था कि इस मामले में न्यायाधीश द्वारा एक लाख पैंतीस हजार अमेरिकी डॉलर का जुर्माना तय किया गया था। प्रदर्शनकारी मुस्लिम महिला के पास जुर्माने की यह भारी-भरकम राशि नहीं थी, अतः उसे दस वर्षों का सश्रम कारावास और 74 कोड़ों का दंड भुगतना पड़ा था।

ईरान में हिजाब अनिवार्य है और 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद वहाँ इस्लामी दंड संहिता की पाँचवीं पुस्तक के अनुच्छेद 638 (जिसे प्रतिबंध और निवारक दंड कहा जाता है) के अनुसार जो औरतें हिजाब नहीं पहनती हैं, उन्हें दस दिन से लेकर दो महीने तक की कैद हो सकती है और साथ ही आर्थिक दंड भी देना होगा। यह जुर्माना पचास हजार रियाल से लेकर पाँच लाख रियाल तक हो सकता है।

सामान्यतः सभी धर्मों में पुराने रूढ़िगत रीतिरिवाजों को छोड़कर नए रीति-रिवाज अपनाए जा रहे हैं, किंतु इस्लाम में ठीक इसका उलट हो रहा है। ईरान में भी कुछ ऐसा ही हुआ, अतः वहाँ की महिलाएँ भड़ककर सड़कों पर उतर आई थीं। ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल में हिजाब अनिवार्य नहीं था। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया।

1979 में ईरान के शासक रूहुल्लाह खुमैनी के शासन में मुस्लिम औरतों के लिए इस्लामिक ड्रेस कोड लागू किया गया और इसका पालन अनिवार्य कर दिया गया था। इस कट्टर आदेश के विरुद्ध ईरानी महिलाएं भड़क गईं और उन्होंने 1979 के महिला दिवस पर ईरान में भयंकर विरोध प्रदर्शन किया। इन बड़े विरोधों के बाद ईरानी शासन ने तनिक ढील बरतते हुए इस आदेश को एक सुझाव में बदल दिया। किंतु इसके बाद अचानक 1980 में ईरान के शासकीय कार्यालयों में हिजाब अनिवार्य किया गया और फिर 1983 में हिजाब सभी ईरानी औरतों के लिए अनिवार्य कर दिया गया।

सबसे बड़ी बात यह थी कि ईरान में गैर-मुस्लिम महिलाओं को भी हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। ईरान समूचे विश्व में अकेला और पहला ऐसा देश है जिसने गैर-मुस्लिम महिलाओं पर भी इस्लामिक ड्रेस कोड लागू किया।विश्व के जाने-माने मुस्लिम मामलों के जानकार बहुधा ही ईरान की उस घटना का उल्लेख करते रहते हैं, जब जनवरी 2018 में ईरान में चीन से कार्यक्रम प्रस्तुत करने आई एक महिला संगीतकार को संगीत कार्यक्रम के मध्य में अपमानजनक तरीके से नकाब पहनने को विवश किया गया था। ईरान में चले इस हिजाब विरोधी प्रदर्शन में हजारों महिलाओं को बड़ी ही सख्ती से और निर्ममता पूर्वक दंड दिए गए थे।

यदि हम उन पीड़ित ईरानी महिलाओं और उन्हें इस्लामिक दंड संहिता के अनुसार मिले दंड का उल्लेख करना प्रारंभ करें, तो यह आलेख लाखों शब्दों का हो जाएगा।