डॉ. विश्वास कुमार चौहान
ईरान के सर्वोच्च मजहबी उस्ताद खोमेनेई की इजराइल अमेरिकी हमले में मौत के बाद भारत सरकार के देशहित में रणनीतिक मौन को अपने कर्तव्य का ही परित्याग बताकर शिया समुदाय के वोट की खींचतान विपक्ष में प्रारम्भ हो गयी। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह इत्यादि की निरंतर बयानबाजी के बाद, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के संपादकीय पृष्ठ पर अभी 3 मार्च 2026 को प्रकाशित कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी जी का एक आलेख 'Government's silence on killing of iran leader is not neutral, it is abdication' छपा, जो भारतीय विदेश नीति की गहन समष्ठ के बजाय राजनीतिक अवसरवाद और छपा नैतिकता का दर्पण मात्र सिद्ध होता है। लेखिका द्वारा भारत सरकार के 'मौन' को 'कर्तव्य का परित्याग' (Abdication) करार देना न केवल कूटनीतिक अदूरदर्शिता का प्रमाण है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के यथार्थवादी सिद्धांतों की पूर्ण उपेक्षा भी है। किसी राष्ट्र की विदेश नीति भायुक अपीलों या वैचारिक पूर्वाग्रहों से निर्देशित नहीं होती: यह 'यथार्थवाद' (Realism) और कठोर 'राष्ट्रीय हितों' (National Interest) की कसौटी पर परिपक्व होती है। अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतकार हंस ने मोर्गेधो ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति 'Politics Among Nations' (छठा संस्करण, पृष्ठ 5-7) में स्पष्ट किया है कि 'अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एकमात्र ध्रुवतारा, शक्ति के रूप में परिभाषित सिर्फ 'राष्ट्रीय हित' ही है'।
भारत का वर्तमान रुख इसी सिद्धांत की अभिव्यक्ति है, जहाँ ईरान के सुप्रीम लीडर अपातुल्ला खामेनेई की हत्या पर संगमित प्रतिक्रिया देना 'निष्क्रियता' नहीं, बल्कि एक सोचा समारा 'रणनीतिक संतुलन है जो भारत को मध्य-पूर्व की अस्थिरता की आग में सीधे झोंकने से बचाता है। यद्यपि खामेनेई की बॉडी मिल जाने और ईरान द्वारा उनकी मृत्यु की घोषणा के बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने भी उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त कर दिया है। लेकिन विपक्ष तो एक्सपोज हो ही गया है.
आलेख में अटल जी के संदर्भ का सदा उपयोग
सोनिया गांधी ने अपने आलेख में अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तेहरान यात्रा का उल्लेख कर एक प्रकार से ऐतिहासिक संदभों की चयनात्मक व्याख्या और वर्तमान यथार्थ को गलत तरीके से निरूपित कर वर्तमान केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है। यह संदर्भ आज के दौर में न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि कूटनीति की गतिशीलता को नकारने गाला भी है। वाजपेयी जी की यात्रा उस युग के वैश्विक समीकरणों के अनुरूप थी, लेकिन सोनिया गांधी जी ने चतुराई से उन परिवर्तनों को अनदेखा कर दिया जो उसके बाद घटित हुए। ईशन का परमाणु कार्यक्रम, जो 2002 के बाद से वैश्विक सुरक्षा के लिए प्रश्न बना, और हाल ही में जनवरी 2024 में ईरान-पाकिस्तान सीमा पर हुआ सैन्य संघर्ष, जहाँ दोनों देशों ने एक-दूसरे की सीमाओं में 'बलूच विद्रोहियों पर मिसाइल हमले किए, यह दर्शाता है कि क्षेत्र की भू-राजनीति अब 'सहयोग' से अधिक 'संघर्ष' की ओर बढ़ चुकी है। कूटनीति पुराने संस्मरणों की जुगाली से नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर वास्तविकताओं से निर्देशित होती है। वाजपेयी जी की विरासत का उपयोग अपनी राजनीतिक कुंठाओं को डंकने के लिए करना उनकी महान छवि के साथ अन्याय है।
ईरान का निरन्तर भारत-विरोधी रुख
वर्तमान में ईरान द्वारा भारत की संप्रभुता पर हस्तक्षेपों और अपमानजनक कूटनीति का एक पूरा कालक्रम है। श्रीमती गांधी द्वारा 'सभ्भातागत संबंधों की दुहाई देना उन कड़वे अनुभवों को विस्मृत करने का प्रयास है, जहाँ ईरान ने बार बार भारत को स्प्रभुता पर प्रहार किया। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निस्सन पर खामेनेई का विवादित ट्वीट, मार्च 2020 में दिल्ली दंगों पर ईरानी विदेश मंत्री की 'संगठित हिंसा' वाली अपमानजनक टिप्पणी, और जून 2022 में एक स्थानीय विवादित बयान पर ईरान द्वारा भारतीय राजदूत को तलब (Summon) कर अपमानित करना। ये सभी कूटनीतिक मर्यादा का खुला उल्लंघन थे। यहाँ तक कि फरवरी 2024 में ईरानी मीडिया ने CAA को 'इस्लामोफोबिक करार देकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को बदनाम करने का प्रयास भी किया। सबसे हालिया उदाहरण सितंबर 2024 का है. जब खामेनेई ने भारतीय मुसलमानों की तुलना गाजा के पीड़ितों से की। हाल ही में फरवरी 2026 में भारत ने तीन अमेरिकी प्रतिबंधित ईरान-संबद्ध तेल टैंकरों को जब्त किया, जो ईरान की अवैध 'शैडो फ्लीट का हिस्सा थे। ऐसे नेतृत्व के प्रति 'मुखर सहानुभूति' की मांग करना भारत के आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ाने के समान है।
ईरान में दमन तक की नृशंसता
सोनिया गांधी जी की नैतिकता का खोखलापन ईरान के आंतरिक महिला दमन पर उनके मौन से उजागर होता है। 16 सितंबर 2022 को महसा अमीनी की मोरालिटी पुलिस हिरासत में क्रूर हत्या के बाद शुरू हुए आंदोलन में ईरानी सुरक्षा बलों ने 500 से अधिक प्रदर्शनकारियों की हत्या की, जिनमें 70 से अधिक बच्चे भी शामिल थे। शासन ने सार्वजनिक फांसी (Public Executions) और जेलों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को हथियार बनाया। नवंबर 2024 में, ईरान ने 'महिला, जीवन, स्वतंत्रता' आंदोलन की नेत्री नूशीन मीरजा को गिरफ्तार कर अमानवीय यातनाएं दीं। एक महिला नेत्री होने के बावजूद सोनिया गांधी का इस 'राज्य-प्रायोजित लिंग-आधारित उत्पीड़न' पर चुप रहना यह संकेत देता है कि उनकी सहानुभूति केवल राजनीतिक वोट बैंक पर आधारित है। जो शासन अपनी बेटियों को सड़कों पर गोलियों से भूनता हो, उसके प्रति संवेदनशीलता को अपेक्षा करना महिलाओं के वैश्विक संघर्ष के प्रति सबसे बड़ा विश्वासघात है। सोनिया जी से भारत की महिलाएं इस विषय पर सवाल अवश्य करेंगी।
सिया प्रशासित ईसन द्वारा सुन्नी देशों पर आक्रमण
आलेख का विचलित करने वाला पक्ष सोनिया गांधी का ईरान-समर्थन है, जो मुस्लिम जगत के सुन्नी बहुल वर्ग की भावनाओं की पूर्ण उपेक्षा करता है। ईरान समर्थित एवम पोषित प्रॉक्सी गुटों हिजबुल्लाह, कताइब हिजबुल्लाह और हूती, द्वारा यमन, सीरिया और इराक में सैन्य हस्तक्षेप ने लाखों सुन्नी मुसलमानों को विस्थापित किया है। जनवरी 2025 में, ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया ने बगदाद में भीषण सुन्नी विरोधी हमले किए, जिससे 200 से अधिक सुन्नी महिना एवम बच्चों की निर्दोषों की जानें गई। सोनिया गांधी का शिगा समुदाय के प्रति यह' अति-मोह' एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है, कि क्या कांग्रेस पार्टी केवल शिया समुदाय के एक संकीर्ण वर्ग को साधने के लिए विशाल सुन्नी मुस्लिम जगत की नाराजगी मोल लेना चाहती है? यह मुस्लिम समाज के भीतर शिया सुन्नी को लेकर कांग्रेस को विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने और भारत की एकता के विरुद्ध कूटनीतिक संकीर्णता का प्रदर्शन है।
हुती आतंकवाद और अर्थव्यवस्था पर प्रहार
सुरक्षा मोचों पर, ईरान-समर्थित छूतियों के हमले भारत की समुद्री सुरक्षा को सीधा चुनौती देते हैं। डीजी शिपिंग की रिपोर्ट दिनांक 23 दिसंबर 2023 को भारत के 'एमवी केम प्लूटों' और 24 दिसंबर को 'एमवी साई बाबा पर हुए हमलों के अलावा, फरवरी 2026 में ईरान-इजराइल संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग पर मृत्यु हुई। भारतीय जहाजों पर ईरान समर्थित आतंकी गुटों के ये हमले भारत के 85% कच्चे तेल आयात और पूरी सपलाई चेन को खतरे में डालते हैं। जब भारतीय नागरिकों की जान दांव पर लगी हो, तब भारत के विपक्ष द्वारा ईरान-समर्थित अराजकता के प्रति नरमी की मांग करना रणनीतिक दिवालियापन और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति घोर उत्तरदायित्वहीनता है। आज का भारत इन चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी समुद्री निगरानी और नौसैनिक शक्ति को मजबूत कर रहा है, न कि शोक संदिशों में उलझ रहा है।
सोनिया गांधी की कूटनीति सितंबर 2020 के मुस्लिम यहूदी किश्चयन अर्थात अब्राहम समानैते (Abraham Accords) के बाद पूरी तरह आप्रासंगिक सिद्ध हो चुकी है। इस समझौते ने इजराइल, UAE और बहरीन को ईरान समर्थित कट्टरपंथ और अस्थिरता के विरुद्ध एकजुट किया है। जब अस्त्र जगत स्वयं ईरान की 'प्रॉक्सी वॉर' से जूझ रहा है, पजैसे 2024 में संयुक्त अरब अमीरात द्वारा ईरान के ड्रोन हमलों का प्रखर विरोध किया गया, तब भारत का ईरान-झुकाव हमारे प्रमुख ऊर्जा साझेदारों को नाराज करेगा। भारत की वर्तमान नीति (भारत-इजराइल-S-UAE) जैसे मंचों से अपने सामरिक और आर्थिक हित सुरक्षित कर रही है। भारत चाबहार के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुँच तो बना रहा है, लेकिन वह आतंकवाद के किसी भी पोषक तत्व के आगे नतमस्तक होने को तैयार नहीं है।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि वोट बैंक की राजनीति बनाम 'राष्ट्र प्रथम' की संकल्पना, कांग्रेस की विफलताओं का आईना है, जो उनका सत्तावादी चेहरा दिखाता हैं। अंततः, सोनिया गांधी जी का यह आलेख कूटनीतिक चिंता से अधिक सत्ता-लिप्सा और विशेष वोट बैंक तुष्टिकरण का प्रमाण है। भाजपा ने प्रत्युत्तर में कांग्रेस की UPA युग की उन विफलताओं को भी ठीक ही उजागर किया है, जैसे 2011 के लीबिया संकट के दौरान कर्नल गद्दाफी के पतन पर काग्रेस का संदेहास्पद मौन रहना। श्रीमती सोनिया गांधी जी द्वारा भारत के विवेकपूर्ण संयम को 'कायरता' कहना उभरते भारत की वैश्विक छवि का अपमान है। यह प्रयास एक संकीर्ण वोट बैंक को देश की सुरक्षा की कीमत पर खुश करने का एक विफल राजनीतिक प्रपंच मात्र है।विपक्ष को वैसे तो अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपने देश के साथ खड़ा होते दिखना ही चाहिए, पर यदि खुलकर समर्थन नहीं करना तो कम से कम अंतराष्ट्रीय विषयों पर अपनी बोट बैंक बवाने के लिए या सत्ता लिप्सा को उजागर नहीं करना चाहिए, क्योंकि देश की जनता सब समझती है। राष्ट्रों का संचालन भावुक लेखों से नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने वाले कठोर एवं यथार्थवादी निर्णयों से होता है। भारत का कूटनीतिक संयम 'नैतिक परित्याग' नाहीं, बल्कि 'राष्ट्र-प्रथम' की गौरवशाली और सशक्त नीति का प्रतीक है।