जेन जी: पुल या दीवार?

जेन जी: जड़ों से जुड़ी, आकाश को छूती पीढ़ी

जेन जी के विषय में उत्पन्न विवादों और गलतफहमियों को दूर करने के लिए संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की गई है।

By : नरेंद्र कुमार
जेन जी: जड़ों से जुड़ी, आकाश को छूती पीढ़ी

पिछले दिनों एक बैठक में नई पीढ़ी पर चर्चा चल निकली। अनुभवों की गठरी खुली। चिंताएं सामने आईं। शिकायतों का सिलसिला भी चला। किसी ने मोबाइल को दोष दिया, किसी ने सामाजिक माध्यमों को, तो किसी ने बदलते संस्कारों को। इसी बीच एक सज्जन मुस्कुराते हुए बोले ‘अरे, ये जेन जी लोग...’ बात सहज थी, शायद विनोद में कही गई थी। लेकिन शब्द मन में कहीं ठहर गए।

‘ये जेन जी लोग...’ इस छोटे-से वाक्य में छिपा ‘ये’ मुझे बेचैन करता रहा। आखिर हमारे और हमारे बच्चों के बीच यह ‘ये’ कब आकर खड़ा हो गया? जिन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिनकी पहली मुस्कान पर घर खिल उठा, जिनके सपनों में हमने अपना भविष्य देखा, जिन्हें बार-बार देश की आशा, ऊर्जा और संभावना कहा वे अचानक हमारे लिए ‘ये लोग’ कैसे हो गए?

प्रधानमंत्री जब युवाओं को ‘मेरे युवा मित्रों’ कहकर पुकारते हैं, तो वह संबोधन केवल शब्द नहीं होता। उसमें एक दृष्टि होती है युवा को सामने बैठाने की नहीं, अपने पास बैठाने की; उसे उपदेश का पात्र नहीं, संवाद का साथी मानने की। शायद जेन जी को लेकर हमारी सबसे बड़ी उलझन स्वयं जेन जी नहीं है। उलझन वह चश्मा है, जिससे हम उसे देख रहे हैं।

हर नई पीढ़ी अपने समय से सवाल करती है

यौवन का स्वभाव ही प्रश्न है। भगत सिंह भी जब स्वतंत्रता को अपने जीवन का सर्वोच्च ध्येय मानकर निकले थे, तब वे अपने समय के युवा ही थे। समय दूसरा था, संघर्ष दूसरा था, साधन सीमित थे, लेकिन भीतर वही ज्वाला थी अपने समय को जस का तस स्वीकार न करने की।

हर युवा पीढ़ी अपने हिस्से के प्रश्न लेकर आती है। वह पूछती है क्यों? वह जानना चाहती है ऐसा ही क्यों? और कभी साहस के साथ कहती है इसे बदलना चाहिए। यही प्रश्न पुरानी पीढ़ी को कई बार असुविधाजनक लगते हैं। कल हमारे प्रश्न हमारे बड़ों को बेचैन करते थे। आज हमारे बच्चों के प्रश्न हमें करते हैं। कल शायद यही बच्चे अपनी अगली पीढ़ी से यही शिकायत करेंगे।

इसे हम पीढ़ियों का अंतर कहते हैं। पर पीढ़ियों में अंतर प्रकृति का विधान है। मन का अंतराल हमारी रचना है। मत अलग हो सकते हैं। भाषा अलग हो सकती है। जीवन की गति अलग हो सकती है। लेकिन संवाद बना रहे तो पीढ़ियों के बीच दूरी नहीं, एक सुंदर सेतु बनता है।

शिकायत मोबाइल से है, प्रश्न हमसे भी है

नई पीढ़ी पर हमारा सबसे सहज आरोप है ‘हर समय मोबाइल में डूबी रहती है।’ शिकायत पूरी तरह निराधार नहीं। लेकिन प्रश्न का एक सिरा हमारी ओर भी मुड़ता है।

क्या हमारे बच्चे हमें पुस्तक हाथ में लिए देखते हैं?

क्या वे हमें परिवार के बीच बैठकर निश्चिंत संवाद करते देखते हैं?

क्या भोजन की मेज पर हमारा अपना मोबाइल हमसे दूर रहता है?

क्या हम उन्हें कभी गांव की पगडंडी पर ले गए?

खेत की मेड़ पर चलाया?

मिट्टी की सौंधी गंध से उनका परिचय कराया?

दादी-नानी की स्मृतियों में छिपी पारिवारिक कथाएं सुनाईं?

अपनी मातृभाषा की मिठास उनके भीतर उतारने का प्रयत्न किया?

यदि बच्चे की दुनिया स्क्रीन में सिमट रही है, तो एक प्रश्न हमें स्वयं से भी पूछना होगा स्क्रीन के बाहर की दुनिया हमने उसे कितनी सुंदर बनाकर दिखाई? संस्कार केवल कहे नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। बच्चे हमारे शब्दों से कम, हमारे आचरण से अधिक सीखते हैं। बच्चों से शिकायत करना सरल है। उनके सामने उदाहरण बनकर खड़ा होना कठिन।

दुनिया हथेली पर आई, जिम्मेदारी कंधों पर

एक समय था जब दूर-दराज की किसी घटना की खबर अगले दिन के समाचार पत्र के साथ हमारे दरवाजे तक आती थी। प्रतीक्षा जीवन का हिस्सा थी। आज संसार एक हथेली में समा गया है। अंटार्कटिका की बर्फ पर चलता कोई अकेला पेंगुइन भी कुछ क्षणों में हमारे बच्चे की स्क्रीन पर है। किसी विदेशी विश्वविद्यालय का व्याख्यान भी, काशी की गंगा आरती भी, वृंदावन का सत्संग भी और चंद्रयान की उड़ान भी।

हमारी पीढ़ी के लिए संसार एक मानचित्र था। इस पीढ़ी के लिए संसार एक स्पर्श है। इसलिए इसकी जिज्ञासाएं अधिक हैं। विकल्प अधिक हैं। अवसर अधिक हैं और उलझनें भी अधिक हैं। दुनिया जितनी छोटी हुई है, माता-पिता, शिक्षक और समाज की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हुई है। सूचनाओं के इस अथाह समुद्र में हमें उनके लिए किनारा बनना होगा। एक ऐसा किनारा, जिसका नाम भरोसा हो।

क्या सचमुच जड़ों से कट रही है यह पीढ़ी?

एक शिकायत अक्सर सुनाई देती है कि आज का युवा धर्म, अध्यात्म, परंपरा और संस्कार से दूर है। लेकिन जरा दृश्य का दूसरा पक्ष भी देखिए। प्रेमानंद जी महाराज को सुनने वाले लाखों युवाओं को किस खाते में रखेंगे? मंगलवार को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर में उमड़ने वाली युवा भीड़ किसकी है? तीर्थस्थलों और आध्यात्मिक आयोजनों में बढ़ती युवा उपस्थिति हमें क्या संकेत देती है?

शायद यह पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर नहीं जा रही। वह अपनी जड़ों तक पहुंचने की अपनी पगडंडी खोज रही है। उसका तरीका अलग है। उसकी भाषा अलग है। उसकी जिज्ञासा अलग है। वह हर बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करेगी कि उसे कह दिया गया ‘हमारे यहां सदियों से ऐसा ही होता आया है।’ वह पूछेगी क्यों? और हमें उस ‘क्यों’ से डरना नहीं चाहिए। हमें परंपरा के पीछे का दर्शन बताना होगा। धर्म के पीछे का मर्म समझाना होगा। संस्कृति को कर्म में उतारकर दिखाना होगा। जड़ों से रिश्ता आदेश से नहीं बनता, आत्मीयता से बनता है।

यह केवल रील बनाने वाली पीढ़ी नहीं

जेन जी को कुछ सेकंड की रील में समेट देना उसके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। यही पीढ़ी सीमा पर खड़ी है। यही युवा वर्दी पहनकर राष्ट्र के लिए अपना सर्वोच्च अर्पित करने को तैयार है। यही पीढ़ी शतरंज की बिसात पर संसार को चकित कर रही है। डी. गुकेश जैसे युवा भारत की प्रतिभा का नया परिचय लिख रहे हैं।

यही युवा नए उद्यम खड़े कर रहे हैं, प्रयोगशालाओं में नए प्रयोग कर रहे हैं, खेल के मैदान में तिरंगा ऊंचा उठा रहे हैं और तकनीक, विज्ञान तथा उद्यमिता में नए रास्ते खोल रहे हैं।यह रील भी बनाती है और रिकॉर्ड भी। इसकी उंगलियां स्क्रीन पर चलती हैं, तो इन्हीं उंगलियों में शतरंज के मोहरे इतिहास भी रचते हैं। यही हाथ कीबोर्ड पर नई तकनीक गढ़ते हैं। यही हाथ तिरंगा थामते हैं। अभिव्यक्ति बदल गई है। आकांक्षा नहीं।

संवेदना इसकी शक्ति है

इस पीढ़ी की एक सुंदर विशेषता है संवेदना। यह अपने साथ-साथ दूसरे के दर्द को भी पहचानना चाहती है। पर्यावरण की चिंता हो, पशु-पक्षियों के अधिकार हों, मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न हो, समान अवसर की बात हो या किसी कमजोर के साथ खड़े होने का विषय—आज का युवा इन बातों पर अधिक सहजता से बोलता है।हो सकता है उसके कुछ निष्कर्ष हमें अपरिपक्व लगें। कुछ विचारों से हमारी असहमति हो। असहमति स्वाभाविक है। लेकिन संवेदना को खारिज नहीं किया जा सकता। सही दिशा मिले तो यही संवेदना करुणा बनती है। करुणा कर्तव्य में बदलती है। और कर्तव्य समाज को बदलने की शक्ति बन जाता है।

हर चमकती स्क्रीन के पीछे एक मन भी है

आज के युवा के पास अवसरों का आकाश है, लेकिन दबावों का विस्तार भी कम नहीं। हर क्षण तुलना है। हर मोड़ पर प्रतिस्पर्धा है। हर स्क्रीन पर किसी और की उपलब्धि चमक रही है। सामाजिक माध्यमों पर हर कोई सफल दिखाई देता है। ऐसे में अपनी छोटी-सी असफलता भी कभी-कभी पहाड़ जैसी लगने लगती है।इसलिए आज के बच्चे को केवल अनुशासन नहीं चाहिए। उसे आश्वासन भी चाहिए। हर बार यह सुनाने की आवश्यकता नहीं कि ‘हमारे जमाने में तो...’ कभी-कभी उसके पास बैठकर इतना कहना अधिक उपयोगी होगा ‘कहो... मैं सुन रहा हूं।’कितना छोटा वाक्य है, लेकिन किसी अकेले पड़ते मन के लिए यही वाक्य पूरा आसमान बन सकता है।

पीढ़ियों के बीच दीवार नहीं, पुल चाहिए

हमें जेन जी को बहुत कुछ देना है अपना अनुभव, अपनी स्मृतियां, अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने संघर्षों से अर्जित विवेक। लेकिन इस पीढ़ी के पास भी हमें देने के लिए बहुत कुछ है—नई दृष्टि, नई गति, नई तकनीक, नए प्रश्न और दुनिया को देखने की एक नई खिड़की।

हम उन्हें धैर्य दे सकते हैं।
वे हमें गति दे सकते हैं।

हम उन्हें जड़ों का पता बता सकते हैं।
वे हमें नए आकाश का रास्ता दिखा सकते हैं।

हम उन्हें अनुभव की रोशनी दे सकते हैं।
वे हमें संभावना का नया सूरज दिखा सकते हैं।

रिश्ता उपदेश का नहीं, संवाद का हो। श्रेष्ठता का नहीं, सहभागिता का हो। टकराव का नहीं, विश्वास का हो। यही पीढ़ियों के बीच सबसे सुंदर सेतु होगा।

वह ‘ये’ हटा दीजिए

इसलिए अगली बार किसी बैठक में कोई मुस्कुराकर कहे ‘अरे, ये जेन जी लोग...’ तो शायद हमें भी मुस्कुराकर कहना चाहिए हां, जेन जी हैं। लेकिन ‘ये लोग’ नहीं। ये हमारे ही बच्चे हैं। हमारे मित्र हैं। हमारी उम्मीद हैं। हमारा आज हैं और हमारे कल के शिल्पकार हैं।उनकी हर बात सही नहीं होगी, जैसे हमारी हर बात सही नहीं थी। वे गलतियां करेंगे, जैसे हमने कीं। वे गिरेंगे, चोट खाएंगे, सीखेंगे, फिर उठेंगे और शायद हमसे कहीं आगे निकल जाएंगे।हमें उनका रास्ता तय नहीं करना है। हमें केवल इतना करना है कि जब वे अपने रास्ते की तलाश में निकलें, तो पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें कोई अपना दिखाई दे। एक ऐसा अपना, जिसकी आंखों में शिकायत से अधिक विश्वास हो।क्योंकि जेन जी कोई दूसरी दुनिया नहीं है। वह हमारी ही कहानी का अगला अध्याय है। हमने अपने हिस्से का भारत पाया, उसे जिया, उसे थोड़ा संवारा। अब भारत की अगली यात्रा इन्हीं कंधों पर आगे बढ़ेगी।

कल का भारत कैसा होगा, उसकी इबारत इन्हीं आंखों के सपनों से बनेगी। उसके रंग इन्हीं कल्पनाओं से आएंगे। उसकी गति इन्हीं कदमों से तय होगी। इसलिए उन्हें कटघरे में खड़ा करने के बजाय उनके साथ खड़े होइए। उनसे शिकायत कम कीजिए, संवाद अधिक कीजिए। उन्हें सुनिए। उन्हें समझिए और सबसे बढ़कर उन पर भरोसा कीजिए।क्योंकि भविष्य को अपने सांचे में ढाला नहीं जाता। भविष्य का हाथ थामा जाता है। उसके साथ चला जाता है। और याद रखिए भारत की अगली कहानी किसी और को नहीं, इन्हीं हाथों को लिखनी है।


सुनील बंसल
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

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