गंभीर पत्रकारिता का संकट

प्रासंगिकता गंभीर पत्रकारिता की

इस युग में जब फेक न्यूज़ और सनसनीखेज पत्रकारिता हावी है, तब गंभीर और नैतिक पत्रकारिता के लिए संघर्ष और भी कठिन हो गया है।

By : स्वदेश डेस्क
प्रासंगिकता गंभीर पत्रकारिता की

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सुमिता सिरोठिया

सूचना क्रांति के युग में, जब सूचनाओं का अंधड़ हो, ऐसे परिवेश में क्या गंभीर पत्रकारिता के लिए संभावनाएँ हैं या खतरा?

इस प्रश्न के दोनों उत्तर हो सकते हैं। खतरा तो है ही। कारण, बाजारवादी युग में आज तुलनात्मक रूप से अपरिपक्व पत्रकार कहीं न कहीं स्थान पाते दिख रहे हैं। वहीं, गंभीर और परिपक्व पत्रकारिता के लिए स्थान सीमित हो रहा है। पर यह स्थिति दीर्घकाल तक नहीं रहेगी, यह भी सच है। अतः मूल्य और विचार आधारित, सत्य और तथ्य के साथ बात करने वाली पत्रकारिता अपना स्थान बनाएगी और आज भी वह हस्तक्षेप कर रही है।

यह सही है कि जब किसी योग्य और समर्पित व्यक्ति की वर्षों की साधना को किनारे कर उसकी जगह ऐसे लोग ले लेते हैं, जिनका उद्देश्य केवल सनसनी, भ्रम या प्रोपेगेंडा फैलाना होता है, तो उसका नुकसान केवल एक पेशे का नहीं, पूरे समाज का होता है।

आखिर उस पत्रकार का क्या दोष है, जिसने वर्षों तक ईमानदारी, निष्पक्षता और कठोर परिश्रम के साथ पत्रकारिता की तपस्या की, लेकिन आज उसे न उचित पहचान मिल रही है, न सम्मान। दूसरी ओर, बिना पत्रकारिता की शिक्षा, प्रशिक्षण या पेशेवर समझ के अनेक लोग केवल मोबाइल और सोशल मीडिया के सहारे स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वही समाज और देश को न्याय दिलाएँगे।

वास्तविकता यह है कि आज पत्रकारिता का एक बड़ा संकट फेक नैरेटिव गढ़ने और प्रोपेगेंडा फैलाने की प्रवृत्ति बन गया है। सोशल मीडिया ने सूचना के लोकतंत्रीकरण का अवसर तो दिया, लेकिन उसके साथ-साथ झूठी खबरों, आधी-अधूरी सूचनाओं और भ्रामक दावों का ऐसा बाज़ार भी खड़ा कर दिया है, जहाँ “फेक न्यूज़ बनाओ, व्यूज़ पाओ और पैसा कमाओ” एक मॉडल बनता जा रहा है। समाज पर उसके दुष्परिणामों की चिंता बहुत कम लोगों को है।

ज़रा कल्पना कीजिए यदि पत्रकारिता का कोई विद्यार्थी केवल शौक़ में किसी चिकित्सक के क्लीनिक पर बैठकर रोगियों का उपचार करने लगे, तो क्या समाज उसे स्वीकार करेगा? निश्चित ही नहीं, क्योंकि चिकित्सा में योग्यता, प्रशिक्षण और उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं। यही सिद्धांत पत्रकारिता पर भी समान रूप से लागू होता है। पत्रकारिता भी एक गंभीर लोकदायित्व है, जिसे केवल लोकप्रियता या तकनीकी साधनों के भरोसे नहीं निभाया जा सकता।

विडंबना यह है कि फेक न्यूज़ और भ्रामक सामग्री फैलाने वालों की दुकानें खूब चल रही हैं, जबकि वे श्रमजीवी पत्रकार, जो दिन-रात मेहनत करके तथ्यों को जुटाते हैं और वास्तविक समाचारों के स्रोत होते हैं, आज भी संघर्ष कर रहे हैं। सच ही कहा गया है—“गुरु गुड़ रह गए और चेला शक्कर बन गया।”

समय आ गया है कि हम पत्रकारिता की गरिमा, नैतिकता और पेशेवर मर्यादा को पुनः स्थापित करें। प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और दायित्व के अनुरूप कार्य करे, सत्य और तथ्य के प्रति प्रतिबद्ध रहे तथा राष्ट्र और समाज के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन करे। यही आज का युगधर्म है।

(लेखिका टीवी एंकर और पत्रकार हैं)

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