बाल श्रम पर प्रहार

नन्हे हाथों में सपनों की रोशनी देने का संकल्प

मध्यप्रदेश सरकार बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।

By : स्वदेश डेस्क
नन्हे हाथों में सपनों की रोशनी देने का संकल्प

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प्रहलाद सिंह पटेल

बचपन जीवन का वह स्वर्णिम काल होता है, जब आँखों में अनगिनत सपने पलते हैं, मन कल्पनाओं के आकाश में उड़ान भरता है और भविष्य की संभावनाएँ आकार लेती हैं। यह वह समय है, जब बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, पैरों में खेल की चंचलता और चेहरे पर निश्छल मुस्कान होनी चाहिए। लेकिन समाज का एक कटु सत्य यह भी है कि आज भी अनेक बच्चों का बचपन अभाव, नशा, गरीबी और श्रम के बोझ तले दबा हुआ है। उनके नन्हे हाथ, जो कलम थामने के लिए बने थे, आज मजदूरी के कठिन कार्यों में उलझे दिखाई देते हैं। उनका जीवन देखकर समाज की संवेदनहीनता और हमारी सामूहिक विफलता का एहसास होता है।

हर वर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम दिवस हमें अपने संकल्प का स्मरण कराता है। यह दिन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम अपने बच्चों के लिए ऐसा समाज बना पाए हैं, जहाँ उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार सहज रूप से प्राप्त हो सके? यदि नहीं, तो यह हमारे लिए चिंता का विषय है।बाल श्रम केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मानवता के मूल्यों के विरुद्ध अपराध है। किसी भी बच्चे को उसकी उम्र से पहले जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए विवश करना उसके अधिकारों का हनन है। बच्चों का स्थान कारखानों, दुकानों, ढाबों और खतरनाक कार्यस्थलों पर नहीं, बल्कि विद्यालयों, खेल के मैदानों और परिवार के स्नेहिल वातावरण में होना चाहिए। हमारे श्रमोदय विद्यालय इसी भावना का मूर्त स्वरूप हैं।

जब कोई बच्चा मजदूरी करता है, तब केवल उसका वर्तमान ही नहीं, बल्कि उसका भविष्य भी प्रभावित होता है। उसके सपने सीमित हो जाते हैं और उसके विकास की संभावनाएँ बाधित हो जाती हैं।मध्यप्रदेश सरकार बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। हमारा स्पष्ट लक्ष्य है ‘बंधुआ एवं बाल श्रम मुक्त मध्यप्रदेश।’ यह केवल एक प्रशासनिक उद्देश्य नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का व्यापक अभियान है। हम ऐसा प्रदेश बनाना चाहते हैं, जहाँ किसी भी बच्चे को मजबूरी में श्रम न करना पड़े और प्रत्येक बच्चे को अपने सपनों को साकार करने का अवसर मिले।

बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया है। यह कानून बच्चों को रोजगार में लगाने पर प्रतिबंध लगाता है और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान करता है। इसी प्रकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति है कि शिक्षा ही बच्चों को गरीबी और शोषण के चक्र से मुक्त कर सकती है।हालाँकि, केवल कानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होता। बाल श्रम जैसी चुनौती का मुकाबला समाज की सामूहिक भागीदारी से ही संभव है। यदि हमारे आसपास कोई बच्चा मजदूरी करता दिखाई दे, तो यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि वह कार्रवाई करे। यह हम सभी का नैतिक दायित्व है कि हम उस बच्चे को बेहतर जीवन की ओर ले जाने में सहयोग करें।

समाज, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान और जागरूक नागरिक  सभी को इस अभियान में सहभागी बनना होगा। बाल श्रम उन्मूलन के लिए पाँच महत्वपूर्ण स्तंभ आवश्यक हैं  कानूनी सहायता, पुनर्वास, कौशल विकास, जनजागरूकता और प्रशासनिक संवेदनशीलता।केवल बच्चों को श्रम से मुक्त करा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उज्ज्वल भविष्य के अवसर भी उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सरकार और मेरा विभाग पुनर्वास योजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से प्रभावित परिवारों को सहायता प्रदान कर रहा है।

वास्तव में गरीबी बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण है। जब परिवार आर्थिक संकट से जूझते हैं, तब बच्चों को भी कम उम्र में जिम्मेदारियों का भार उठाना पड़ता है। इसलिए बाल श्रम के उन्मूलन का अर्थ केवल बच्चों को कार्यस्थलों से हटाना नहीं, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी है।रोजगार सृजन, स्वरोजगार योजनाएँ और ग्रामीण विकास कार्यक्रम इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जब परिवार आत्मनिर्भर होंगे, तब बच्चों को मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और वे शिक्षा तथा अपने सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बाल श्रम को केवल सरकारी विषय न मानें, बल्कि सामाजिक चेतना का हिस्सा बनाएँ। हमें ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहाँ बच्चों के हाथों में औजार नहीं, बल्कि किताबें हों; उनकी आँखों में भय नहीं, बल्कि सपनों की चमक हो; और उनके जीवन में संघर्ष नहीं, बल्कि अवसरों की अनंत संभावनाएँ हों।बाल श्रम और कौशल विकास के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। यदि कोई बच्चा अपने परिवार की परंपरागत कला, व्यवसाय या पुश्तैनी कार्य में रुचि रखता है, तो वह उसकी जन्मजात प्रतिभा और कौशल का परिचायक हो सकता है। ऐसे में उसकी इच्छा और रुचि के अनुरूप उस कौशल का ज्ञान प्राप्त करना उसके व्यक्तित्व विकास का माध्यम बन सकता है, बशर्ते यह उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और बचपन के अधिकारों को प्रभावित न करे।

विश्व बाल श्रम दिवस के अवसर पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि किसी भी बच्चे का बचपन मजबूरी में न बीते।

आइए, हम मिलकर ऐसा मध्यप्रदेश और ऐसा भारत बनाने का प्रयास करें, जहाँ हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन जी सके। क्योंकि ‘बाल श्रम मुक्त मध्यप्रदेश’ केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ऐसे विकसित, संवेदनशील और समृद्ध भारत की आधारशिला है, जिसकी नींव हमारे बच्चों के उज्ज्वल भविष्य पर टिकी हुई है। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्र निर्माण का मार्ग है और यही हमारी सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

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