राष्ट्रीय एकता को फिर चुनौती

राष्ट्रीय एकता को फिर चुनौती

By : Swadesh Bhopal
राष्ट्रीय एकता को फिर चुनौती

हाल ही में 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज किए जाने के बाद यह मुद्दा फिर से गरमा गया है। भाजपा ने कांग्रेस पर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का समर्थन करने का आरोप लगाया है। दरअसल, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ शब्द का उपयोग अक्सर उन लोगों के लिए किया जाता है, जो कथित तौर पर भारत-विरोधी नारे लगाते हैं या देश की एकता को चुनौती देते हैं।

यह ठीक है कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने के लिए भारतीय संविधान अपने नागरिकों को विरोध और असहमति का अधिकार देता है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना देशद्रोह नहीं है, लेकिन राष्ट्र-विरोधी नारे लगाना कहां तक न्यायसंगत है? जिस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दस साल पहले ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह’ के नारे लगे थे, उसी कैंपस में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ बेहद अशोभनीय नारे लगाए गए।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की चुनौती वास्तव में न्यायालय के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए है। न्यायालय कानूनी ढांचे के भीतर अपना काम करते हैं। चुनौती राजनीतिक विमर्श के उस हिस्से से आती है, जो जानबूझकर राजनीतिक लाभ के लिए एक अस्पष्ट और गैर-कानूनी शब्द का उपयोग करता है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता तब तक सुरक्षित रहेगी, जब तक न्यायालय इस तरह के बाहरी दबावों के बावजूद कानून के शासन को बनाए रखते हैं और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक बयानबाजी न्याय के पथ को अवरुद्ध न करे।

जेएनयू प्रशासन ने दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर इन छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कहा है। सोमवार की रात जेएनयू के साबरमती छात्रावास के बाहर एआईएसए और एसएफआई के छात्र नेताओं की एक बैठक बुलाई गई, जिसे ‘गुरिल्ला ढाबा’ नाम दिया गया। बताया गया कि छात्र संगठनों के लोग साबरमती छात्रावास के बाहर 2020 में जेएनयू में छात्रों पर हुए हमलों के विरोध में प्रदर्शन करेंगे, क्योंकि उस मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। लेकिन जब भीड़ जुटी तो समझ आया कि विरोध प्रदर्शन उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी खारिज होने के खिलाफ था।

नारेबाजी तक तो ठीक था, लेकिन थोड़ी ही देर बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए गए। फिर भाजपा, अंबानी और अडाणी के खिलाफ नारे लगे, भगवा को शिकस्त देने के दावे किए गए। साबरमती छात्रावास के बाहर हुए ‘गुरिल्ला ढाबा’ प्रदर्शन में जिस तरह के देश को शर्मसार करने वाले नारे लगे, ऐसे ही नारे इसी जेएनयू में, इसी जगह पर, दस साल पहले भी लगे थे। तब भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की कामना की गई थी।

विरोध के नाम पर विश्वविद्यालय की आचार संहिता को तोड़ा गया। लोकतांत्रिक आजादी के नाम पर संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ अपमानजनक नारेबाजी की गई, जिससे कैंपस का माहौल बिगड़ सकता है। इससे एक बात और साफ हो गई है कि जेएनयू अब टुकड़े-टुकड़े गैंग का मुख्यालय बन गया है। अच्छा होगा कि इस तरह के नारे लगाने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चले।

जेएनयू में जो हुआ, उसने एक बार फिर देशभक्तों को ललकारा है। सवाल सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के खिलाफ नारे लगाने का नहीं है। किसी भी व्यक्ति की मौत की कामना करना इंसानियत के खिलाफ अपराध है। लेकिन मोदी तो बहाना हैं, निशाना देश है। जेएनयू में लगे ये नारे हमारे संविधान और शीर्ष न्यायालय को चुनौती हैं। इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।