सबसे बड़ा लाभ दिव्यांगजनों के लिए हो सकता है

वर्चुअल रियलिटी में इंसान ने “उड़ना” सीखा: मानव मस्तिष्क की अनोखी क्षमता पर नए शोध ने चौंकाया

अनुराग तागड़े 

By : स्वदेश डेस्क
वर्चुअल रियलिटी में इंसान ने “उड़ना” सीखा: मानव मस्तिष्क की अनोखी क्षमता पर नए शोध ने चौंकाया

इंदौर। क्या इंसान भविष्य में पक्षियों की तरह उड़ने का अनुभव कर सकेगा? चीन के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अनोखे प्रयोग ने इस कल्पना को नई दिशा दे दी है। वर्चुअल रियलिटी तकनीक के जरिए प्रतिभागियों को कृत्रिम पंख दिए गए और कुछ ही दिनों में उनका मस्तिष्क उन पंखों को अपने शरीर का हिस्सा मानने लगा। यह अध्ययन न केवल मानव मस्तिष्क की अद्भुत “ब्रेन प्लास्टिसिटी” यानी खुद को बदलने और नई चीजें अपनाने की क्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि इंसानी दिमाग समय के साथ लगातार खुद को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालता रहा है।

ब्रिटेन की एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी की संज्ञानात्मक तंत्रिका वैज्ञानिक जेन एस्पेल ने इस अध्ययन को “बेहद रोचक” बताते हुए कहा कि यदि मस्तिष्क कृत्रिम पंखों जैसी गैर-मानवीय संरचना को भी अपने शरीर का हिस्सा मान सकता है, तो भविष्य में वह अन्य कृत्रिम अंगों और तकनीकी संवर्द्धनों को भी स्वीकार कर सकता है।

यह शोध चीन की पेकिंग यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक यानचाओ बी के एक पुराने सपने से शुरू हुआ। वह हमेशा स्वयं उड़ने का अनुभव करना चाहती थीं। वर्ष 2023 में उन्होंने यह इच्छा विश्वविद्यालय की मोटर कंट्रोल लैब के प्रमुख कुनलिन वेई के साथ साझा की। वहीं से यह विचार जन्मा कि क्या वर्चुअल रियलिटी तकनीक के माध्यम से इंसानों को “उड़ना” सिखाया जा सकता है।

इसके बाद वैज्ञानिक यीयांग काई ने पक्षियों की उड़ान प्रणाली पर आधारित एक सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया। प्रतिभागियों को   वर्चुअल रियलिटी  और मोशन-ट्रैकिंग उपकरण पहनाए गए। वर्चुअल दुनिया में वे स्वयं को विशाल भूरे पंखों वाले पक्षी-जैसे प्राणी के रूप में देखते थे। जैसे ही वे हाथ फड़फड़ाते या कलाई घुमाते, स्क्रीन पर उनके पंख भी उसी तरह हिलते।

25 प्रतिभागियों पर किए गए इस प्रयोग में शुरुआत में कई लोगों को कठिनाई हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने हवा में संतुलन बनाना, गिरती वस्तुओं को हटाना और आकाश में बने रिंग्स के बीच से गुजरना सीख लिया। बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट जियी श्योंग के अनुसार कुछ प्रतिभागियों ने पहली ही कोशिश में उड़ान नियंत्रित कर ली, जबकि अन्य को तीन-चार सत्र लगे, लेकिन सभी में स्पष्ट सुधार देखा गया।

मस्तिष्क हमेशा से खुद को बदलता रहा है

विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी ताकत उसकी “अनुकूलन क्षमता” है। हजारों वर्षों में इंसान ने आग जलाना, खेती करना, भाषा बोलना, संगीत समझना और औजार बनाना सीखा। हर नई खोज के साथ मस्तिष्क ने अपने न्यूरल नेटवर्क को बदला और नई क्षमताएं विकसित कीं।

आधुनिक दौर में भी यह प्रक्रिया जारी है। उदाहरण के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट ने हमारी याद रखने और जानकारी खोजने की आदत बदल दी। कार चलाना सीखते समय शुरुआती तनाव बाद में स्वतः प्रतिक्रिया में बदल जाता है। संगीतकारों और खिलाड़ियों के मस्तिष्क में विशेष हिस्से अधिक विकसित पाए जाते हैं। कृत्रिम हाथ या पैर लगाने वाले कई लोग कुछ समय बाद उन्हें अपने शरीर का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। दृष्टिहीन लोग स्पर्श और ध्वनि के जरिए दुनिया को समझने की असाधारण क्षमता विकसित कर लेते हैं।

वैज्ञानिक इसे “न्यूरोप्लास्टिसिटी” कहते हैं, जिसमें मस्तिष्क अनुभव और अभ्यास के आधार पर स्वयं को पुनर्गठित करता है। यही कारण है कि इंसान नई भाषाएं सीख सकता है, चोट के बाद दोबारा चलना सीख सकता है और अब शायद भविष्य में “उड़ने” का अनुभव भी अपना सकता है।

इंसानों के लिए कैसे उपयोगी होगा यह शोध?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में मानव जीवन को कई क्षेत्रों में बदल सकती है। 

लकवा और दुर्घटना पीड़ितों के लिए मददगार

जिन लोगों के हाथ-पैर काम नहीं करते, वे  वर्चुअल रियलिटी और न्यूरल तकनीक के जरिए कृत्रिम अंगों को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकेंगे।

कृत्रिम अंगों का बेहतर उपयोग

आज कई लोग कृत्रिम हाथ या पैर लगाने के बाद उन्हें “अपना” महसूस नहीं कर पाते। यह शोध मस्तिष्क को उन अंगों के साथ जोड़ने में मदद कर सकता है।

सैनिक और अंतरिक्ष मिशन

भविष्य में सैनिक या अंतरिक्ष यात्री रोबोटिक एक्सोस्केलेटन या अतिरिक्त मैकेनिकल उपकरणों को आसानी से नियंत्रित कर पाएंगे।

शिक्षा और प्रशिक्षण

पायलट, सर्जन और एथलीट   वर्चुअल रियलिटी  जरिए वास्तविक परिस्थितियों का सुरक्षित अभ्यास कर सकेंगे।

मानसिक स्वास्थ्य उपचार

फोबिया, तनाव और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी समस्याओं के उपचार में वर्चुअल रियलिटी  का उपयोग पहले से हो रहा है। यह शोध उसे और प्रभावी बना सकता है।

मानव क्षमताओं का विस्तार

वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में इंसान अतिरिक्त रोबोटिक हाथ, डिजिटल संवेदनाएं या नई प्रकार की “इंद्रियां” भी अपना सकता है। मस्तिष्क ने पंखों को “शरीर” मानना शुरू किया. शोध का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष प्रशिक्षण के बाद सामने आया। वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रतिभागियों के मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो सामान्यतः हाथ-पैर जैसी शारीरिक संरचनाओं की तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देता है, अब पंखों की तस्वीरों पर भी उसी तरह प्रतिक्रिया देने लगा था। इसका अर्थ यह है कि मस्तिष्क ने उन कृत्रिम पंखों को शरीर के हिस्से के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया था।

वैज्ञानिकों का कहना है कि  वर्चुअल रियलिटी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि यह मानव अनुभव की सीमाओं को बदल सकता है। भविष्य में लोग ऐसी संवेदनाओं और क्षमताओं का अनुभव कर सकेंगे जो वास्तविक दुनिया में संभव नहीं हैं।

दिव्यांगजनों के लिए वरदान बन सकती है तकनीक

इस शोध का सबसे बड़ा लाभ दिव्यांगजनों के लिए हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्होंने किसी दुर्घटना, बीमारी या जन्मजात कारणों से अपने हाथ-पैर खो दिए हैं या जिनकी शारीरिक गतिविधियां सीमित हैं।

1. कृत्रिम हाथ-पैर को “अपना” महसूस करना

आज कई लोग कृत्रिम हाथ या पैर का उपयोग तो करते हैं, लेकिन मस्तिष्क उन्हें पूरी तरह अपने शरीर का हिस्सा नहीं मानता। इस नए वर्चुअल रियलिटी  और ब्रेन-प्लास्टिसिटी शोध से वैज्ञानिक समझ पा रहे हैं कि मस्तिष्क को नई संरचनाएं स्वीकार करना सिखाया जा सकता है। भविष्य मे कृत्रिम हाथ-पैर अधिक प्राकृतिक महसूस होंगे। व्यक्ति उन्हें बेहतर नियंत्रण से चला सकेगा। चलना, पकड़ना और संतुलन बनाना आसान हो सकता है।

2. लकवा मरीजों के पुनर्वास में मदद

जो लोग स्ट्रोक, स्पाइनल इंजरी या दुर्घटना के बाद हाथ-पैर नहीं चला पाते, उनके लिए  वर्चुअल रियलिटी ट्रेनिंग मस्तिष्क को दोबारा सक्रिय करने में मदद कर सकती है। यदि कोई व्यक्ति   वर्चुअल रियलिटी  खुद को चलते हुए देखता है, तो मस्तिष्क के मोटर हिस्से सक्रिय हो सकते हैं। इससे फिजियोथेरेपी और रिकवरी तेज हो सकती है।

3. रोबोटिक अंगों का नियंत्रण

भविष्य में वर्चुअल रियलिटी  और रोबोटिक्स के साथ ऐसे कृत्रिम हाथ विकसित हो सकते हैं जिन्हें व्यक्ति सिर्फ सोचकर नियंत्रित कर सके। यदि मस्तिष्क उन रोबोटिक अंगों को “शरीर” मानने लगे, तो उनका उपयोग बहुत सहज हो जाएगा।

4. दृष्टिहीन और श्रवण दिव्यांगों के लिए नई संवेदनाएं

वैज्ञानिक मानते हैं कि मस्तिष्क नई प्रकार की “सेंसरी जानकारी” भी सीख सकता है। दृष्टिहीन व्यक्ति कंपन या ध्वनि के जरिए दिशा पहचान सकते हैं। श्रवण बाधित लोगों के लिए विजुअल संकेतों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

5. मानसिक आत्मविश्वास बढ़ेगा

कई दिव्यांगजन कृत्रिम अंगों के कारण मानसिक असहजता महसूस करते हैं। यदि मस्तिष्क उन्हें स्वाभाविक रूप से स्वीकार करने लगे, तो आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता दोनों बढ़ सकती हैं।

भविष्य की संभावनाएं

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस, स्मार्ट कृत्रिम अंग, वर्चुअल रियलिटी आधारित पुनर्वास, और न्यूरल प्रशिक्षण दिव्यांगजनों के जीवन को पहले से कहीं अधिक स्वतंत्र बना सकते हैं। यानी यह शोध केवल “उड़ने” का अनुभव देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क को नई क्षमताएं सिखाकर दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है।

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