अनुराग तागड़े
इंदौर। दुनिया भर में हो रहे नवीन शोधों ने यह स्पष्ट किया है कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य निर्माण में पुरुषों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी महिलाओं की, लेकिन अब तक नीतियों, चिकित्सा अनुसंधान और सामाजिक दृष्टिकोण में इसे पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह असंतुलन भविष्य के स्वास्थ्य तंत्र को प्रभावित कर रहा है।
हाल ही में प्रकाशित द लान्सेंट में प्रकाशित एक विस्तृत अंतर-विषयक समीक्षा (ट्रांसडिसिप्लिनरी रिव्यू) में वैज्ञानिकों ने पुरुषों के “प्रीकॉन्सेप्शन हेल्थ” (गर्भधारण से पहले का स्वास्थ्य) को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। अध्ययन में बताया गया है कि पुरुषों की जीवनशैली, मानसिक स्थिति, पोषण स्तर और सामाजिक परिस्थितियां सीधे तौर पर न केवल उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती हैं, बल्कि उनके होने वाले बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी गहरा असर डालती हैं।
अब तक चिकित्सा अनुसंधान मुख्य रूप से सीमित दृष्टिकोण अपनाता रहा है, जिसमें पुरुषों के संदर्भ में केवल जैविक पहलुओं जैसे शुक्राणु की गुणवत्ता, डीएनए परिवर्तन (एपिजेनेटिक्स) और आहार पर ध्यान दिया गया। दूसरी ओर, सामाजिक शोध अधिकतर जन्म के बाद पालन-पोषण की भूमिका तक सीमित रहा। इस “खंडित शोध प्रणाली” के कारण पुरुषों के समग्र स्वास्थ्य और उसकी पीढ़ीगत प्रभावों को समझने में बड़ी कमी रह गई।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: पिता का स्वास्थ्य क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स भी इस निष्कर्ष को मजबूती देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और लैंसेट आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों का धूम्रपान, शराब सेवन, मोटापा और तनाव सीधे तौर पर शुक्राणु की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। खराब जीवनशैली से बच्चों में जन्मजात विकार, कम वजन और दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।मानसिक स्वास्थ्य जैसे अवसाद और चिंता भी प्रजनन क्षमता और पारिवारिक वातावरण पर गहरा असर डालता है। इसके अतिरिक्त, शोध यह भी दर्शाते हैं कि पुरुषों के बचपन और किशोरावस्था के अनुभव जैसे पोषण, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य उनके वयस्क जीवन और भविष्य के परिवार पर दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं।
सामाजिक असमानता और जिम्मेदारी का असंतुलन:
इस अध्ययन ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे को भी उजागर किया है। वर्षों से प्रचलित सोच में गर्भधारण और संतानों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर डाल दी गई है। इसे विशेषज्ञ “लैंगिक असंतुलन” का उदाहरण मानते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दृष्टिकोण न केवल महिलाओं पर अतिरिक्त दबाव डालता है, बल्कि पुरुषों को उनकी जिम्मेदार भूमिका से भी दूर करता है। इसके साथ ही, नस्लीय और सामाजिक भेदभाव विशेष रूप से “ब्लैक और ब्राउन समुदायों” के पुरुषों के संदर्भ में उनकी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सामाजिक भूमिका को कमजोर करता रहा है।
केस स्टडी से सामने आई वास्तविकता:
अध्ययन में तीन उदाहरणों के माध्यम से यह बताया गया कि आर्थिक रूप से कमजोर और तनावपूर्ण वातावरण में रहने वाले पुरुषों में प्रजनन स्वास्थ्य समस्याएं अधिक होती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण पुरुष समय पर इलाज और परामर्श नहीं ले पाते।पारिवारिक और सामाजिक नीतियों में पुरुषों की भूमिका को कम आंकने से संपूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली प्रभावित होती है।
नीतिगत बदलाव की जरूरत:
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुरुषों को प्रीकॉन्सेप्शन हेल्थ कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए, तो यह कई स्तरों पर सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी बच्चों के समग्र विकास में सुधार परिवार और समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में वृद्धि लैंगिक समानता को बढ़ावा यह शोध स्पष्ट संकेत देता है कि स्वस्थ और सशक्त भविष्य के लिए केवल महिलाओं पर केंद्रित स्वास्थ्य नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। पुरुषों के स्वास्थ्य, उनके व्यवहार और सामाजिक परिस्थितियों को समान महत्व देना अब समय की मांग बन चुका है।विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सरकारें, स्वास्थ्य संस्थाएं और समाज मिलकर “दोनों अभिभावकों” को केंद्र में रखकर समग्र नीति बनाएं, तो आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य अधिक सुरक्षित और संतुलित हो सकता है।