गणतंत्र दिवस- हमारा कर्तव्य

गणतंत्र दिवस- हमारा कर्तव्य

शिवप्रकाश

By : Swadesh Bhopal
गणतंत्र दिवस- हमारा कर्तव्य

26 जनवरी 1950 को भारत ने अपने संविधान को लागू किया था। यह यात्रा चुनौतियों से भरी हुई, लेकिन एक सफल लोकतंत्र की कहानी है। हमारी इस सफलता में भारत के संविधान का महत्वपूर्ण योगदान है। संविधान सभा द्वारा यह संविधान 26 नवंबर 1949 को राष्ट्र को समर्पित किया गया था। हमने उस समय यह संकल्प दोहराया था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय देने के प्रति हम प्रतिबद्ध हैं। हम अपनी-अपनी श्रद्धा एवं आस्थाओं का पालन करते हुए बंधुभाव के साथ राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखेंगे।

हमारे संविधान की विशेषताओं के संदर्भ में अफ्रीकी नेता नेल्सन मंडेला ने कहा था कि भारत का संविधान दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य उभरते लोकतंत्रों के लिए प्रेरणा बना है, क्योंकि इसने विविधता में सम्मान सिखाया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने पंचप्रण के आह्वान में भारतवासियों से सभी प्रकार की गुलामी से मुक्ति का आह्वान किया है। कुछ विदेशी विद्वानों द्वारा योजनाबद्ध पद्धति से भारतीय समाज में हमारी व्यवस्थाओं, इतिहास, महापुरुषों एवं संस्कृति के प्रति हीनता का भाव उत्पन्न किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारा समाज आत्महीनता के भाव से ग्रसित हुआ है।

हमारे राष्ट्र का आधार क्या है, किन मूल्यों के आधार पर हम आगे बढ़ेंगे, ऐसे विषयों पर संपूर्ण राष्ट्र संभ्रम में दिखाई देता है। भारत ही दुनिया का ऐसा देश है जिसके नाम भी दो हैं भारत और इंडिया। यही स्थिति भारत के अनेक विवादों का कारण भी बनी है।

15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में बदलते जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर चिंता व्यक्त की थी। जनसंख्या के इस असंतुलन के कारण भारत का विभाजन हम पहले ही देख चुके हैं। योजनाबद्ध पद्धति से अनेक माध्यमों द्वारा भारत में धार्मिक आधार पर जनसंख्या परिवर्तन को पुनः आकार देने का प्रयास किया जा रहा है। घटती हिंदू जनसंख्या और उसके परिणाम पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में प्रतिदिन घटने वाली घटनाओं से अनुभव किए जा सकते हैं।

मिस्र, तुर्की, ईरान, लेबनान और कोसोवो भी बढ़ती जनसंख्या के कारण समाप्त हुई अपनी प्राचीन संस्कृति के साक्षी हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री ऑगस्ट कॉम्टे ने इन्हीं अनुभवों के आधार पर कहा था- “Demography is Destiny” (जनसंख्या ही भाग्य है)।

हम भारत के लोग इन आसन्न खतरों को पहचानकर विदेशी घुसपैठियों को Detect, Delete, Deport करने में सहायक बनकर लोकतंत्र को बचाने में सहभागी बनें।

विश्व में भारत की बढ़ती शक्ति के कारण अनेक विदेशी शक्तियां, विदेश-प्रेरित व्यक्ति एवं संस्थाएं परेशान दिखाई दे रही हैं। इसी कारण वे मान्यता प्राप्त संवैधानिक संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं को बदनाम करने का निरंतर प्रयास कर रही हैं। अनेक देशों द्वारा प्रशंसित, विश्व में विशिष्ट महत्व रखने वाले भारतीय चुनाव आयोग और ईवीएम पर आरोप लगाना, सीएए को आधार बनाकर भ्रम फैलाना, समाज में संघर्ष खड़ा करना, संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने जैसे आरोप लगाना तथा किसान आंदोलन के नाम पर होने वाली घटनाएं—ये सब इसके जीवंत प्रमाण हैं।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में प्रारंभ हुए आंदोलनों द्वारा चुनी हुई सरकारों को बदलने में भी इन शक्तियों का हाथ बताया जाता है। ‘जेन-ज़ी’ के नाम पर भारत में भी ऐसे ही स्वप्न संजोए जा रहे हैं।

26 नवंबर 1949 को बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने संविधान सभा के अंतिम भाषण में इसे “Grammar of Anarchy” (अराजकता का व्याकरण) कहा था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि तथाकथित जनआंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रचार को हथियार के रूप में प्रयोग करने का प्रयास हो सकते हैं। भारत में विदेशी सहायता प्राप्त अनेक स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) इस अराजकता के पीछे सक्रिय बताए जाते हैं।

अनेक देशों में परस्पर संघर्ष कराकर एवं आर्थिक साम्राज्यवाद के माध्यम से विश्व में प्रभुत्व स्थापित करने वालों के लिए भारत को स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता के आधार पर विकसित और सुरक्षित बनाना ही सशक्त उत्तर होगा।

भारत सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया है। वर्ष 2014 से अब तक लगभग 2000 से अधिक नक्सली मारे गए हैं और 7000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर संविधान में आस्था व्यक्त की है। हम सभी भारतवासियों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों में सहभागी बनकर नक्सल-मुक्त भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के संकल्प को सशक्त बनाना होगा।

कट्टरवादी ताकतें हर स्थान पर स्वयं को पीड़ित दिखाकर अपनी पहचान बचाने के नाम पर अनेक षड्यंत्र कर रही हैं। बांग्लादेश में मकर संक्रांति का विरोध, अमेरिका के टेक्सास में अलग भूमि की मांग, मतांतरण और लव जिहाद जैसे षड्यंत्र भारत सहित कई स्थानों पर देखे जा रहे हैं। घटनाओं के विरोध में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन के माध्यम से समाज में भय का वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली को चुनौती देना कुछ समूहों का स्वभाव बनता जा रहा है।

राष्ट्र के हित में सोचने वाले सभी राष्ट्रहितैषियों के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामान्य व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए परिवारवाद से मुक्ति और आर्थिक योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रमाणिकता हमारे व्यवहार और निर्णयों का हिस्सा बननी चाहिए। सरकारों की सफलता का मूल्यांकन विकास और समाज की खुशहाली के आधार पर हो, न कि जाति और क्षेत्र के आधार पर।

इससे समाज का आंतरिक वातावरण परस्पर सद्भाव और बंधुता से युक्त बनेगा। गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर संवैधानिक मूल्यों का पालन करते हुए, चुनौतियों के प्रति जागरूक रहकर, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना यही हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है।

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