राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी वर्ष की यात्रा और प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी वर्ष की यात्रा और प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन

आशीष कुमार 'अंशु'

By : Swadesh News
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी वर्ष की यात्रा और प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारत का एक ऐसा संगठन है, जिसने अपनी स्थापना के बाद से लेकर आज तक अपनी विचारधारा, संगठन शक्ति और सामाजिक कार्यों के माध्यम से देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय परिदृश्य में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। इस वर्ष 2025 में, आरएसएस अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, और यह अवसर न केवल संगठन के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। इस विशेष मौके पर, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार सार्वजनिक मंचों से आरएसएस की प्रशंसा की है, जिसने न केवल संगठन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया, बल्कि विपक्षी दलों के लिए भी एक नई बहस को जन्म दिया।

लाल किले से ऐतिहासिक उल्लेख

15 अगस्त 2025 को, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बताते हुए इसकी सौ वर्षों की राष्ट्र सेवा की प्रशंसा की। यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने लाल किले से आरएसएस का उल्लेख इस तरह किया। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि पिछले 12 वर्षों में, यानी मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से, ऐसा पहली बार हुआ कि उन्होंने इस ऐतिहासिक मंच से आरएसएस की भूमिका को रेखांकित किया। उनके इस वक्तव्य ने न केवल आरएसएस के स्वयंसेवकों का मनोबल बढ़ाया, बल्कि संगठन की वैश्विक छवि को भी मजबूत किया।

मोदी ने अपने भाषण में आरएसएस के स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा भावना की सराहना की और उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण बताया। यह उल्लेख न केवल संगठन के लिए गर्व का क्षण था, बल्कि इसने विपक्षी दलों में भी हलचल मचा दी। विपक्ष ने इस बयान को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की, लेकिन मोदी के शब्दों ने स्पष्ट किया कि आरएसएस का कार्य केवल सामाजिक और सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय है।

मन की बात में पुन: प्रशंसा

29 सितंबर 2025 को, अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात में, प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर आरएसएस की शताब्दी यात्रा को याद किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस पिछले 100 वर्षों से "बिना थके, बिना रुके" राष्ट्र सेवा में लगा हुआ है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक आपदाओं के समय आरएसएस के स्वयंसेवक सबसे पहले राहत कार्यों में जुट जाते हैं। यह बयान न केवल संगठन के सामाजिक कार्यों को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आरएसएस की कार्यशैली में निस्वार्थता और तत्परता का अद्भुत समन्वय है।

मोदी का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल आरएसएस के स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना, बल्कि आम जनता के बीच संगठन की सकारात्मक छवि को और मजबूत किया। प्राकृतिक आपदाओं में आरएसएस की त्वरित प्रतिक्रिया, चाहे वह भूकंप हो, बाढ़ हो या अन्य संकट, हमेशा से चर्चा का विषय रही है। उदाहरण के लिए, 2001 के गुजरात भूकंप, 2004 की सुनामी, और हाल के वर्षों में केरल और उत्तराखंड की बाढ़ों में आरएसएस स्वयंसेवकों ने राहत और बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

एक मंच पर मोदी - होसबोले

1 अक्टूबर 2025 का दिन एक ऐतिहासिक क्षण लेकर आ रहा है। इस दिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले एक मंच पर उपस्थित होंगे। संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में आरएसएस की 100 वर्षों की यात्रा का स्मरण किया जाएगा। यह आयोजन न केवल संगठन के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करेगा, बल्कि इसके भविष्य के दृष्टिकोण को भी सामने लाएगा।

यह आयोजन इसलिए भी खास है क्योंकि यह पहली बार होगा जब भारत का प्रधानमंत्री और आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व इस तरह के एक सार्वजनिक मंच पर एक साथ दिखाई देंगे। यह घटना विपक्ष के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा बन सकती है, क्योंकि यह आरएसएस और सरकार के बीच संबंधों को लेकर उनकी आलोचनाओं को और हवा दे सकती है। हालांकि, यह आयोजन इस बात का भी प्रतीक है कि आरएसएस का योगदान अब केवल भारत तक सीमित नहीं है।

आरएसएस : एक सदी की यात्रा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी के दिन की थी। तब से लेकर आज तक, यह संगठन भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है। आरएसएस का मूल दर्शन "राष्ट्र प्रथम" रहा है, और इसने अपनी शाखाओं, सामाजिक कार्यों और विभिन्न सहयोगी संगठनों के माध्यम से इस दर्शन को साकार किया है।

आज आरएसएस के लाखों स्वयंसेवक देश और दुनिया भर में फैले हुए हैं, जो न केवल सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी योगदान दे रहे हैं। संघ की शक्ति में अटूट विश्वास रखने वाले संगठन, जैसे विश्व हिंदू परिषद, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और सेवा भारती, विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।

वैश्विक कौतूहल और मोदी का प्रभाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आरएसएस के प्रति बार-बार उल्लेख न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी संगठन के प्रति जिज्ञासा पैदा कर रहा है। मोदी स्वयं आरएसएस के पूर्व प्रचारक रहे हैं, और उनकी यह पृष्ठभूमि उनके बयानों को और अधिक वजन देती है। जब वे लाल किले, मन की बात या किसी अन्य मंच से आरएसएस की प्रशंसा करते हैं, तो यह न केवल संगठन की छवि को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक समुदाय का ध्यान भी इसकी ओर आकर्षित करता है।

मोदी के बयानों का प्रभाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वे आरएसएस को केवल एक हिंदू संगठन के रूप में नहीं, बल्कि एक वैश्विक स्वयंसेवी संगठन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह संगठन की उस छवि को तोड़ता है, जो इसे केवल एक धार्मिक या राजनीतिक संगठन के रूप में देखती है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री के इन बयानों से विपक्षी दलों में खलबली मच गई है। कई विपक्षी नेता इन बयानों को सरकार और आरएसएस के बीच घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक मानते हैं। हालांकि, यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि आरएसएस एक स्वयंसेवी संगठन है, और इसकी गतिविधियां मुख्य रूप से सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों तक सीमित हैं। फिर भी, विपक्ष इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश करता रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा न केवल संगठन के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों ने इस संगठन के योगदान को न केवल राष्ट्रीय, बल्कि वैश्विक मंच पर भी उजागर किया है। लाल किले से लेकर मन की बात तक, मोदी ने आरएसएस को एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, जो राष्ट्र सेवा में अग्रणी है। यह संगठन की उस भावना को दर्शाता है, जो ‘बिना थके, बिना रुके’ राष्ट्र के लिए कार्य करती है।

जैसे-जैसे आरएसएस अपनी शताब्दी मना रहा है, यह स्पष्ट है कि इसका प्रभाव और प्रासंगिकता आने वाले समय में और बढ़ेगी। प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन और वैश्विक मंचों पर संगठन का उल्लेख निश्चित रूप से इसके स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा और भारत के सामाजिक ताने-बाने को और मजबूत करेगा। 

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