जयराम शुक्ल
चुनावी लोकतंत्र में यूँ तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार ने 33 प्रतिशत आरक्षण की प्रतिबद्धता संसद में पारित कर दी है और हमारी महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं, लेकिन इससे पहले यदि किसी ने अत्यंत पिछड़े समाज की महिलाओं की सबसे ज्यादा चिंता की, तो वे डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे। वे लोकतंत्र में नर-नारी समानता को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाना चाहते थे। उनकी सप्तक्रांति का पहला सूत्र भी यही था।नई पीढ़ी को यह शायद ही पता हो कि सिंगरौली विधानसभा से पहला चुनाव जीतने वाली सुमित्री देवी को प्रथम राष्ट्रपति चुनाव के लिए सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया गया था। सुमित्री देवी सिंगरौली क्षेत्र की वनवासी अति पिछड़ी जनजाति खैरवार समुदाय से थीं।
बात तब की है, जब विंध्य क्षेत्र समाजवाद की प्रयोगशाला के रूप में देश और दुनिया में स्थापित हो चुका था। 1948 में बघेलखंड और बुंदेलखंड की छोटी रियासतों को मिलाकर विंध्य प्रदेश का गठन किया गया था। 1952 में विधानसभा के लिए पहला चुनाव होना था। विंध्य प्रदेश की विधानसभा 60 सदस्यों की थी। 12 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहाँ से दो सदस्य चुने जाते थे। सिंगरौली ऐसा ही क्षेत्र था।सोशलिस्ट पार्टी ने सामान्य वर्ग से श्यामकार्तिक को उम्मीदवार बनाया और अनुसूचित जनजाति वर्ग से सुमित्री देवी को।सोशलिस्ट पार्टी के दोनों उम्मीदवार चुन लिए गए। 60 में से 11 विधायक सोशलिस्ट पार्टी के थे, लेकिन खास बात यह थी कि सीधी जिले से कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था।
विंध्य प्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी के नेता जगदीश जोशी बताते थे कि डॉक्टर लोहिया चुनाव परिणामों से इतने उत्साहित हुए कि देश के राष्ट्रपति चुनाव के लिए सुमित्री देवी को सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया। रघु ठाकुर इस संदर्भ की चर्चा करते हुए बताते हैं कि यह घटना विश्वभर की मीडिया की सुर्खियाँ बनी थी।यद्यपि राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपेक्षित सदस्य संख्या न होने की वजह से सुमित्री देवी पात्रता पूरी नहीं कर पाईं, लेकिन चुनावी लोकतंत्र में देश के सर्वाधिक पिछड़े इलाके से एक वनवासी महिला को सामने लाकर लोहिया ने भारत के भविष्य के लोकतंत्र का जो खाका देश के सामने पेश किया था, उसे बाद में नरेंद्र मोदी ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनाकर यथार्थ के धरातल पर उतारा। वे आज हमारे देश की महामहिम हैं।
1957 में मध्यप्रदेश के लिए हुए चुनाव में सिंगरौली की सीट सामान्य घोषित हो गई। सुमित्री देवी निर्दलीय लड़ीं, लेकिन जीत नहीं पाईं। वे खराही गाँव की थीं, जहाँ आज एस्सार के ताप बिजलीघर की ऊँची चिमनियाँ गुंजायमान हैं। सुमित्री देवी का परिवार सिंगरौली की विस्थापन त्रासदी में फँसकर आज गुमनाम-सा हो गया है।