वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जयंती: शौर्य, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अमर गाथा

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जयंती: शौर्य, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अमर गाथा

डॉ. राघवेंद्र शर्मा

By : Swadesh Bhopal
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जयंती: शौर्य, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अमर गाथा

आज हम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जयंती मना रहे हैं, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने अदम्य साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम का अद्वितीय उदाहरण स्थापित किया।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म मणिकर्णिका (मनु) के रूप में हुआ और उन्होंने शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ग्रहण की। उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वे लक्ष्मीबाई बन गईं। रानी लक्ष्मीबाई ने केवल झांसी का राजकाज ही नहीं संभाला, बल्कि घुड़सवारी, तलवारबाजी और सैन्य प्रशिक्षण में भी अपनी महारत दिखाई।

जब राजा गंगाधर राव का निधन हुआ, लॉर्ड डलहौजी ने दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की घोषणा की। इस समय रानी लक्ष्मीबाई ने गर्जना की:"मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी।"

यह न केवल शब्द थे, बल्कि भारतीय स्वाभिमान का शंखनाद बन गए।

रानी ने पुरुषों और महिलाओं को एक साथ लेकर सेना का गठन किया। झलकारीबाई जैसी सहयोगियों के साथ उन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ अदम्य शौर्य दिखाया। भारी संख्या और आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेना के सामने मुट्ठीभर सैनिकों के साथ उनका डटे रहना उनकी नेतृत्व क्षमता और साहस का प्रमाण है।

किले से अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर घोड़े पर सवार होकर निकलना उनके साहस और मातृत्व की पराकाष्ठा थी। तात्या टोपे जैसे वीरों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। ग्वालियर में वीरगति प्राप्त करने से पहले उनके अंतिम युद्ध की शौर्यगाथा ने जनरल ह्यूरोज को यह कहने पर मजबूर कर दिया "विद्रोहियों में वह अकेली मर्द थी।"

मात्र 29 वर्ष की अल्पायु में 18 जून 1858 को उनका बलिदान हुआ, लेकिन उनका अदम्य साहस और मातृभूमि के प्रति प्रेम आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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