Vidisha RSS History: Inspiring Stories of Dedicati

संघ कार्य के 100 वर्ष:  विदिशा के पुराने गाड़ी अड्डे पर 1940 में लगाई गई पहली शाखा

विदिशा में संघ कार्य का इतिहास समर्पण, अनुशासन और त्याग की प्रेरक गाथा है। 1940 से शुरू हुआ यह सफर आज एक मजबूत संगठन के रूप में विकसित हो चुका है।

By : स्वदेश डेस्क
संघ कार्य के 100 वर्ष:  विदिशा के पुराने गाड़ी अड्डे पर 1940 में लगाई गई पहली शाखा

वेत्रवति के तट पर संगठन, संस्कार और समर्पण की जीवंत गाथा

वेत्रवती यानि बेतवा नदी के शांत, जीवनदायिनी तट पर बसा विदिशा केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और संगठनात्मक चेतना का जीवंत संगम रहा है। प्राचीन काल में समृद्ध, स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य के रूप में प्रतिष्ठित इस नगर की चरा उदयगिरि की गुफाओं, हेलियोडोरस स्तंभ और प्राचीन मंदिरों की गरिमा से अनुप्राणित रही है। इसी गौरवशाली पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य भी यहां अंकुरित हुआ और समय के साथ वटवृक्ष की भांति विकसित होता गया। संघ कार्य का औपचारिक प्रारंभ विदिशा में सन् 1940 में हुआ। पहली साखा पुराने गाड़ी अड्डे पर लगाई गई, जो आज 'बाल विहार' के नाम से जाना जाता है। इस बीजारोपण का श्रेय नेमीचंद जैन को जाता है, जो उस समय कक्षा 9 के छात्र के रूप में विदिशा आए थे। सीमित संसाधनों और अल्प सहयोग के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प से शाखा प्रारंभकी। हालांकि शुरुआती दौर में यह प्रयास अनियमित रहा, फिर भी यह एक नश्चेतना का संकेत था।

स्थायित्व का सूत्रपात: संघ कार्य को वास्तविक स्थायित्व सन् 1942 में मिला, जब हरि रघुनाथ गानू, जिन्हें स्नेहपूर्वक 'गानू काका' कहा जाता था, विदिशा आए। उन्होंने किले के भीतर चौपड़ कुआं व्यायामशाला में शाखा प्रारंभ की। यह वही क्षण था, जब संगठन ने जड़े पकड़नी शुरू कीं। विचारों की भिन्नता के बावजूद है. दातार जैसे व्यक्तित्व का सहयोग इस कार्य को व्यापक स्वीकृति दिलाने बाला सिद्ध हुआ।

प्रारंभिक स्तंभ और संगठनात्मक आधारः प्रारंभिक कार्यकर्ताओं में बवन कोकाजी मूले, ज्ञानचंद भंडारी, हरसेवक पेंटर और लक्ष्मीकांत मूले जैसे समर्पित नाम प्रमुख रहे। नगर के पहले संघचालक बिहारीलाल सर्राफ और प्रथम नगर कार्यवाह दौलतराम खत्रों ने संगठनात्मक ढांचे को सुदृढ़ किया। ग्वालियर रियासत के अंतर्गत राहते हुए नारायणराव तटें के मार्गदर्शन ने कार्य को गति प्रदान की।

विस्तार की यात्रा और चुनौतियों का सामनाः समय के साथ संघ कार्य का विस्तार बासौदा, शमशाबाद जैसे क्षेत्रों तक हुआ। 1946 के बाद उज्जैन विभाग से जुड़ने के साथ संगठन को नई दिशा मिली। मुस्लिम रियासत होने और उनके अत्याचारों के चलते सिरोज और कुरवाई जैसे क्षेत्रों में परिस्थितियां प्रतिकूल थीं, परंतु कार्यकर्ताओं ने धैर्य और बुद्धिमता से संगठन की ज्योति प्रज्वलित रखी।

प्रतिबंध और संघर्ष की तपस्याः संथ पर लगे प्रतिबंध के दौरान विदिशा संघर्ष का सशक्त केंद्र बना। लगभग 30 स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह कर जेल यात्राएं की। भैयाजी कस्तूरे का त्याग विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जो प्रतिदिन 14 किलोमीटर पैदल चलकर कार्य का संचालन करते थे। यह कालखंड संगठन के धैर्य और निष्ता की परीक्षा का समय था। 

आपातकालः अडिग संकल्प का दौरः1975 के आपातकाल में भी विदिता के लगभग 80 स्वयंसेवक मीसा और अन्य कानूनों के तहत बंदी बनाए गए। इस कठिन समय में गानू काका का अदम्य साहस प्रेरणास्पद रहा। उन्होंने वृद्धावस्था और अस्वस्थता के बावजूद सत्याग्रह किया और पैरोल अस्वीकार कर पुनः जेल जाना स्वीकार किया।

प्रचारकों की परंपरा और योगदानः विदिशा ने अनेक ऐसे प्रचारक दिए, जिन्होंन संगठन को व्यापक आयाम प्रदान किए। सुरेश अग्रवाल, राजेश तिवारी, बनवारीलाल सक्सेना, अनिल जैन और चन्द्रभान जैसे नाम इस परंपरा के उज्वल स्तंभ है। इनके अतिरिक्त कई विस्तारकों ने भी संगठन को अलग-अलग स्तर तक पहुंचाया।

शीर्ष नेतृत्व का प्रवास और जन-उत्सव

विदिशा में संघ के शीर्ष नेतृत्व का भी प्रवास रहा है। सन् 1988 में प्रांतीय सम्मेलन के दौरान सरसंघचालक बाळासाहब देवरस का विदिशा आगमन हुआ। इस अवसर पर लगभग 1500 स्वयंसेवकों का गणवेश में संचलन और 10 हजार से अधिक नागरिकों की उपस्थिति के साथ विशाल सभा आयोजित हुई, जी जिले के इतिहास का उल्लेखनीय कार्यक्रम बना।

प्रेरक प्रसंगः समर्पण की जीवंत झलक

विदिशा के संघ कार्य में अनेक प्रेरक घटनाएं जुड़ी है। बेतवा के उफनते प्रवाह को तैरकर पार कर समय पर कार्यक्रम में पहुंचने वाले कार्यकर्ता हों या विपरीत परिस्थितियों में भी अनुशासन निभाने वाले स्वयंसेवक ये प्रसंग इस इतिहास को जीवंत और प्रेरणास्पद बनाते हैं। वास्तव में, विदिशा में संप कार्य का इतिहास केवल एक संगठन के विस्तार की कथा नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन और समर्पण की अखंड गाथा है। 1940 में रोपा गया यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी छाया में सामाजिक चेतना और राष्ट्रभाव निरंतर पुष्पित-पल्लवित हो रहे हैं।

यदि केवल कहने के लिए संगठन हो, अर्थात दिखावटी हो, तो उससे कोई भी लाभ नहीं हो सकता। कार्य ठोस हो, तभी वह टिक सकता है। इसलिए हमें अपने कार्य में तेजस्विता, दृढ़ता तथा तीव्रता निर्माण करने का प्रयत्न करना चाहिए।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार