डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक एकता पर दिया जोर

‘हम जब भी बंटे, कमजोर हुए’: डॉ.भागवत का संदेश, फ्रांस से बांग्लादेश तक के हालात का किया जिक्र

संघ के विजयादशमी उत्सव में मोहन भागवत ने सामाजिक एकता, भारतीय संस्कृति और स्वदेशी की महत्वपूर्णता पर जोर दिया।

By : नरेंद्र कुमार
‘हम जब भी बंटे, कमजोर हुए’: डॉ.भागवत का संदेश, फ्रांस से बांग्लादेश तक के हालात का किया जिक्र

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक एकता, भारतीय संस्कृति, स्वदेशी और देश के मौजूदा हालात पर अपनी बात रखी। नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने शस्त्र पूजन किया और संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के हालात का जिक्र करते हुए कहा कि केवल सत्ता या व्यवस्था बदलने से परिस्थितियां नहीं बदलतीं।

‘रिजीम चेंज से परिस्थिति नहीं बदलती’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में पश्चिमी देशों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और विभिन्न देशों में हुए राजनीतिक बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम से ऐसी आंधी चली है, जो व्यवस्था, संस्कार और शिष्टाचार का विरोध करती है।भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग मानते हैं कि सत्ता या शासन व्यवस्था बदलने से परिस्थितियां बदल जाएंगी, लेकिन ऐसा पहले भी नहीं हुआ और आगे भी नहीं होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश और समाज में वास्तविक बदलाव के लिए सोच और व्यवहार में परिवर्तन जरूरी है।

‘भारत विविधता का देश, एकता हमारी ताकत’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भारत की विविधता को देश की विशेषता बताते हुए कहा कि यहां अलग-अलग पंथ, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं। इसके बावजूद देश को एकजुट होकर आगे बढ़ना है।उन्होंने कहा कि विविधता स्वाभाविक है, लेकिन संपूर्ण अस्तित्व की एकता का सत्य स्थायी है। भागवत के मुताबिक, भारत की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता को मजबूत करना जरूरी है।उन्होंने कहा कि देश अतीत में भी एकजुट होकर आगे बढ़ा है और भविष्य में भी एकता के साथ प्रगति कर सकता है।

स्वदेशी और भारतीय पहचान पर जोर

डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि RSS पिछले 100 वर्षों से भारत की अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर समाज को संगठित करने का काम कर रहा है।उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहने की जरूरत बताई। संघ के शताब्दी वर्ष में जिन पांच प्रमुख सामाजिक बदलावों पर जोर दिया जा रहा है, उनमें भारतीय पहचान का बोध और स्वदेशी को बढ़ावा देना भी शामिल है।भागवत ने बंगाल के राजनारायण बसु का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदू मेले की शुरुआत के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति और पहचान के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया था। उन्होंने संत रविदास के योगदान को भी याद किया और सामाजिक समरसता, स्वधर्म के प्रति निष्ठा तथा भक्ति के संदेश का उल्लेख किया।

युवाओं में बढ़ते नशे पर जताई चिंता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने नई पीढ़ी में नशीले पदार्थों की बढ़ती समस्या पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए परिवार और समाज को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को नशे के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करने की अपील की। भागवत ने नई पीढ़ी में सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया।

OTT प्लेटफार्म पर नियम जरुरी

डॉ. मोहन भागवत ने OTT प्लेटफॉर्म और दूसरे डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि समझ और अनुशासन की कमी के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।उन्होंने नई पीढ़ी को आकर्षित करने वाली सामग्री के बीच सही-गलत का अंतर समझने और जिम्मेदारी से व्यवहार करने की जरूरत बताई।

‘आंदोलन समाज को जोड़ने वाला होना चाहिए’

डॉ. मोहन भागवत ने आंदोलनों की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि समाज और देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सभी की है। उनके मुताबिक, अगर किसी आंदोलन के पीछे समाज के प्रति अपनापन और सकारात्मक बदलाव की प्रेरणा है, तो वह उपयोगी हो सकता है।उन्होंने कहा कि यदि आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोध बढ़ाने का माध्यम बन जाता है, तो उसका इस्तेमाल देश को कमजोर करने वाली शक्तियां कर सकती हैं।

शस्त्र पूजन के साथ शुरू हुआ विजयादशमी उत्सव

नागपुर में आयोजित विजयादशमी कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया। इससे पहले उन्होंने स्मृति मंदिर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में हुई थी। इसी कारण संघ हर साल दशहरे पर स्थापना दिवस और विजयादशमी उत्सव आयोजित करता है। इस वर्ष संघ अपने स्थापना के 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है।कार्यक्रम में भागवत का संबोधन सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी, युवाओं की चुनौतियों और देश के भविष्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा।

संबंधित सामग्री

संघ ने राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर किया याद, स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत को श्रद्धांजलि अर्पित की

संघ ने राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर किया याद, स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत को श्रद्धांजलि अर्पित की

आरएसएस ने स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर उन्हें याद किया। इंदौर बैठक में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने बयान जारी किया।

Nov 03, 2026
Dhar Bhojshalahistory:  भोजशाला के इतिहास पर संघ की प्रदर्शनी, तस्वीरों के जरिए दिखाई गई खिलजी के आक्रमण तक की कहानी

Dhar Bhojshalahistory: भोजशाला के इतिहास पर संघ की प्रदर्शनी, तस्वीरों के जरिए दिखाई गई खिलजी के आक्रमण तक की कहानी

मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठक के दौरान भोजशाला के इतिहास पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी लगाई गई।

Nov 03, 2026
भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते स्वदेशी मेले

भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते स्वदेशी मेले

देशभर में आयोजित स्वदेशी मेले कारीगरों, कलाकारों और उद्यमियों को बाजार व पहचान दे रहे हैं। ये मेले ‘लोकल फॉर वोकल’ और आत्मनिर्भर भारत के अभियान को गति प्रदान करते हैं।

Nov 02, 2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक इंदौर में प्रारंभ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक इंदौर में प्रारंभ

शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा, पंच परिवर्तन के क्रियान्वयन तथा शाखा विस्तार और दृढ़ीकरण पर होगा विचार-विमर्श

Nov 02, 2026
संघ की शताब्दी यात्रा : आत्ममंथन, आत्मविलोप और भविष्य की चुनौतियाँ

संघ की शताब्दी यात्रा : आत्ममंथन, आत्मविलोप और भविष्य की चुनौतियाँ

संघ की सौ वर्ष की यात्रा उपहास से अपेक्षा तक पहुँची है। अब संवाद, सामाजिक विश्वसनीयता, समन्वय और मूल वैचारिक अधिष्ठान बनाए रखना उसकी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

Nov 02, 2026