आजादी की लड़ाई जब देशव्यापी राजनीतिक आंदोलन बनी, उससे बहुत पहले राजनारायण बसु भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव जगाने में लगे थे। उन्होंने देसी सामान को बढ़ावा दिया, मातृभाषा में पढ़ाई पर जोर दिया और भारत की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक परंपराओं पर लोगों का भरोसा लौटाने की कोशिश की। उनके जन्म के करीब दो सदी बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें राष्ट्रीय चेतना के शुरुआती अग्रदूतों में से एक बताते हुए याद किया है।
इंदौर में हो रही बैठक में जारी हुआ बयान
इंदौर में मंगलवार को चल रही तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक के दौरान संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने बसु की 200वीं जयंती पर बयान जारी किया। बयान में बताया गया कि स्वदेशी, सामाजिक सुधार, हिंदू सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता पर बसु के विचारों ने ब्रिटिश राज के दौर में राष्ट्रवादी सोच को आकार दिया।
बसु का जन्म 7 दिसंबर 1826 को बंगाल के बोराल गांव में हुआ था, जो अब पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में पड़ता है। वे उस पीढ़ी के बुद्धिजीवियों में थे, जिन्होंने अंग्रेजों के सांस्कृतिक दबदबे पर सवाल उठाए और साथ ही भारतीय समाज के भीतर सुधार की बात भी की। ब्रिटिश शासन ने पढ़े लिखे भारतीयों को धीरे धीरे अपनी सभ्यतागत विरासत से दूर कर दिया था। बसु ने उनका आत्मगौरव लौटाने की कोशिश की। उनका मानना था कि जब तक लोगों को अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं पर गर्व नहीं होगा, कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। उनका ज्यादा जोर पश्चिमी शिक्षा और सोच के असर में आ रहे शिक्षित भारतीयों पर था।
स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के पैरोकार
बसु का एक अहम योगदान देसी सामान और आर्थिक आत्मनिर्भरता की वकालत रहा। उन्होंने राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने के उपाय बताने वाला एक दस्तावेज तैयार किया, जिसका नाम था प्रॉस्पेक्टस ऑफ ए सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ नेशनल फीलिंग।
उनके प्रयासों से 1867 में बंगाल में नबगोपाल मित्र की शुरू की हिंदू मेला को बल मिला। यह मेला देसी उत्पादों, भारतीय संस्कृति और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने का बड़ा मंच बना। यह 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के राजनीतिक रूप से जोर पकड़ने से कई दशक पहले की बात है।
भारतीय भाषाओं और समाज सुधार के हिमायत
बसु भारतीय भाषाओं को शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल करने के पक्के समर्थक थे। उनके लिए मातृभाषा सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय आत्मविश्वास की बुनियाद थी। राष्ट्रवादी विचारों के साथ वे समाज सुधार के काम में भी सक्रिय रहे। उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, गरीबों की मदद और नशे के खिलाफ अभियानों का समर्थन किया।
विधवा पुनर्विवाह को लेकर उनकी प्रतिबद्धता अपने घर में भी दिखी, जब उन्होंने अपने भाई की शादी एक विधवा से कराई और उस दौर की सामाजिक बंदिशों को चुनौती दी। वे शिक्षक भी रहे और शिक्षा को सामाजिक बदलाव का बड़ा जरिया मानते थे। संघ ने इन पहलों को याद करते हुए कहा कि बसु ने समाज सुधार को राष्ट्रीय जागरण से जोड़ने का काम किया।
हिंदू धर्म और राष्ट्रीय एकता पर विचार
बसु हिंदू धर्म को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता की अहम नींव मानते थे। 1873 में उन्होंने द सुपीरियॉरिटी ऑफ हिंदूइज्म लिखी, जिसमें हिंदू दर्शन और उसकी अलग सांस्कृतिक परंपराओं पर अपनी समझ रखी। इसके बाद 1880 के दशक में प्रकाशित पुस्तिका वृद्ध हिंदुर आशा, यानी द ओल्ड हिंदूज होप, में उन्होंने महा हिंदू समिति का विचार रखा। उनके लेखन में यह मान्यता झलकती थी कि भारत के राष्ट्रीय पुनर्जागरण के लिए अपनी सभ्यतागत जड़ों से मजबूत जुड़ाव जरूरी है।
बंगाल के पुनर्जागरण में भी उनकी खास जगह है। वे श्री अरविंद के नाना थे, जिनके राष्ट्रवाद, अध्यात्म और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर लेखन ने आजादी के आंदोलन में गहरा असर डाला। रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता जैसी हस्तियां भी बसु का बहुत सम्मान करती थीं और उनके विचारों से प्रेरणा लेती थीं।
संघ की बैठक में शताब्दी वर्ष की समीक्षा
यह श्रद्धांजलि ऐसे समय आई है जब संघ इंदौर में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक में अपने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा कर रहा है। बैठक 2 नवंबर से शुरू हुई है। इसमें सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत, होसबाले और करीब 400 वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं। बैठक में संगठन विस्तार, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक जागरूकता और पंच परिवर्तन कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर चर्चा हो रही है।
बसु के अलावा संघ स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान शताब्दी वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्म शताब्दी भी मना रहा है। होसबाले ने अपने बयान में बसु को देशभक्त, समाज सुधारक और दूरदर्शी बताते हुए श्रद्धांजलि दी और कहा कि राष्ट्रीय गौरव, सांस्कृतिक विरासत और एकता पर उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। संघ पूरे 2026 में बसु की द्विशताब्दी मना रहा है और 7 दिसंबर को उनकी 200वीं जयंती पड़ती है।