SC Verdict on SIR

सुप्रीम कोर्ट ने SIR को दी संवैधानिक मंजूरी, लेकिन चुनाव आयोग की ताकत पर भी तय कर दी सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट के SIR को वैध माना, लेकिन चुनाव आयोग की शक्तियों पर स्पष्ट सीमा तय कर दी। 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अब तक 7.41 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने SIR को दी संवैधानिक मंजूरी, लेकिन चुनाव आयोग की ताकत पर भी तय कर दी सीमा

Supreme Court News

देशभर में वोटर लिस्ट की जांच को लेकर चल रही बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया को संवैधानिक और वैध माना है। साथ ही साफ कर दिया कि चुनाव आयोग नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से गैर-नागरिक घोषित नहीं कर सकता।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि वोटर लिस्ट को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाए रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। ऐसे में SIR जैसी प्रक्रिया को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। फैसले के बाद अब देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा होना तय माना जा रहा है, क्योंकि विपक्ष पहले से ही इस प्रक्रिया को वोटिंग अधिकारों पर हमला बता रहा है।

कोर्ट ने चुनाव आयोग को दी सीमित छूट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग केवल चुनावी रिकॉर्ड के उद्देश्य से नागरिकता की जांच कर सकता है। अदालत ने कहा कि आयोग का काम वोटर लिस्ट को अपडेट करना है, न कि किसी की नागरिकता पर अंतिम फैसला देना। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार हफ्ते के भीतर केंद्र सरकार की संबंधित एजेंसियों को भेजा जाए। इसके बाद संबंधित व्यक्ति को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका देना होगा। इस टिप्पणी को अदालत द्वारा संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

13 राज्यों और UT में हटे करोड़ों नाम

जून 2025 में बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी हो चुकी है। इस दौरान कुल 7.41 करोड़ वोटर्स के नाम सूची से हटाए गए हैं। सबसे ज्यादा 2.89 करोड़ नाम उत्तर प्रदेश में हटे। इसके अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा समेत कई राज्यों में भी यह प्रक्रिया लागू की गई। दिल्ली में 30 जून से SIR शुरू होने जा रहा है, जबकि तीसरे चरण में 16 और राज्यों व 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया दिसंबर तक जारी रहेगी।

अदालत ने पांच बड़े सवालों पर दिया जवाब

करीब 10 महीने तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच अहम सवालों पर अपना रुख साफ किया। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने की संवैधानिक शक्ति है और यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ नहीं जाती। कोर्ट ने दस्तावेज मांगने के अधिकार को भी सही ठहराया। आधार कार्ड समेत 11 प्रकार के दस्तावेजों को वैध मानते हुए अदालत ने कहा कि बिना दिशा-निर्देश के जांच प्रक्रिया चलाना ज्यादा खतरनाक हो सकता था। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की कार्रवाई मनमानी नहीं दिखती और इसका उद्देश्य निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है।

विपक्ष ने फैसले के बाद भी उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद विपक्षी दलों ने SIR प्रक्रिया पर अपनी आपत्तियां बरकरार रखी हैं। विपक्ष का आरोप है कि करोड़ों लोगों के नाम हटाना लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर पिछले 22 वर्षों में बिहार समेत कई राज्यों में चुनाव इन्हीं वोटर लिस्ट के आधार पर हुए थे, तो अचानक इतनी बड़ी संशोधन प्रक्रिया की जरूरत क्यों पड़ी।

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि बिहार चुनाव से ठीक पहले इतनी तेजी में SIR लागू करने का फैसला क्यों लिया गया। विपक्ष का दावा है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक असर डाल सकती है और कमजोर वर्गों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है।

आने वाले चुनावों पर दिख सकता है असर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग को कानूनी राहत जरूर मिली है, लेकिन राजनीतिक बहस अभी खत्म होती नहीं दिख रही। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां SIR अब बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। वोटर लिस्ट से नाम हटने और नागरिकता जांच की प्रक्रिया आने वाले महीनों में राजनीतिक दलों के बीच टकराव का केंद्र बन सकती है। खासकर उन राज्यों में जहां मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा है।

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