Why India Silent on Khamenei Death

ईरान सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर भारत क्यों खामोश? जानिए सरकार की रणनीति और दुनिया का रुख

ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर भारत की चुप्पी क्यों? सरकार की रणनीति, वैश्विक प्रतिक्रियाएं और कूटनीतिक समीकरण समझिए आसान भाषा में।

By : Admin
ईरान सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर भारत क्यों खामोश? जानिए सरकार की रणनीति और दुनिया का रुख

Khamenei Death India reaction

नई दिल्लीः ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद पूरी दुनिया में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। अमेरिका-इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में हुए हमले के बाद यह घटना सामने आई, और भारत में भी इस पर सियासत गरमा गई। विपक्ष सरकार से साफ बयान की मांग कर रहा है, लेकिन केंद्र ने अब तक औपचारिक शोक संदेश जारी नहीं किया है।

तो क्या यह चुप्पी है, या सोची-समझी रणनीति?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में पश्चिम एशिया की स्थिति को 'गंभीर चिंता का विषय' बताया। उन्होंने साफ कहा, 'भारत शांति और स्थिरता के पक्ष में है।' इसके साथ ही पीएम ने दोहराया कि भारत हमेशा संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान का समर्थक रहा है। यानी सीधा किसी पक्ष में खड़े होने की बजाय, भारत ने संयम और डी-एस्केलेशन की बात की है।

G7 देशों का रुख भी सख्त

अगर वैश्विक प्रतिक्रियाओं पर नजर डालें तो तस्वीर काफी साफ दिखती है। किसी भी G7 लोकतांत्रिक देश ने खामेनेई की मौत पर शोक नहीं जताया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें 'इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक' कहा। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बयान दिया कि 47 साल तक जिस शासन ने 'इजरायल की मौत' के नारे लगाए, उसके साथ न्याय हुआ है। 
अर्जेंटीना, यूक्रेन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और कनाडा के नेताओं ने भी कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया।

यूरोपीय संघ की काजा कालास ने इसे ईरान के लिए "निर्णायक क्षण" बताया, लेकिन शोक संदेश नहीं दिया।

खाड़ी देशों की चुप्पी

सऊदी अरब खामोश रहा। यूएई ने तेहरान में अपना दूतावास बंद कर दिया। खाड़ी सहयोग परिषद की आपात बैठक हुई, लेकिन किसी ने शोक व्यक्त नहीं किया। ये वही देश हैं जहां 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ऐसे में भारत के लिए संतुलन बेहद जरूरी है।

OIC देशों में भी सीमित समर्थन

57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) में से 10 से भी कम देशों ने संवेदना जताई। हालांकि रूस के व्लादिमीर पुतिन ने इसे 'निंदनीय हत्या' कहा। चीन ने इसे अस्वीकार्य बताया, जबकि इराक, तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया ने भी दुख जताया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई मुस्लिम बहुल देश भी चुप रहे।

भारत का आधिकारिक रुख

विदेश मंत्रालय ने संयम बरतने और संवाद की अपील की। साथ ही ईरान द्वारा यूएई पर किए गए हमलों की निंदा भी की। कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक में हालात की समीक्षा हुई। सरकार के सूत्रों का कहना है कि भारत की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, भावनाओं पर नहीं।

खामेनेई और भारत: रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे

सरकारी सूत्र याद दिलाते हैं कि 2017 से 2024 के बीच खामेनेई ने चार बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की।  2017 में उन्होंने  कश्मीर के लिए मुसलमानों को एकजुट किया। फिर 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद 'न्यायपूर्ण नीति' की मांग की।

दिल्ली दंगे और CAA

इसके बाद साल 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान उन्होंने ट्वीट कर 'मुसलमानों के नरसंहार' का आरोप लगाया, जिसमें हिंदू पीड़ितों का जिक्र नहीं था साथ ही पाकिस्तान की बयानबाजी को दोहराया। इसके अलावा ईरान की संसद ने नागरिकता संशोधन कानून की भी आलोचना की और इसे मुस्लिम विरोधी करारा दिया।

2024 का विवादित ट्वीट

सितंबर 2024 में उन्होंने लाखों सोशल मीडिया फॉलोअर्स को संबोधित करते हुए भारत की तुलना गाजा और म्यांमार से की, जिसे भारत ने 'भ्रामक' बताया।

भारत-ईरान संबंधों का पुराना संदर्भ

UPA सरकार ने 2005, 2006 और 2009 में IAEA में ईरान के खिलाफ वोट किया था। उस वक्त अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की बातचीत चल रही थी। 2018 में अमेरिका के JCPOA से बाहर होने के बाद भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग शून्य कर दिया। CAATSA प्रतिबंधों और भुगतान समस्याओं के चलते भारत ने सऊदी अरब, यूएई और रूस की ओर रुख किया।

हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन के बयान में भारत ने इजरायल विरोधी भाषा का समर्थन नहीं किया और अपना अलग बयान जारी किया।

क्या यह चुप्पी है या कूटनीति?

भारत की स्थिति को अगर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह अलग नहीं दिखती। ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों ने शोक नहीं जताया। खाड़ी देश भी सतर्क हैं। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। ऐसे में सार्वजनिक बयानबाजी से बचना ही समझदारी है। विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है, लेकिन कूटनीति अक्सर कैमरों के सामने नहीं, बंद कमरों में तय होती है।

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